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03 October 2017

जातिवाद बना राजनीती का हथियार, भारतीय राजनीती में जातिवाद

भारत में विद्यमान जातिवाद ने न केवल यहाँ की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धामिक प्रवृत्तियों को ही प्रभावित किया अपितु राजनीति को भी पूर्ण रूप से प्रभावित किया है. जाति के आधार पर भेदभाव भारत में स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व भी था किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् प्रजातन्त्र की स्थापना होने पर समझा गया कि जातिगत भेद मिट जाएगा किन्तु ऐसा नहीं हुआ. राजनीतिक संस्थाएं भी इससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकी परिणामस्वरूप जाति का राजनीतिकरण हो गया. भारत की राजनीति में जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. केन्द्र ही नहीं राज्यस्तरीय राजनीति भी जातिवाद से प्रभावित है, जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक बात है क्योंकि राष्ट्रीय एकता एवं विकास मार्ग अवरुद्ध हो रहा है.

जाति का राजनीतिकरण ‘आधुनिकीकरण’ के मार्ग में बाधक सिद्ध हो रहा है क्योंकि जाति को राष्ट्रीय एकता, सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्‌भाव एवं समरसता का निर्माण करने हेतु आधार नहीं बनाया जा सकता. आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश के बुद्धिजीवी और राजनीतिक नेता इस संदर्भ में ईमानदारी के साथ सोचें और इस समस्या एवं इससे उत्पन्न अन्य समस्याओं का समाधान करने हेतु गम्भीरतापूर्वक प्रयास करें. भारत में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में जाति प्रथा किसी न किसी रूप में विद्यमान अवश्य होती है. यह एक हिन्दू समाज की विशेषता है जोकि गम्भीर सामाजिक कुरीति है. जाति प्रथा अत्यन्त प्राचीन संस्था है. वैदिक काल में भी वर्ग-विभाजन मौजूद था, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता था, यह जातिगत न होकर गुण व कर्म पर आधारित थी.

समाज चार वर्गों में विभाजित था, ‘ब्राह्मण’-धार्मिक और वैदिक कार्यों का सम्पादन करते थे । ‘क्षत्रिय’-इनका कार्य देश की रक्षा करना और शासन प्रबंध था । ‘वैश्य’-कृषि और वाणिज्य सम्भालते थे । ‘शूद्र’-शूद्रों को अन्य तीन वर्णो की चाकरी करनी पडती थी । प्रारम्भ में जाति प्रथा के बंधन कठोर नहीं थे परन्तु बाद में यह जाति-भेद में बदलाव आ गई । वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था में सबसे बडा अन्तर यह है कि वर्ण का निर्धारण व्यवसाय से होता था, जबकि जाति का निश्चय जन्म से होता था । इस प्रकार जो संस्था कभी हितकर थी, वही बाद में भ्रष्ट हो गई ।

जाति-प्रथा के कारण समाज बहुत से टुकड़ों में बँट गया तथा व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भेद-भाव की खाई खड़ी हो गई. भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है. अत: न चाहते भी राजनीति को जाति सस्था का उपयोग करना ही पडेगा. अत: राजनीति मे जातिवाद का अर्थ जाति का राजनीतिकरण है. जाति को अपने दायरे में खींचकर यजनीति उसे अपने काम में लाने का प्रयत्न करती है दूसरी और राजनीति द्वारा जाति या बिरादरी को देश की व्यवस्था में भाग लेने का मौका मिलता है. राजनीतिक नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है जिससे राजनीतिक संगठन मे आसानी होती है.

इस सच्चाई को कोई कितना भी नकारे, मगर आज भी भारतीय जनतंत्र की मुख्य राजनैतिक धुरी नागरिक नहीं जाति ही है. यह आगे भी होगी. माना कि जाति व्यवस्था अपने में जनतंत्र का निषेध है. यह व्यक्ति का सामाजिक दर्जा उसकी योग्यता से नहीं, उसके जन्म से निर्धारित करती है. सदियों से यह समाज के बड़े हिस्से को अछूत मानती आई है. लेकिन देश के स्वतंत्र होने के ‘आधी सदी बाद भी जाति, संप्रदाय और जाति का प्रभाव सार्वजनिक जीवन में समाप्त नहीं हुआ. वास्तव इसकी पैठ पहले से अधिक मजबूत हो गई है.’ जातिवाद का प्रभाव राज्यस्तर की राजनीति पर भी है. कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहाँ की राजनीति जातिवाद से प्रभावित न हो. कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय समाज में जातिगत भेद-भाव केसर एव एड्‌स जैसे भयकर रोगो की तरह सर्वत्र फैल गया है, जिसका निदान असम्भव है. इसीलिए भारतीय राजनीति मे जाति की भूमिका का मूल्यांकन करना अत्यन्त जटिल कार्य है. यह केवल व्यक्ति-व्यक्ति के बीच खाई पैदा नहीं कर रही अपितु राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी बाधा उत्पन्न कर रही है.

आज राष्ट्रीय हितो की अपेक्षा जातिगत हितों को विशेष महत्व दिया जा रहा है, जिसके कारण हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है. अत: जातिवाद देश, समाज और राजनीति के लिए बाधक है. लोकतन्त्र व्यक्ति को इकाई मानता है न कि किसी जाति या समूह को. जाति और समूह के आतंक से मुक्त रखना ही लोकतन्त्र का आग्रह है.

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