लेकिन सोचने की बात है की आज जो राज्य में टॉपर है, उसका भी प्राप्तांक 86 प्रतिशत है, ऐसे में आखिर उसे किस कॉलेज में नामांकन मिलेगा. इस परिणाम से बच्चे असफल नहीं हुए हैं, बल्कि यहां की शिक्षा व्यवस्था ‘फेल’ हुई है. सख्ती से परिणाम में इतनी गिरावट नहीं आ सकती. शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है. यह परिणाम राज्य की शिक्षा व्यवस्था का प्रतिबिंब है. बहरहाल, ये सवाल सिर्फ बिहार की शिक्षा व्यवस्था या फिर शिक्षा मंत्री पर नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के सुशासन और गुड गर्वनेंस पर भी उठ रहे हैं. नीतीश सरकार के लिए अब जरूरी है कि वो ठोस और कड़े फैसले ले, ताकि ना सिर्फ बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल पर विराम लग सके, बल्कि बिहार के मेघा पर जो सवाल उठ रहे हैं उस पर भी लगाम लगे.