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24 September 2017

राजनीतिज्ञों और नेताओं के लिए ‘नेता पात्रता परीक्षा’ लागू हो तो बदल जाएगी सियासत

हमारे देश में नेता आपस में ही गाली गाली खेल रहे हैं, जिससे देश का माहौल बिगड़ता जा रहा है. अपने वोट बैंक को साधने के लिए नेता अब किसी भी हद तक उतरने को तैयार हैं. कहते हैं की किसी भी नियम या कानून को अगर सही समय पर लागू किया जाए तो उसका प्रभाव आने वाले भविष्य को भी सुरक्षित करता है. आज देश की मौजूदा राजनीति के स्तर को अगर बचाना है, अब एक ऐसे नए क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता है, जिसके द्वारा राजनीति करने वाले नेताओं की क्वालिटी को बढ़ाया जा सके. इसके लिए देश में नेताओ के लिए भी एक न्यूनतम अर्हता निश्चित की जानी चाहिए, जिसके लिए पूरे देश में ‘ नेता पात्रता परीक्षा’ का आयोजन किया जाना चाहिए. दरअसल, राजनीति एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा जनता अपना जनप्रतिनिधि चुनकर उनके द्वारा अपने अधिकारों को प्राप्त करती है. इन्हीं जनप्रतिनिधियो को ‘नेता’ कहते हैं. कहा जाता है कि राजनीति और नेतागिरी सीखने की कोई पाठशाला नहीं होती, बल्कि ये तो व्यक्ति के अंदर ही होता है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. हमारे देश में मौजूदा समय की राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जिसके लिए कहीं न कही नेता ही जिम्मेदार हैं और इस कारण हमारे समाज का स्तर भी गिरता चला जा रहा है.

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता. प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूं. लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है. उस वक्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को यह हक भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाए. तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे. साक्षरता दर 12% थी. आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं. देश की साक्षरता 74% के आस-पास है. ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिए और वक़्त को ध्यान में रखिए, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है.

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं. हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है. ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है. अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी. तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालांकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है.

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये ‘कास्ट’ से ज़्यादा ‘क्लास’ निर्धारित करती है. पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है. टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत खास व्यक्ति को. रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही. सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है. उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है. याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की जिन्दगी जी रहे हैं. बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गई कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए. सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जाएंगे. क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाए कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे. जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देखकर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए. किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी.

आज हर पार्टी बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है. राज्यसभा और लोकसभा में ज़्यादातर प्रतिनिधि की ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता. Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा.

वाकई अगर सच में राजनीति के स्तर को बढ़ाना है, तो हमें राजनीति में कुछ बड़े नियमो को लागू करना होगा. मेरे विचारानुसार नेताओं के लिए भी राजनीति में प्रवेश करने के लिए एक न्यूनतम अर्हता निश्चित की जानी चाहिए. जिस प्रकार शिक्षकों को नये शिक्षा कानून के तहत शिक्षक पात्रता परीक्षा देनी होती है, उसी प्रकार नेताओं के लिए भी ‘नेता पात्रता परीक्षा अर्थात LET’ होनी चाहिए. इसे अनिवार्य रूप से लागू किया किया चाहिए. एक नेता समाज का नेतृत्व करता है और समाज का स्तर दिन ब दिन जिस प्रकार गिरता जा रहा है, उसे देखकर समय-समय पर आवाजें भी उठी हैं कि नेताओं का कुछ न कुछ पढ़ा लिखा होना बहुत अनिवार्य है.

मेरा मतलब ये है कि कम से कम नेताओं के लिए भी न्यूनतम अर्हता के रूप में नेता पात्रता परीक्षा आयोजित कराई जाए, जिसके अंतर्गत नेताओं से जनता,समाज और देश के हितों से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाएं. इसे अनिवार्य रूप से पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए. इस परीक्षा को पास करने वाले व्यक्ति को एक सर्टिफिकेट दिया जाए, जिसे लेकर वह किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ सकता हो. इसके लिए एक कमेटी बनाई जाए जो पूरे देश में एक साथ इस परीक्षा को आयोजित करा सके. इसको पास करने वाला ही किसी भी पार्टी से चुनाव लड़े.

हमारे देश में निचले स्तर से लेकर ऊपर तक हर जगह किसी भी नौकरी या कार्य के लिए एक न्यूनतम अर्हता की आवश्यकता होती है. सभी को परीक्षाएं देनी होती है, तब जाकर नौकरी प्राप्त होती है फिर आखिर हमारे देश में नेताओ के लिए किसी प्रकार की परीक्षा की व्यवस्था क्यों नही है? क्या जनता जिसे अपने मत देकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन करने के लिए चुनती है, तो क्या उसका थोड़ा भी पढ़ा-लिखा आवश्यक नही है? मौजूदा समय में अब जनता को भी महसूस हो रहा है कि नेताओं का पढ़ा-लिखा होना भी आवश्यक है. भारतीय राजनीति का गिरता स्तर सचमुच गहरी चिंता का विषय है. एक दौर था जब विपक्षी दलों के प्रति भी बेहद आदर एवं सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग किया जाता था. आज सत्ता पक्ष हों या विरोधी दलों के नेता दोनों की जुबान बुरी तरह से फिसलने लगी है. राजनातिक सहिष्णुता नाम मात्र को देखने को मिलती है. दरअसल, अगर नेता पात्रता परीक्षा को अगर अनिवार्य रूप से भारतीय राजनीति में लागू कर दिया जाए तो निःसन्देह देश में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा.

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