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24 September 2017

पृथ्वी पर मनुष्य की उत्तप्ती

हिन्दू धर्म के अनुसार, संसार के प्रथम पुरुष मनु थे. मानव संसार की रचना के लिए भगवान ब्रह्मा द्वारा दो लोगों को बनाया गया था, एक पुरुष और एक स्त्री. मानव संसार को आगे बढ़ाने के लिए ब्रह्मा के लिए यह जरूरी था कि वे पुरुष के साथ स्त्री की भी रचना करें. प्रथम मनु का नाम स्वयंभुव मनु था, जिनके संग प्रथम स्त्री थी शतरूपा. भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाए गए पुरुष थे मनु और स्त्री थी शतरूपा. आज हमारी सांसारिक दुनिया में जितने भी लोग मौजूद हैं यह सभी मनु से उत्पन्न हुए हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो मानव संसार की रचना करने वाले भगवान ब्रह्मा ही हमारे आदि पूर्वज हैं और हम उनकी भविष्य की पीढ़ी हैं.

मनु ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से थे जिनका विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न शतरूपा से हुआ था. ये स्वयं भू (अर्थात होना) ब्रह्मा द्वारा प्रकट होने के कारण ही स्वयंभू कहलाये. इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई. मनु की सन्तान होने के कारण वे मानव या मनुष्य कहलाए. स्वायंभुव मनु को आदि भी कहा जाता है. आदि का अर्थ होता है प्रारंभ. सभी भाषाओं के मनुष्य-वाची शब्द मैन, मनुज, मानव, आदम, आदमी आदि सभी मनु शब्द से प्रभावित है. सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई. प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई. मानव का हिन्दी में अर्थ है वह जिसमें मन, जड़ और प्राण से कहीं अधिक सक्रिय है. मनुष्य में मन की शक्ति है, विचार करने की शक्ति है, इसीलिए उसे मनुष्य कहते हैं. और ये सभी मनु की संतानें हैं इसीलिए मनुष्य को मानव भी कहा जाता है.

ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वायंभूव मनु के दो पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपाद हुए तथा तीन कन्याएँ आकूति, देवहूति तथा प्रसूति हुईं. आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ. देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ. कपिल ऋषि देवहूति की संतान थे. हिंदू पुराणों अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई. मनु के दो पुत्रों प्रियव्रत और उत्तानपाद में से बड़े पुत्र उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं. उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए. ध्रुव ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या कर ब्रह्माण्ड में ऊंचा स्थान पाया. स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिससे उनको दस पुत्र हुए थे.

ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं. एक कल्प में 14 मनु हो जाते हैं. एक मनु के काल को मन्वन्तर कहते हैं. वर्तमान में वैवस्वत मनु (7वें मनु) हैं. हिंदू धर्म में स्वायंभुव मनु के ही कुल में आगे चलकर स्वायंभुव सहित कुल मिलाकर क्रमश: 14 मनु हुए. महाभारत में 7 मनुओं का उल्लेख मिलता है व श्वेतवराह कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है. वर्तमान काल तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अन्तर्दशा चल रही है. सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने से 5360 वर्ष पूर्व हुआ था. चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार से हैं:
स्वायम्भु मनु
स्वरोचिष मनु
औत्तमी मनु
तामस मनु
रैवत मनु
चाक्षुष मनु
वैवस्वत मनु या श्राद्धदेव मनु
सावर्णि मनु
दक्ष सावर्णि मनु
ब्रह्म सावर्णि मनु
धर्म सावर्णि मनु
रुद्र सावर्णि मनु
देव सावर्णि मनु या रौच्य मनु
इन्द्र सावर्णि मनु या भौत मनु

शतपथ ब्राह्मण में मनु को श्रद्धादेव कहकर संबोधित किया गया है. श्रीमद्भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना गया है. महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया. उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी. मनु जो एक धर्मशास्त्रकार थे, धर्मग्रन्थों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है. प्रजा का पालन करते हुए जब महाराज मनु को मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राजपाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर एकान्त में अपनी पत्नी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए लेकिन उत्तानपाद की अपेक्षा उनके दूसरे पुत्र राजा प्रियव्रत की प्रसिद्धि ही अधिक रही. स्वायम्भु मनु के काल के ऋषि मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलह, कृतु, पुलस्त्य और वशिष्ठ हुए. राजा मनु सहित उक्त ऋषियों ने ही मानव को सभ्य, सुविधा संपन्न, श्रमसाध्य और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया.

मनुस्मृति हिन्दू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्राचीन धर्मशास्त्र (स्मृति) है. इसे मानव-धर्म-शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है. यह उपदेश के रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया. इसके बाद के धर्मग्रन्थकारों ने मनुस्मृति को एक सन्दर्भ के रूप में स्वीकारते हुए इसका अनुसरण किया है. हिन्दू मान्यता के अनुसार मनुस्मृति ब्रह्मा की वाणी है. धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं. परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है. मनुस्मृति वह धर्मशास्त्र है जिसकी मान्यता जगविख्यात है. न केवल भारत में अपितु विदेश में भी इसके प्रमाणों के आधार पर निर्णय होते रहे हैं और आज भी होते हैं. अतः धर्मशास्त्र के रूप में मनुस्मृति को विश्व की अमूल्य निधि माना जाता है. भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है. इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है. यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है.

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