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16 November 2017

पश्चिम बंगाल को मिला रसगुल्ला का जी आई पंजीकरण

रसगुल्ला नाम पर एकाधिकार को लेकर ओडिशा के साथ लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पश्चिम बंगाल को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई पंजीकरण मिल गया है. इसके बाद रसगुल्ला नाम पर पूरी दुनिया में बंगाल एकाधिकार हो गया है. किसी भी उत्पाद का जीआइ टैग उसके स्थान विशेष की पहचान बताता है. कहते हैं, मिठाई कड़वाहट दूर करती है, लेकिन दो राज्यों-पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बीच इसी मिठाई पर जंग छेड़ी थी. जिसमें बंगाल आखिरकार जीत गई।.इसकी जानकारी खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लंदन से ट्विटर पर दी. ममता ने मंगलवार को ट्वीट किया हम सभी के लिए मिठी खबर है. हम खुशी और गर्व के साथ ये कहना चाहते हैं कि बंगाल में सर्वप्रथम रसगुल्ले की ईजाद होने के भौगोलिक पहचान (जीआइ) मिल गई है और सरगुल्ले की ईजाद पर हमारा अधिकार सिद्ध हो गया है. इसके बाद से बंगाल के आम लोगों से लेकर नेता तक खुशी मनाने लगे हैं.

दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब वर्ष 2010 में एक मैगजीन के लिए करवाए गए सर्वे में रसगुल्ला को राष्ट्रीय मिठाई के रूप में पेश किया गया था. ओडिशा सरकार ने रसगुल्ला की भौगोलिक पहचान (जीआइ) के लिए दावा किया. दावा किया कि मिठाई का ताल्लुक उसी से है. बंगाल इसका विरोध शुरू कर दिया. दोनों राज्यों के बीच विवाद इस बात को लेकर था कि रसगुल्ले का आविष्कार कहां हुआ है. ओडिशा का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय रसगुल्ला को राज्य की भौगोलिक पहचान से जोडऩे में लगा हुआ था. दस्तावेज इकठे किए गए थे, जिससे साबित हो कि पहला रसगुल्ला भुवनेश्वर और कटक के बीच अस्तित्व में आया. इसपर बंगाल के खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला ने कहा था कि रसगुल्ला का आविष्कारक बंगाल  है और हम ओडिशा को इसका क्रेडिट नहीं लेने देंगे. दोनों राज्य सरकारें इस मामले को लेकर कोर्ट तक जाने को तैयारी में थी. जीआइ वह आधिकारिक तरीका है जो किसी वस्तु के उद्गम स्थल के बारे में बताता है.  

बंगाल सरकार रसगुल्ला या रसोगुल्ला को अपना बताने के लिए ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाने में केसी दास प्राइवेट लिमिटेड की मदद ली. यह मिठाई की दुकानों की चेन है जो नवीन चंद्र दास के वंशजों द्वारा संचालित की जा रही है. बंगाल की तरफ से जवाब देने के लिए विस्तृत डोजियर तैयार किया गया था।.इसमें मुख्य रूप से तीन तर्क दिए गए थे जिसमें कहा गया है कि छेना से रसगुल्ला बना, छेना बंगाल में ही अस्तित्व में आया, साथ ही रसगुल्ला व रोसोगुल्ला शब्द बांग्ला भाषा का है. नवीन चंद्र के परपोते अनिमिख ने कहा, रसगुल्ला के बारे में यह कहना कि 700 साल पहले ओडिशा में इसकी खोज हुई, गलत है. बंगाल में 18वीं सदी के दौरान डच और पुर्तगाली उपनिवेशकों ने छेना से मिठाई बनाने की तरकीब सिखाई और तभी से रसगुल्ला अस्तित्व में आया. खानपान के कई जानकार मानते हैं कि रसगुल्ला की खोज नवीन चंद्र (इन्हें कोलंबस ऑफ रोसोगुल्ला भी कहा जाता है) ने 1868 में की थी.

ओडिशा के विज्ञान व तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्र्रही ने 2015 में मीडिया के समक्ष दावा किया कि 600 वर्ष पहले से यहां रसगुल्ला मौजूद है. उन्होंने इसका आधार बताते हुए भगवान जगन्नाथ के भोग खीर मोहन से भी जोड़ा. वहीं सांस्कृतिक इतिहासकार असित मोहंती का कहना था कि भगवान जगन्नाथ द्वारा मां लक्ष्मी को रथयात्रा के समापन के समय रसगुल्ला भेंट करने की परंपरा 300 साल पुरानी है. बंगाल तो खुद ही मान रहा था कि उसका रसगुल्ला 150 साल पुराना है.

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