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24 September 2017

राष्ट्रवाद की अवधारणा

“राष्ट्रवाद” राजनीतिक चिंतन तथा विचारों में एक उभयभावी (ambivalent) अवधारणा रही है. सभी प्रकार के मौजूदा ‘वादों’ के विमर्श में चाहे साम्राज्यवाद से धर्मनिरपेक्षवाद, उदारवाद से समुदायवाद, क्षेत्रवाद से अंतर्राष्ट्रीयवाद हो, राष्ट्रवाद की अवधारणा इनमें सबसे अधिक विमर्शित तथा प्रतिस्पर्धात्मक रही है. यह एक द्वैध्वृत्तिक (उभयभावी) अवधारणा है और इसकी द्वैधवृत्ति इसकी दोहरी प्रकृति में स्थित है. राष्ट्रवाद राजनीतिक वैधता का सिद्धांत है जो यह मांग करता है कि नृजातीय सीमाएं राजनीतिक सीमाओं को सीमित न करें. सिद्धांततः राष्ट्रीय तथा राजनीतिक इकाई समनुरूप होनी चाहिए. राष्ट्रवाद एक भावना और आंदोलन के रूप में इस सिद्धांत पर पूर्णतया आधारित है. कई इतिहासवेत्ता यह तर्क देते हैं कि राष्ट्रवाद एक विचारधारा या भावना के रूप में ब्रिटिश शासन से पहले अस्तित्व में नहीं था. इस प्रकार राष्ट्रवाद का उदय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हुआ. राष्ट्रवाद एक आधुनिक संकल्पना है.
राष्ट्रवाद लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत वे ख़ुद को साझा इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं. इन्हीं बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें आत्म- निर्णय के आधार पर अपने सम्प्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात् ‘राष्ट्र’ की स्थापना करने का आधार है. राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है जब तक उसे एक राष्ट्र-राज्य का रूप नहीं दे दिया जाता. हालाँकि दुनिया में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो इन कसौटियों पर पूरी तरह से फिट बैठता हो, इसके बावजूद अगर विश्व की एटलस उठा कर देखी जाए तो धरती की एक-एक इंच ज़मीन राष्ट्रों की सीमाओं के बीच बँटी हुई मिलेगी. राष्ट्रवाद का उदय अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के युरोप में हुआ था, लेकिन अपने सिर्फ़ दो-ढाई सौ साल पुराने ज्ञात इतिहास के बाद भी यह विचार बेहद शक्तिशाली और टिकाऊ साबित हुआ है. राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों को अपने-अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन, चिरंतन और स्थिर लगता है. इस विचार की ताकत का अंदाज़ा इस हकीकत से भी लगाया जा सकता है कि इसके आधार पर बने राष्ट्रीय समुदाय वर्गीय, जातिगत और धार्मिक विभाजनों को भी लाँघ जाते हैं. राष्ट्रवाद के आधार पर बने कार्यक्रम और राजनीतिक परियोजना के हिसाब से जब किसी राष्ट्र-राज्य की स्थापना हो जाती है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर राष्ट्र के प्रति निष्ठा को ही अहमियत देंगे. वे राष्ट्र के कानून का पालन करेंगे और उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे देंगे. यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि आपस में कई समानताएँ होने के बावजूद राष्ट्रवाद और देशभक्ति में अंतर है. राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है, जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं है.

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