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21 February 2018

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चार दिनों की जापान यात्रा, जापान की मदद से बिहार में चलेगा मोनो रेल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चार दिनों की जापान यात्रा पर हैं. नीतीश कुमार सोमवार को ही जापान की राजधानी टोक्यो पहुंचे और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से मुलाकात की. नीतीश कुमार और शिंजो आबे की मुलाकात में भारत-जापान के आपसी संबंधों के साथ-साथ बिहार में निवेश को लेकर भी चर्चा हुई. नीतीश कुमार ने जापान के प्रधानमंत्री से कई मुद्दों पर चर्चा की. नीतीश कुमार ने जापानी प्रधानमंत्री से बिहार में पर्यटन, कृषि, खाद्य और उद्योग जैसे बिंदुओं पर चर्चा की. विशेषतौर पर बिहार के मुख्यमंत्री ने जापान के साथ हाईस्पीड रेल संपर्क, जिस पर बुद्ध सर्किट से जोड़ा जाना है उन विषयों पर भी सहयोग की इच्छा जताई. बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय ने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हालिया यात्राओं से दोनों देशों के संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ी है. जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीके) के माध्यम से पटना को गया, बोधगया, राजगीर, नालंदा को जोड़ने का काम चल रहा है, जिसे वैशाली के लुंबिनी तक बढ़ाने की आवश्यकता है. इस काम को पूरा हो जाने पर बौद्धयात्रियों को बौद्ध स्थलों की यात्रा करने में और सुविधा होगी. दोनों देशों के बीच पर्यटन की संभावना का भी और बल मिलेगा.

नीतीश कुमार ने नालंदा विश्वविद्यालय को लेकर भी जापान के सहयोग को लेकर जापानी मंत्रियों से चर्चा की. नीतीश कुमार ने दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने के लिए वहां के विदेश मंत्री तारो कोनो से भी मुलाकात की. नीतीश कुमार ने जापान के विदेश मंत्री से बिहार के लिए सीधी विमान सेवा चालू करने को लेकर भी चर्चा की. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जापान की राजधानी टोक्यो पहुंचने पर जापान में भारत के राजदूत सुजान चिनॉय द्वारा स्वागत किया गया. जापानी प्रधानमंत्री से बिहार में मिनी बुलेट ट्रेन से लेकर नीतीश कुमार की बहुप्रतिक्षित बुद्ध सर्किट को लेकर हुई चर्चा ने एक बार फिर से बिहार में विकास की बयार बढ़ने की संभावना बढ़ गई है. बौद्ध सर्किट के पर्यटकों के लिए विशेष रूप से हाईस्पीड ट्रेन कॉरिडोर के प्रस्ताव को तैयार किया गया है. यह मुख्य रूप से हरियाणा के गुरुग्राम से पुरानी दिल्ली स्थित कश्मीरी गेट के बीच विकसित होने वाले हाईस्पीड ट्रेन कॉरिडोर की तर्ज पर है. मेट्रो प्रोजेक्ट से अलग हाई स्पीड ट्रेन कॉरिडोर का कांसेप्ट कुछ हद तक मोनो रेल की परिकल्पना से भी जुड़ा है. 

यह ट्रेन कॉरिडोर खास तौर पर बौद्ध सर्किट के पर्यटकों को ध्यान में रखकर तैयार किया किया गया है. पटना से गया और फिर गया से राजगीर होते हुए पटना वापस आने को अलग ट्रैक विकसित किया जाएगा. पटना आने वाले पर्यटक अभी बोधगया और राजगीर की यात्रा सड़क या फिर रेल मार्ग से करते हैं. बौद्ध सर्किट के तहत वैशाली को छोड़ प्राय: सभी क्षेत्र को इस हाईस्पीड ट्रेन कॉरिडोर में शामिल करने की योजना है. हाई स्पीड ट्रेन कॉरिडोर को इस तरह से डिजायन किया गया है कि पटना एयरपोर्ट से गया एयरपोर्ट को सीधी कनेक्टिवटी मिल जाए. हाई स्पीड कॉरिडोर के विकसित होने से यह सफर काफी कम समय का हो जाएगा. बोधगया से बौद्ध सर्किट की यात्रा करने आए पर्यटक राजगीर और नालंदा जाते हैैं. इन जगहों के लिए भी हाई स्पीड ट्रेन कॉरिडोर की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी. बौद्ध सर्किट में शामिल वैशाली के लिए वैशाली कॉरिडोर के लिए भी जापान की वित्तीय संस्थाओं से अर्थ की व्यवस्था की जानी है. बख्तियारपुर-ताजपुर पुल के आखिरी छोर से वैशाली कॉरिडोर को विकसित किया जाना है. इसके अतिरिक्त राजगीर से पटना भी एक नयी सड़क को विकसित किए जाने का प्रस्ताव है.

क्‍या है मोनोरेल- मानोरेल ऐसी ट्रेन हैं जो कि रेलवे लाइन पर नहीं बल्कि एक बीम के सहारे चलती है और इसके सारे कोच इसी बीम से जुड़े होते हैं. इसका पाथ सड़क मार्च से लगभग 10 फीट या इससे भी अधिक ऊंचाई पर बनाया जाता है, जिससे कि यात्रियों को ट्रैफिक से निजात मिलती है, साथ ही यात्रियों की सुविधा का ख्‍याल रखा जाता है. इसमें सफर के दौरान दुर्घटना की संभावना भी नहीं रहती है, इसकी रफ्तार भी अन्‍य ट्रेनों और बसों से तेज होती है. दुनिया की पहली मोनोरेल 1820 में रूस के ईवान इलमानोव के द्वारा बेहतर यातायात के विकल्‍प के तौर पर बनाई गयी थी. जिसके बाद 1821 में इसका पहला ट्रायल दक्षिणी लंदन के डप्‍टफोर्ड डॉकयार्ड के हार्डफोर शेयर से रिवर ली तक किया गया था. इसके बाद 1900 में गायरोमोनोरेल का परीक्षण किया गया. 1901 में इसका लिवरपूल से मैनचेस्‍टर के बीच प्रयोग भी किया गया. 1910 में गायरोमोनोरेल का प्रयोग अलास्‍का की खानों में कुछ समय तक किया गया. 1980 के बाद शहरीकरण के बढ़ने के साथ साथ ही जापान और मलेशिया में इसका बेहतर इस्‍तेमाल किया गया. आज टोकियो मोनोरेल विश्‍व का सबसे व्‍यस्‍त नेटवर्क है, जिसका प्रयोग हर रोज एक लाख सत्‍ताइस हजार यात्री करते हैं.

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