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24 September 2017

स्वयंवर से खत्म होगा दहेज प्रथा

भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है. मनुस्मृति मे ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति, गाय आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करे. यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने उल्लेख नहीं किया. समय बीतता चला गया स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मान बैठे हैं. प्राचीन समय में ये व्यवस्था शोषण की प्रणाली नहीं थी जहाँ दुल्हन के परिवार से दूल्हे के लिये कोई एक विशेष माँग की जाये, ये एक स्वैच्छिक व्यवस्था थी और दुल्हन का परिवार अपनी क्षमता के अनुसार उपहार देता था. लेकिन बदलते वक्त के साथ उपहार देने की व्यवस्था दूल्हे के परिवार द्वारा की जाने वाली अनिवार्य (बाध्यकारी) माँग की शोषण की प्रणाली में परिवर्तित हो गयी और इस व्यवस्था ने दहेज प्रथा का रुप ले लिया. एक सामाजिक बुराई के रुप में ये न केवल विवाह जैसे पवित्र बंधन का अपमान करती है बल्कि ये औरत की गरिमा को उल्लंघित करती है. यही कारन है की आज लड़के वालो के पिता जहाँ बेबीलोन के झूलते बाग में शैर करते रहते है वही उनका लाडला बेटा अपने सपनो के ताजमहल में मुमताज की खोज करता रहता है. दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं. जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है? कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है?

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है. इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं. अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है. यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है. लेकिन दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता. इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए. विवाह करने की जो वर्तमान परम्परा है उसे तोड़ना होगा तथा स्वयंवर की परम्परा को प्रोत्साहन देना होगा; तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा.

स्वयंवर प्राचीन काल से प्रचलित एक हिन्दू परंपरा है जिसमे कन्या स्वयं अपना वर चुनती थी और उससे उसका विवाह होता था. इस बात के प्रमाण हैं कि वैदिक काल में यह प्रथा समाज के चारों वर्णों में प्रचलित और विवाह का प्रारूप था. रामायण और महाभारत काल में भी यह प्रथा राजन्य वर्ग में प्रचलित थी, परन्तु इसका रूप कुछ संकुचित हो गया था. राजन्य कन्या पति का वरण स्वयंवर में करती थी परंतु यह समाज द्वारा मान्यता प्रदान करने के हेतु थी. कन्या को पति के वरण में स्वतंत्रता न थी. पिता की शर्तों के अनुसार पूर्ण योग्यता प्राप्त व्यक्ति ही चुना जा सकता था. पूर्वमध्यकाल में भी इस प्रथा के प्रचलित रहने के प्रमाण मिले हैं, जैसा संयोगिता के स्वयंवर से स्पष्ट है. हमारे देश में प्रचीन काल से स्वयंवर की परम्परा चली आ रही है. सुंदर, सुशील राजकुमारियों के लिए श्रेष्ठतम वर की तलाश स्वयंवर के माध्यम से ही की जाती थी. राजा आस-पास की रियासतों के राजकुमारों को अपने यहां निमंत्रित करते थे और फिर उनकी योग्‍यता का परीक्षण किया जाता था. कभी-कभी इस तरह भी होता था कि राजकुमारियों को स्वाधिकार दिया जाता था कि वो खुद अपने योग्य वर का चयन करें. इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी सर्वश्रेष्ठ दक्षता से परिपूर्ण होती थी तब स्वयंवर का आयोजन किया जाता था.

माता सीता अपने पिता के घर में रखे शिव जी के धनुष को फूल की तरह उठा देती थी जबकि महाराजा जनक को पता था कि यह धनुष अच्छे से अच्छा बलधारी नहीं उठा सकता. तभी उन्होंने एक ऐसे वर की तलाश के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था जो उस धनुष को उठा सके और राजा राम ने न केवल धनुष को उठाया बल्कि उसकी कमान चढ़ाते समय उसे तोड़ भी दिया. इसी प्रकार द्रोपदी के स्वयंवर में भी एक घूमती हुई मछली की आंख को निशाना बनाने वाला धनुर्धर ही द्रोपदी का पति बनने के लायक था, जो काम अर्जुन ने बखूबी कर दिखलाया था. इसी प्रकार सावित्री और दयावंती के उदाहरण भी इतिहास में मौजूद हैं. इस प्रकार के कई स्वयंवर है जो वीर नारियों के स्वयंवर की गाथा सुनाते हैं. लेकिन अर्यो के आदर्श ज्यों-ज्यों विरमत होते गए, इस प्रथा में कमी होती गई और आज तो स्वयंवर को उपहास का विषय ही माना जाता है. आज यह परम्परा बिल्कुल विलुप्त हो गई है.

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