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24 September 2017

जातिवाद और सम्प्रदायवाद के अजगरी बेल में जकड़ा लोकतंत्र

आज जितने भी राजनीतिक दल और नेता है वो जनता को धर्म और जाती के आधार पर आपस में लड़ाकर शासन करना चाहती है. आज जितने भी पार्टिया है जनता को हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर तो कभी अगड़ा और पिछड़ा के नाम पर बाटकर समस्याओ के मकड़जाल में इसप्रकार उलझा दी है की आने वाले दिनों में हर एक जनता अपने-आप के लिए एक समस्या बन जाएगा. इसलिए आज धर्म और जाती के इतिहास को जानना काफी महत्वपूर्ण है.

सबसे पहले हिन्दू धर्मो की बात करते है. हिन्दू धर्म जीवन जीने की एक पद्धती है. इसका कोई संस्थापक नहीं है. इसे विश्व का प्राचीनतम धर्म कहा जाता है. इसे ‘वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म’ भी कहते हैं जिसका अर्थ है कि इसकी उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले से है. यह वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग-अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए है. इसके आलावा जितने भी धर्म है वो हिन्दू धर्मो से ही निकला है. जैसे इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद थे. हजरत मुहम्मद का जन्म 570 ई. में मक्का में हुआ था. हजरत मुहम्मद को 610 ई. में मक्का के पास हीरा नाम की गुफा में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. इसी प्रकार सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव ने की थी. गुरु नानक देव का जन्म 1469 ईस्वी में पंजाब में हुआ था. इसी प्रकार जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे. इसी प्रकार बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध है. भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुंबिनी, नेपाल में हुआ था. इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है की जितने भी धर्म है वो हिन्दू धर्म से ही निकला है और हजरत मुहम्मद, गुरु नानक देव, ऋषभ देव, महात्मा बुद्ध सहित जितने भी धर्मगुरु है जिन्होंने विभिन्न धर्मो की स्थापना की है सभी के पूर्वज हिन्दू धर्म के ही थे.

अब बात करते है जाती की. हिंदू शास्त्रों के मत से जाति का मूल वर्णो में है. ऋग्वेद के 10 वें मंडल के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से राजन्य (क्षत्रिय), जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए. इस प्रकार मानव सृष्टि के प्रारंभ से ही चार वर्णो की उत्पत्ति मानी गई है. हिंदू धर्मशास्त्रों ने जातियों को नहीं, वर्णों को मान्यता दी है. पहले यह व्यवस्था कर्म प्रधान थी. यह विभक्तिकरण कतई जन्म पर आधारित नहीं है. अगर कोइ सेना में काम करता था तो वह क्षत्रिय हो जाता था चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो. वर्णव्यवस्था में पुरोहित तथा अध्यापक वर्ग ब्राह्मण, शासक तथा सैनिक वर्ग राजन्य या क्षत्रिय, उत्पादक वर्ग वैश्य और शिल्पी एवं सेवक वर्ग शूद्रवर्ण होते थे. कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार कुछ भी हो सकता था. योग्यता के आधार पर इस तरह धीरे-धीरे एक ही तरह के कार्य करने वालों का समूह बनने लगा और यही समूह बाद में अपने हितों की रक्षा के लिए समाज में बदलता गया. उक्त समाज को उनके कार्य के आधार पर पुकारा जाने लगा. जैसे की कपड़े सिलने वाले को दर्जी, कपड़े धोने वाले को धोबी, बाल काटने वाले को नाई, शास्त्री पढ़ने वाले को शास्त्री आदि. ऐसे कई समाज निर्मित होते गए जिन्होंने स्वयं को दूसरे समाज से अलग करने और दिखने के लिए नई परम्पराएँ निर्मित कर ली. जैसे कि सभी ने अपने-अपने कुल देवता अलग कर लिए. अपने-अपने रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित करने लगे, जिन पर स्था‍नीय संस्कृति का प्रभाव ही ज्यादा देखने को मिलता है. उक्त सभी की परंपरा और विश्वास का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं.

शस्त्रों में जाति का विरोध : ऋग्वेद, रामायण एवं श्रीमद्भागवत गीता में जन्म के आधार पर ऊँची व निचली जाति का वर्गीकरण, अछूत व दलित की अवधारणा को वर्जित किया गया है. जन्म के आधार पर जाति का विरोध ऋग्वेद के साथ-साथ श्रीमद्भागवत गीता में भी मिलता है. अगर ऋग्वेद की ऋचाओं व गीता के श्लोकों को गौर से पढ़ा जाए तो साफ परिलक्षित होता है कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कोई आधार नहीं है. मनुष्य एक है. जो हिंदू जाति व्यवस्था को मानता है, वह वेद विरुद्ध कर्म करता है. धर्म का अपमान करता है. सनातन हिंदू धर्म मानव के बीच किसी भी प्रकार के भेद को नहीं मानता. उपनाम, गोत्र, जाति आदि यह सभी कई हजार वर्ष की परंपरा का परिणाम है. अतः जाति-व्यवस्था की संकीर्णता छोड़ दें. गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार ही वर्ण का निर्णय होना होता है, जिसे जाति मान लिया गया है. वर्ण का अर्थ समाज या जाति से नहीं वर्ण का अर्थ स्वभाव और कर्म से माना जाता है. स्मृति के काल में कार्य का विभाजन करने हेतु वर्ण व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया था. जो जैसा कार्य करना जानता हो, वह वैसा ही कार्य करें, जैसा की उसके स्वभाव में है तब उसे उक्त वर्ण में शामिल समझा जाए. आज इस व्यवस्था को जाति व्यवस्था या सामाजिक व्यवस्था समझा जाता है. कुछ व्यक्ति योग्यता या शुद्धाचरण न होते हुए भी स्वयं को ऊँचा या ऊँ‍ची जाति का और पवित्र मानने लगे हैं और कुछ अपने को नीच और अपवित्र समझने लगे हैं. बाद में इस समझ को क्रमश: बढ़ावा मिला मुगल काल अंग्रेज काल और फिर भारत की आजादी के बाद भारतीय राजनीति के काल में जो अब विराट रूप ले ‍चुका है. धर्मशास्त्रों में क्या लिखा है यह कोई जानने का प्रयास नहीं करता और मंत्रों तथा सूत्रों की मनमानी व्याख्‍या करता रहता है.

परिणामस्वरुप भारत की सांस्कृतिक एकता टूट गई और लोग अनेको जातियों में बट गई और आजादी के बाद जितने भी राजनीतिक दल आए वो इसे समाप्त करने के बजाए जनता को विभिन्न जातियों और उपजातियो में बाटने का ही काम किया. आज भारतीयों के बीच इस कदर फूट डाल दी गई है कि अब मुश्किल है यह समझना कि हिंदू या मुसलमान, दलित या ब्राह्मण कोई और नहीं यह उनका अपना ही खून है और वह अपने ही खून के खिलाफ क्यों हैं?

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