मासिक करेंट अफेयर्स

03 October 2017

प्रधानपतियो का तो जलवा है जनाव

क्या बताउं, क्या हुआ? सुबह-सुबह एक कागज लेकर दस्तखत के वास्ते प्रधान जी के पास गया था, प्रधान जी तो सुबह का नास्ता बनाने में मशरूफ थीं सो सामना प्रधानपति से हो गया। सफेद कलफ डाले लम्बा कुर्ता-पाजामा पहने प्रधानपति महोदय चमचों की जमात से घिरे थें मैने दरयाफ्त किया प्रधान जी हैं? उत्तर मिला… काम बताओ. उन्ही से काम है. मैं हूं. इतना सुनना था कि मैं भौचक रह गया. जी दस्तखत करवाने हैं. महाशय ने झट कलम निकाल फरमाया कहां दस्तखत करना है? दस्तखत तो प्रधान जी के करवाने हैं, ये तो गैर कानूनी होगा. इतना सुनना था कि प्रधानपति महोदय गुस्से से लाल हो गयें, जाओ जहां कानूनी दस्तखत होता हो करवा लेना. बस इसी जलवा और रूआब की खातिर लोग प्रधानी का चुनाव लड़ रहे हैं. जीत हासिल करने के लिए दारू और मुर्गा का भोग लग रहा है मतदाताओं का. मतदाता भी साइबेरियन पक्षियों की तरह फड़फड़ाते नजर आते हैं मालदार प्रत्याशीयों के साथ. शराब की शीशी से विकास का बुलबुला निकलने लगता है. महिला सीट हो या पुरूष प्रधानी तो पति ही करता है नाम मात्र की होती हैं महिलाएं! ….हूं सरकार को भी न जाने क्या हो गया है कि चुल्हा-चैका करने वालों को प्रधान बना देती हैं?
कुछ वक्त शान्त रहने के बाद सोचा आखिर एक उपाय है, अरे… लोकतंत्र है, प्रधान जी के यहां दस्तखत नहीं हुआ तो क्या, उनसे उपर प्रमुख जी है ना उन्ही से दस्तखत करवा लेते है. इत्मीनान हो कर अपनी फाइल कांख में दबाई और प्रमुख जी के यहाँ चलते बने। वहां का मंजर देखकर होश फाख्ता हो गये. चारों तरफ से राइफलधारी गिरोह मानो वीरप्पन या ददुआ ने उनको अपनी विरासत दे दिया हो जैसे! बस इतना ही पूछा था कि प्रमुख जी कहां हैं? मुसल्लत हो गयी मुस्टंडों की टोली. कौन… कहां से… क्या काम है? अरे भई कोई चोर डाकू थोडे हू.। बस प्रमुख जी से मिलना है. बैठिए…शायद यही कह वे चले गयें. तवील इंतजार व गहन चेकिंग के बाद बाद मेरी पेशी हुई. कद-काठी के मजबूत, विदेशी चश्मा व सूट पहने एक सज्जन ने रौबीले आवाज से पूछा, क्या काम है? जी दस्तखत करवाने हैं प्रमुख जी के. लाओ कहा करना है. जी महोदया के दस्तख्त करवाने हैं. बदतमीज, बेहूदा तेरी ये मजाल कि प्रमुखपति से जबान लडाता है. फिर क्या था मुसटंडों ने धक्का मार के बाहर कर दिया. फिर मेरा डील दहल उठा.
 
कुछ देर माथ-पच्ची के बाद मैने हिम्मत जुटाते हुए का कि एक आखिरी कोशिश करते है चेयरमैन जी से मिल के देखते है. वहाँ सुबह से लाइन में खडा रहा पूरे दो घंटे बाद खद्दर धारीयों का धुंध छटा. मेरी हाजिरी हुई. किससे काम है का सवाल सुनते ही मेरा पारा गरम हो गया. चेयरमैन साहब से. गुस्ताख… साहिबा बोला. इतना सुनना था कि मैं चलता बना क्योंकि फिर चेयरमैनपति से मुलाकात करना मेरे बस के बाहर था. वैसे भी पतियों का जलवा मुझपर भारी सबित हो चुका था. भाड में जावे कागज और भाड में जाये दस्तख्त.

समझ में नहीं आता है कि ये पति खुद को क्या समझते हैं? न जाने कौन सा पावर मिल गया है इनको? सरकार को भी न जाने क्या हो गया है कि एक पद पर दो-दो व्यक्ति को बिठा रखा है? आखिर नकली व असली का फर्क कैसे होगा? चक्कर पे चक्कर काटने के बाद घनचक्कर हुए ऐसे तमाम सवालों पर बड़ी गम्भीरता से विचार करने में मुबतिला हो गयें. जिधर देखो उधर दिखते है नामधारी पति. प्रधानपति, प्रमुखपति, चेयरमैनपति, विधायकपति, सांसदपति, मंत्रीपति आदि. रौब, जलवा और पावर भी है इनके पास है. ज्यादातर पत्नीयां तो बस नाम की होती हैं पद पर काम तो यही पति करते हैं. रूतबा और रूआब तो इनके पतियों का ही होता है. फीता काटना हो या किसी समारोह का उद्घाटन सब जगह पति ही जाता है. लोकतंत्र में नाम पत्नीयों का और काम पतियों का. क्या बात है? तो मैं भी क्यों न पति बन जाउं.

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