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12 September 2017

किसान आंदोलन: आक्रोश से क्यों उबल रहा है अन्नदाता?

भारत का किसान महीने का मात्र 1600 रुपए कमाता है. इसी हफ्ते दिल्ली आए कृषि वैज्ञानिकों के बीच भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने यह जानकारी दी है. 7 जून को बेंगलूर में नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद ने बताया कि सिर्फ खेती पर निर्भर रहने वाले 53 फीसदी किसान गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं. इन दोनों आंकड़ों की नजर से देश के खेत-खलिहानों को देखिए तो किसानों की बर्बादी की भयावह तस्वीर सामने आती है. हमारा किसान भूखा है और हम उसे उपदेश दे रहे हैं. कभी अन्नदाता तो कभी अन्नदेवता बोलते हैं. क्या आपने किसी धर्मग्रंथ में पढ़ा है कि जो अन्नदाता है या अन्नदेवता है वह आत्महत्या करता है? अन्नदाता तो दूसरों की भूख मिटाता है, भारत में ही हो रहा है कि अन्नदाता अपनी भूख नहीं मिटा पा रहा है. खुद को ही मिटा रहा है. पथरायी आंखों से आकाश की तरफ टकटकी लगाकर देखता किसान और उसके पैरों के नीचे पानी को तरस में टुकड़े-टुकड़े होती जमीन. याद कीजिए कि किसानों की निरीहता की सूचना देती यह तस्वीर आपके जेहन में कितने सालों से दर्ज है? किसानी की यह तस्वीर आपकी आंखों के आगे कुछ और तस्वीरों को नुमायां करेगी. और बहुत मुमकिन है कि नुमायां होने वाली यह तस्वीर अपने खेत में लगे किसी पेड़ या घर में टंगी किसी खूंटी पर रस्सी बांधकर गले में फंदा डाल आत्महत्या कर लेने वाले किसान की हो. बीते बीस सालों से ऐसी तस्वीरें बहुतायत में छपी हैं, आंखें ऐसी तस्वीरों को देखने की इतनी अभ्यस्त हो चली हैं कि अब उनको कोई खटका नहीं होता, दिल को पहले सा कोई सदमा नहीं पहुंचता. किसानों की निरीहता की झलक दिखलाती ऐसी तस्वीर को महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसानों ने फिलहाल झुठला दिया है. दोनों ही सूबों में किसानों का आक्रोश जून की गर्मी की तरह उबाल पर है. सड़कों पर दूध बहाया जा रहा है, शहर की मंडियों में सब्जियों की आवक ठप्प है. कहीं इसे हड़ताल का नाम दिया जा रहा है जैसे महाराष्ट्र का नासिक और अहमदनगर तो कहीं इसे सड़क-जाम, तोड़फोड़ और आगजनी पर उतारू हिंसक भीड़ के नाम से याद किया जा रहा है .

 प्रदेश में 6 किसान पुलिस की गोलियों से मार दिए गए, उसी वक्त महाराष्ट्र में सिर्फ 2 दिन के भीतर 4 किसानों ने खुद ही अपनी जिंदगी खत्म कर ली. हम किसानों की आत्महत्या की खबरों के प्रति सामान्य होते जा रहे हैं. महाराष्ट्र के विदर्भ में आत्महत्या करने वाले 3 किसानों में से एक किसान मात्र 10 हजार के कर्जे के लिए अपनी जान दे देता है. अक्तूबर 2016 में लुधियाना के एक किसान ने अपने 5 साल के बेटे को सीने से लगाकर नहर में कूद कर जान दे दी. उन पर 10 लाख का कर्ज था. यह इसी दौर में हो सकता है कि कोई किसान अपने 5 साल के बेटे को सीने से लगाकर नहर में कूद जाए और समाज को फर्क न पड़े, यह बताता है कि हमारा किसानों से भावनात्मक रिश्ता समाप्त हो गया है. इस नजर से देखिए तो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसान आपको भूख और कर्ज से तड़पते नजर आएंगे. वे उगा रहे हैं मगर दाम नहीं मिल रहा है. हर साल आप पढ़ते हैं कि कहीं किसान आलू फैंक रहे हैं, कहीं टमाटर फैंक रहे हैं. किसी भी सरकार के पास उनकी किसी मांग का ठोस और स्थाइसी वक्त जब मध्ययी समाधान नहीं है. आश्वासन ही एकमात्र समाधान है. आश्वासन दो, आंदोलन खत्म करो. गर तमाम सरकारें किसानों की इतनी ही ङ्क्षचता करती हैं तो वे क्यों नहीं केन्द्र और राज्य के स्तर पर नियमित सर्वे कराती हैं कि किसानों की वास्तविक आय कितनी है. सब अंधेरे में तीर चला रहे हैं और किसानों को मूर्ख बना रहे हैं.

भारत के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने जो सच बोला है उसे सुनिए और देखिए अपने किसानों की तरफ कि वह कैसे 1600 रुपए महीने में अपना गुजारा करता होगा. सूबों की सरकारें हों या फिर केंद्र की- बीते दो दशक में हर सरकार ने इन संकेतों की उपेक्षा की है. अर्थशास्त्रियों ने अलग-अलग आंकड़ों को लेकर जो अनुमान लगाए हैं उसके अनुसार 2011-12 से लेकर 2015 तक किसानों की वास्तविक आय कम हुई है. सरकार कहती है कि वह 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी कर देगी. वह यह भी नहीं बताती कि आज किसानों की आमदनी कितनी है और 5 साल बाद कितनी होगी. बस एक स्लोगन गढ़ दिया गया है और उसी को बार-बार दोहराया जा रहा है. अभी आमदनी अगर 1600 रुपए है तो यह भारत के राजनेता ही कर सकते हैं जो किसानों के बीच जाकर बोल दें कि आप 5 साल रुकिए हम 3200 रुपए मासिक कर देंगे. मान लीजिए अभी भी किसानों की मासिक आमदनी 3200 रुपए होती तो क्या यह काफी है? इसके बाद भी किसान गरीबी रेखा से नीचे ही रहेगा. अगर सरकार को यह मालूम है कि खेती की जी.डी.पी. 4.3 प्रतिशत है तो उसे क्यों नहीं मालूम है कि किसानो की आमदनी कितनी बढ़ी है. नीति आयोग के एक अध्ययन में दावा किया गया है कि किसानों की आय तब दोगुनी होगी, जब खेती की विकास दर 10 प्रतिशत से ज्यादा होगी. मध्य प्रदेश में तो कई साल कृषि विकास दर 9 प्रतिशत के आसपास रही है, क्या उसी एक राज्य के बारे में कोई अर्थशास्त्री दावा कर सकता है कि वहां उच्च विकास दर के वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी हुई है? क्या कोई दावा कर सकता है कि मध्य प्रदेश के किसान गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं? इसलिए हमें इन आंकड़ों की बाजीगरी से कोई जवाब नहीं मिलता है.
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के दस्तावेजों में मोटे-मोटे अक्षरों में दर्ज ये संकेत बताते हैं कि पिछले एक दशक यानी 1997 से 2006 के बीच देश में डेढ़ लाख से ज्यादा(1,66,304) किसानों ने आत्महत्या की. इसका मतलब हुआ कि एक दशक के भीतर हर साल कम से कम 16 हजार और हर महीने 1000 से ज्यादा किसान हालात के हाथों अपनी जान लेने को मजबूर हुए. आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसान नकदी फसल जैसे कपास, मूंगफली, सूर्यमुखी के बीज और गन्ना उगाने वाले थे और एक दशक के भीतर सर्वाधिक किसान-आत्महत्याएं महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में हुईं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े इन आत्महत्याओं की वजह भी बताते हैं. कोई किसान अपनी बीमारी से लाचार है, उसके पास उपचार के पैसे नहीं है. किसी के संपत्ति का झगड़ा फंसा है और वह अपनी जमीन रेहन पर रखकर मुकदमा लड़ रहा है, किसी को बेटी ब्याहनी है और सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के गरज से वह ब्याह में खर्च के लिए सूद की इतनी ऊंची दर पर महाजन से कर्जा ले रहा है कि कभी चुकता ना कर पाये. लेकिन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में किसान-आत्महत्या की इन सारी वजहों से ऊपर रखी गई है एक और वजह. वह वजह है किसान पर चढ़ता कर्ज का बोझ.
भारत का किसान जितना अपनी गरीबी से परेशान नहीं है उतना सरकारों के झूठे आश्वासनों से परेशान है. 2-2 राज्यों में किसान आंदोलन पर हैं, लेकिन क्या आपने देश के कृषि मंत्री का कोई बयान सुना है? क्या आप ऐसे आंदोलनों के वक्त कृषि मंत्री को किसानों के बीच जाते देखते हैं? किसान वही मांग रहे हैं जो उनसे 2006 के स्वामीनाथन फार्मूले के आधार पर देने की बात हो रही है. भारत का किसान अपनी गरीबी से लड़ नहीं पा रहा है. उसे खेती करनी होती है इसलिए वह बीच-बीच में उग्रता के साथ आंदोलन करता है. बेहतर है कि हम उसकी गरीबी या सहनशीलता का मजाक न उड़ाएं. आप नीति आयोग के शोधपत्रों को पढि़ए, किसी न किसी बहाने इस बात पर जोर मिलेगा कि किसानों को खेती से अलग किया जाए. लेकिन चुनाव आता है तो आप पोस्टर पर पलायन रोकने का वायदा देखने लगते हैं जबकि नीति और नीयत ठीक इसके उलट होती है. कोई अपनी जमीन से अलग नहीं हो पाता है. जमीन की याद आती रहती है. उसे खेती से अलग करेंगे तो बेचैन आत्मा की तरह शहरों में भटका करेगा.
मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में किसान आक्रोश में हैं तो उनकी आवाज तनिक जोर से सुनायी दे रही है. लेकिन ये किसान कोई नई बात नहीं कह रहे हैं. उनकी मांगों पर गौर करें. यह कर्जमाफी की मांग है, फसल का न्यूनतम खरीद-मूल्य बढ़ाने और पशुपालकों को दूध की ज्यादा कीमत देने की मांग है. किसान चाहते हैं उन्हें बिना ब्याज या बहुत कम ब्याज पर कर्ज मिले और 60 साल से ऊपर के किसानों के लिए कोई सम्मानजनक पेंशन योजना शुरु की जाय. इन सारी मांगों को एक साथ मिलाकर देखें तो बड़ा जाहिर सा संदेश निकलता जान पड़ेगा. संदेश यह कि किसान चाहते हैं, सरकार उनकी नियमित आमदनी की गारंटी करे. और, किसान का ऐसा चाहना बेजा नहीं है क्योंकि किसानी अपने देश में हमेशा से बड़े जोखिम का काम रही है. वैश्वीकरण के बाद यह जोखिम और ज्यादा बढ़ा है. चाहे जलवायु-परिवर्तन का असर कहिए या फिर अंधाधुन्ध शहरीकरण की भूख लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का विनाश एक सच्चाई है. इसकी वजह से आने वाली बाढ़ या सूखे से फसल बारंबार मारी जाती है. गेहूं, कपास, प्याज, अरहर जैसी चीजों के दाम पहले की तुलना में अब विश्व-बाजार के उतार चढ़ाव से कहीं ज्यादा प्रभावित होते हैं. बाजार के गिरते-चढ़ते भावों के बीच किसान को उपज औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती है. उपज ज्यादा हो जाये तो उसे उचित वक्त तक बचाकर रखने के लिए पर्याप्त भंडारघर नहीं हैं, ना ही ज्यादातर किसानों को यह सुविधा हासिल है कि जिस मंडी में जिन्स के दाम ज्यादा लगें वह अपना माल हासिल नवीनतम सूचना के हिसाब से सिर्फ वहीं बेचने का फैसला करे. खुले बाजार में शायद किसान ही अकेला ऐसा उत्पादक है जिसका अपने उत्पादन का मोल तय करने के मामले में जरा सा भी अख्तियार नहीं चलता. ऐसी बेचारगी के बीच किसान को बस सरकार से उम्मीद होती है. सरकार चाहे तो उसकी उपज को वाजिब दाम देकर खरीद की गारंटी कर सकती है, खाद-बीज और बिजली की लागत पर रियायत दे सकती है, आपदा की स्थिति में राहत के गारंटीशुदा उपाय कर सकती है. लेकिन किसानों की इस उम्मीद को सूबों और केंद्र की सरकार का रवैया क्या होता है ?

किसान आंदोलनों को भी अहिंसक तरीके से लंबे संघर्ष का रास्ता खोजना होगा. उन्हें हिंसा बंद करनी होगी लेकिन आप भी सोचिए, जो 1600 रुपए महीने का कमाता हो क्या वह सब छोड़कर लंबा आंदोलन कर सकता है? हो सकता है कि वे इसीलिए हिंसा का सहारा लेते हों जो नहीं लेना चाहिए ताकि सरकार जल्दी सुन ले और आंदोलन खत्म हो. हिंसा के कारण मीडिया को मौका मिल जाता है, वह तुरंत किसानों को उपद्रवी बताने लगता है. हम एक समाज के तौर पर किसानों को उपद्रवी मान लेते हैं. उसकी भूख, उसकी बेबसी और उसके त्याग को भूल जाते हैं. अन्नदाता या तो उपद्रवी हो जाता है या आत्महत्या कर लेता है. यही त्रासदी है किसानों की.

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