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27 November 2017

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संस्था ने काशी वन्य जीव प्रभाग की हरियाली को कार्बन क्रेडिट दी

कार्बन उत्सर्जन को लेकर विश्व स्तर पर मचे घमासान के बीच नौगढ़ की वादियों से राहत भरी खबर आई है. संयुक्त राष्ट्र संघ की संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संस्था ने काशी वन्य जीव प्रभाग की हरियाली को कार्बन क्रेडिट दी है. कार्बन उत्सर्जन को रोकने पर वन प्रभाग को इस इंटरनेशनल उपलब्धि के लिए बड़ी धनराशि मिलेगी. यहां के जयमोहनी रेंज के सात एवं नौगढ़ रेंज के तीन इलाकों में प्लांटेशन के लिए कार्बन क्रेडिट मिलना काशी वन्य जीव प्रभाग के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
कार्बन क्रेडिट अंतरराष्ट्रीय उद्योग में उत्सर्जन नियंत्रण की योजना है. इसे बढ़ावा देने को सीधा अर्थ से जोड़ दिया गया है. कार्बन उत्सर्जन को मापने की इंटरनेशनल संस्था यूएनएफसीसीसी यानी यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेंशन आन क्लाइमेट चेंज, जो कि संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था है. उद्योगों की शुरुआत से पूर्व यूएनएफसीसीसी से संपर्क साधना होता है. संस्था मापदंडों के अनुरूप कार्बन उत्सर्जन की रेटिंग निर्धारित करती है. इसके सापेक्ष संबंधित संस्था द्वारा कार्बन का उत्सर्जन कम किया गया तो दोनों के बीच के अंतर को कार्बन क्रेडिट कहते हैं. 
काशी वन्य जीव प्रभाव में जायका योजना की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी, जिसे 2017 तक चलना है. किसानों को समृद्धि प्रदान करने वाली इस योजना के तहत 95 समितियां गठित की गईं थीं. ये समितियां ईडीसी यानी कि इको डेवलपमेंट कमेटी व ज्वाइंट फॉरेस्ट डेवलपमेंट कमेटी के अंतर्गत काम शुरू की थीं. योजना के अंतर्गत जंगल के किनारे बसे गांवों में रहने वालों ग्रामीणों को रोजगार देने के लिहाज से सुअर पालन, टमाटर की खेती, मछली पालन, प्लांटेशन आदि कार्य कराए गए. योजना करीब सात साल की हुई तो उसका लाभ कई मायनों में राहत पहुंचाने वाला निकलने लगा है.
चंदौली जिले में किसानों की समृद्धि को  जापान इंटरनेशनल कारपोरेशन एजेंसी व भारत सरकार की ओर से चलाई जा रही जायका योजना ने वन प्रभाग को उपलब्धि दिलाई है. जायका के अंतर्गत नौगढ़ व जयमोहनी रेंज में 320.51 हेक्टेयर में पौधरोपण किया गया था. पौधों को वनकर्मियों ने  मशक्कत कर बचाया तो कुछ साल में ही जवान होकर पेड़ बने पौधे कार्बन क्रेडिट के रूप में संजीवनी बांटने लगे हैं. कार्बन क्रेडिट का कारोबार विश्व में करीब छह बिलियन डालर का बताया जाता है, जिसमें भारत की सहभागिता करीब 20 से 25 फीसद है. पौध रोपण व कचरे का प्रबंधन समेत कई रास्ते हैं, कार्बन उत्सर्जन कम करके  क्रेडिट लेने के. हालांकि इस सुविधा का लाभ सिर्फ विकासशील देशों को ही मिलता है.

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