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07 March 2018

राजनीतिक विचारधारा का लेफ्ट और राइट में बंटवारा, क्यों वामपन्थी नहीं स्वीकारना चाहते राष्ट्रवाद

भारत में राजनीति का इतिहास बहुत ही गहरा है जिसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं. भारत वो देश है जहाँ के हालात बहुत ही भिन्न रहे फिर वो चाहे हिन्दू राजाओं का दौर हो, मुस्लिम साम्राज्य का दौर हो या फिर अंग्रेजी शासन का दौर हो भारत दूसरों के द्वारा थोपी हुई विचारधारा के अधीन ही रहा जिसका कारण था राष्ट्रवाद की भावना का ना होना और देश के अपने ही लोगों में वैचारिक मतभेद. खैर राजा महाराजा एवं अंग्रेजों के दौर को मैं दुबारा दोहराना नहीं चाहता, यहाँ मेरा मकसद भारत में व्याप्त वामपन्थी और दक्षिणपन्थी विचारधाराओं से परिचय कराना है. वामपन्थी विचारधारा और दक्षिणपन्थी विचारधारा की वास्तिविकता यह है कि इनका जन्म हिंदुस्तान में हुआ ही नहीं “वामपन्थ” “दक्षिणपन्थ” ये दो शब्दावलियाँ जो यूरोपीय देशों के आतंरिक राजनीतिक संघर्षों की उपज मात्र है जिसका हिंदुस्तान से कोई लेना देना ना था और ना है.

वामपन्थ और दक्षिणपन्थ इन दो शब्दावलियों की उत्पत्ति पर नजर डालें तो ये फ़्रांस की क्रांति जो सन 1789 में हुई थी वहाँ से जन्मी हैं. 1779 में फ्रांस की नेशनल असेंबली दो धड़ों में बंट गई थी, जिनमें से एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग कर रहा था और दूसरा राजशाही के समर्थन में था. यह मांग जब आंदोलन का रूप लेने लगी तो तत्कालीन सम्राट लुई-16 ने नेशनल असेंबली की एक बैठक बुलाई जिसमें समाज के हर तबके के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस बैठक में सम्राट के समर्थकों को सम्राट के दाईं और क्रांति के समर्थकों को बाईं ओर बैठने को कहा गया था. फ़्रांस की क्रांति के बाद वहाँ की संसद में दो अलग धड़ बटे जिनको Left Wing वामपन्थी और Right Wing दक्षिणपन्थी कहा गया. राजनीति में विचारधारा के आधार पर पहले औपचारिक बंटवारे की शुरुआत इसी बैठक व्यवस्था से मानी जाती है. तब राजशाही समर्थकों को दक्षिणपंथी (राइटिस्ट या राइट विंग) और विरोधियों के वामपंथी (लेफ्टिस्ट या लेफ्ट विंग) कहा गया था. फ्रेंच नेशनल असेंबली में दाईं तरफ बैठने वाले लोग कुलीन, कारोबारी और धार्मिक तबके से थे, जबकि बाईं तरफ बैठने वाले ज्यादातर लोग आम नागरिक थे. यहां सम्राट के दाईं ओर बैठे यानी दक्षिण पंथ के लोग राजशाही के साथ-साथ स्थापित सामाजिक-आर्थिक परंपराओं के हिमायती थे. कुल मिलाकर ये अपनी संपत्ति और रसूख को कायम रखना चाहते थे, वहीं सम्राट के बाईं तरफ जुटे लोग यानी वाम पंथी सामाजिक समानता और नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे थे. वामपन्थियों को संसद में बाँयी तरफ और दक्षिणपन्थीयों को दाँयी तरफ बैठाला गया. यही से ये दोनों विचारधारायें तैरकर भारतवर्ष की जमीन तक आ पहुंची. पर आज भी ‘भारतीय संसद’ में दाँये और बाँये तरफ बैठने का कोई प्रावधान नहीं है.

वामपन्थी विचारधारा : इस विचारधारा का असल मलतब है समाज में पिछड़े लोगों को बराबरी पर लाना। यह विचारधारा धर्म , जाती , वर्ण , समुदाय , राष्ट्र और सीमा को नहीं मानती ; इसका वास्तविक कार्य है पिछड़ते लोगों को एक साथ एक मंच पर लाना। यह विचारधारा उन लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है जो किसी कारणवश समाज में पिछड़ गए हों, शक्तिहीन हो गए हों या उपेक्षा का शिकार हों ऐसे में ये वामपंथ विचारधारा उन सभी पिछड़े लोगों की लड़ाई लड़ती है और उनको सामान अधिकार देनें की मांग को रखती है। धर्मनिरपछिता भी इनका एक मुख्य बिंदु है. अगर आप इस विचारधारा की बातों को देखें तो ये सच में सबको लुभातीं हैं , मिश्री जैसी मीठी लगने वाली इनकी विचारधारा काश जमीनी स्तर पर भी मीठी होती तो आज वामपन्थ इतने बुरे हालात में ना होता. वामपंथ की अगुआई करनें वाली पार्टी मुख्य रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी है जिसे साम्यवादी दल की श्रेणीं में रखा जाता है. इसकी आधिकारिक रूप से स्थापना 26 दिसंबर सन 1925 को की गयी मगर वामपन्थी अपने आपको सन 1920 का मानते हैं.

दक्षिणपन्थी विचारधारा : ये विचारधारा वामपन्थ के ठीक विपरीत है जो विश्वास करती है धर्म में, राष्ट्र में और अपने धर्म से जुड़े रीति रिवाजों में. यह वो विचारधारा है जो सामाजिक स्तरीकरण या सामाजिक असमता को अपरिहार्य, प्राकृतिक, सामान्य या आवश्यक मानते हैं. इनकी खासियत यह है कि ये समाज की परम्परा, अपनी भाषा, जातीयता, अर्थव्यवस्था और धार्मिक पहचान को बढ़ाने की चेष्टा करते हैं. दक्षिणपन्थी की ये धारणा है कि प्राकृतिक नियमों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए और समाज को आधुनिकता के अलावा अपने पुराने रिवाजों को साथ लेकर भी चलना चाहिये. दक्षिणपन्थ की ये विचारधारा निश्चित तौर पर वामपन्थियों की तरह मीठी और लुभावनी नहीं लगती इनमें कड़वाहट का भाव तो है मगर इसकी जमीनी सच्चाई बहुत ज्यादा मजबूत है. दक्षिणपन्थ की अगुआई हमारे देश में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ‘ करता है, जो एक राष्ट्रवादी संगठन है जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं. संघ की स्थापना सन् 27 सितंबर 1925 को की गयी थी.

वामपन्थ और दक्षिणपन्थ की वैचारिक लड़ाई : इसका भी इतिहास बहुत पुराना है जिसमें अगर मैं झांक कर देखना चाहूँ तो उसमें काफी वक़्त लगेगा. चूँकि इन दोनों ही विचारों कि स्थापना एक ही साथ हुई है इस वजह से इनका आपसी युद्ध भी एक साथ ही शुरू हुआ. शुरुआत वामपंथ से करूँ तो आप देखेंगे कि ये वामपंथी साम्यवाद की राजनीती विगत कई वर्षों से कर रहे हैं. अपने विचारों में मिठास रखने वाले वामपंथी केवल जुबान और विचारों तक ही रह गए. वामपन्थ विचारधारा अतीत में भी लोकतंत्र में कोई खास मकाम हासिल नहीं कर सकी और आज वर्तमान में तो यह विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी है. “राष्ट्रवाद” को अपनाना वामपंथियों के विचार के विरूद्ध है जिसमें ये अपनी हार महसूस करते हैं लिहाजा ये राष्ट्रवाद के नारों से मीलों दूर है. अपनी मुख्य विचारधारा को बहुत आगे तक ले जाने में विफल रहे वामपन्थी जो धीरे धीरे सिकुड़ते चले गए और स्वयं विभाजन के शिकार हो गये – “भा.क.पा” से “मा.क.पा” और फिर “वाम मोर्चा दल” इसकी विफलता की गाथा सुनाते हैं.

अपने आप को गरीबों का मसीहा कहने वाले ये वामपंथी जब इनको जनता नें अपने हित के लिए चुना तब ये उनके साथ अपने विचारधारा के अनुरूप कुछ नहीं कर पाये. वामपंथियों के ये विचार – गरीबी मिटाओ, सामान हक दिलाओ, धर्मनिरपछिता लाओ, मजदूर शक्ति, एकता और आजादी की तमाम बातें जिनको वो जमीन पर नहीं उतार पाये बल्कि उसे एक राजनीतिक मोहरा बनाकर कमजोर व्यक्ति को शोषित करते रहे. सन 1925 से लेकर वर्तमान तक आते आते समानता व एकता की बात करने वाली ये पृथक्करण और अलगाववाद की राजनीति में उत्तर आयी जिसका उदहारण है ‘माओवाद’ एवम ‘नक्सलवाद‘. हँसुए-हथौड़े का चिन्ह लिए ये वामपन्थी अपने हाथ में अब बन्दूख उठा चुके हैं. अब ये समानता की लड़ाई लोकतान्त्रिक तरीके से नहीं बल्कि गोली और बन्दूख से लड़ना चाहते हैं. राजनितिक बिसात पर धराशाही हो चुके ये वामपंथी अब अपनी विफलता का ठीकरा दक्षिणपन्थी समूह पर फोड़ना चाहते हैं लिहाजा अब ये सीधे तौर पे “तू तू” “मैं मैं” पर उत्तर आये हैं. ये आश्चर्य की बात है कि चंद बौद्धिक प्राणी इन वामपंथियों के अतीत , करतूत को नजरअंदाज करके अभी भी इनके साथ खड़े हैं और इनके झूठे सुर से सुर मिला रहे हैं. लोकतंत्र में अपनी पराजय का बदला ये अब भारत के शिक्षण संस्थानों को दूषित कर के लेना चाहते हैं. भारत के इतिहास से छेड़खानी करके भी ये कुछ न कर पाए अब ये भारत की नस्ल से छेड़खानी करना चाहते हैं. JNU, DU के अलावा अन्य प्रसिद्ध विद्यालयों में पनपता वामपन्थ अपने देश विरोधी नारों, कश्मीर की आजादी जैसे ज्वलंत मुद्दों के साथ अपने अस्तित्व को बचानें का प्रयास कर रहा है.

आपको बता देना चाहता हूँ की सन 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन जो महात्मा गाँधी द्वारा चलाया गया उसमें भी वामपन्थियों नें साथ नहीं दिया और इन्होंने महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस की तीखी निंदा की यहाँ तक कि भारत छोड़ो आंदोलन को विफल करने के लिए ये वामपन्थी संगठन अंग्रेजी हुकूमत से जा मिले. एक समय ऐसा भी आया जब इन्होंने राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी और कांग्रेस को प्रक्रियावादी की संज्ञा तक दे डाली। अपनी जिद पर अड़े वामपंथियों को कभी गाँधी की विचारधारा भी पसंद नहीं आयी, हालांकि कांग्रेस फिर भी इनके साथ चलती रही और भारतवर्ष का निर्माण भी इन्होंने वामपंथी विचारधारा पर ही किया जिसका उदहारण है शिक्षण संस्थानों में भारत के इतिहास से छेड़ छाड़. भारत के युवाओं/युवतिओं को अपने पाठ्यक्रम में वामपन्थी विचारधारा ही पढ़ने को मिलता है जिसमें अकबर और सिकंदर तो ‘महान’ हैं लेकिन ‘बाजीराव पेशवा’ और सम्राट ‘अशोक मात्र’ एक राजा. हरवीर सिंह गुलिया, हरि सिंह नालवा, हरिहर-बुक्का राय का तो नाम लेते ही हमारी युवा पीढ़ी इनको पहचान नहीं पाती और इधर उधर देखने लगती है. आखिर क्यों इनको छुपा कर रखा गया हैं ? इनके पराक्रम के बारे में देश को क्यों नहीं बताया गया ? चरक, सुश्रुत, चाणक्य, नागार्जुन, आर्यभट्ट, रामानुजन, विवेकानंद, बुद्ध, महावीर के देश में इतिहास केवल “मुग़ल बादशाहों” तक ही सीमित कर दिया गया.

राष्ट्रवाद वामपन्थ विचारधारा से मेल नहीं खाता क्योंकि राष्ट्रवाद इनके लिए एक बन्धन है. ये भली भाँति जानते हैं कि राष्ट्रवाद की स्वीकृति वामपन्थ विचारधारा का समूल नाश कर देगी इसलिए राष्ट्रवाद को अपना दुश्मन मानते हैं. आज शिक्षण संस्थानों में बैठे बौद्धिकता के नाम पर वामपन्थी लोग “राष्ट्र विरोध” को अपना चरित्र मान बैठे हैं. ये स्व घोषित बौद्धिक प्राणी को अपनें मित्रों द्वारा किया जा रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा. ये बौद्धिक और वामपन्थी आज देश के जंगलों में हथियार लिए घूम रहे हैं, सेना पे हमला करने के लिए घात लगा के बैठे हैं. दरअसल ये कोई बौद्धिक लोग नहीं हैं ये हैं कट्टर वामपन्थी जिनको माओवादी संगठन और नक्सलवादी संगठन के नाम से जाना जाता है जो आज देश में उग्रवाद का रूप ले चुका है. इतना सब करनें के बाद भी ये वामपन्थी जो सन 1925 से लेकर आज तक अपने वजूद को मजबूत नहीं कर पाये. सम्पूर्ण विश्व और भारतीय पृष्टभूमि में हुई इनकी हार का नतीजा यह है कि आज ये केवल केरल और पश्चिम बंगाल तक ही सिमित रह गये हैं. मजदूर एकता, समानता, आजादी और स्व घोषित बौद्धिकता की आड़ में विभाजनकारी मानसिकता इनको पूरे हिंदुस्तान में ले डूबी है.

संघ की अवधारणा : राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की अवधारणा के अनुरूप ये कहा जाता है – “एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे” इसका सीधा अर्थ यह है कि जब समूचे राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र में बाँधा गया है तो फिर धर्म के नाम पर अलग अलग कानून का होना समझ के परे है. जैसे ही संघ समान नागरिक संहिता की बात कहता है उसे उसे सांप्रदायिक होनें की संज्ञा दे दी जाती है. अखण्ड भारत का नारा बुलन्द करने वाला संघ जिसे वामपन्थी मिलकर साम्प्रदायिक घोषित कर देते हैं और देश की जनता भी यही सच मान बैठती है. पहले सम्पूर्ण हिन्दू धर्म जम्बू द्वीप पर शासन करता था, कुछ समय उपरांत उसका शासन घट कर भारतवर्ष तक सिमित हो गया. ‘कुरुओं’ और ‘पुरुओं’ की लड़ाई के बाद आर्यावर्त नामक एक नए क्षेत्र का जन्म हुआ जिनके अन्तर्गत वर्तमान हिन्दुस्तान के कुछ हिस्से सम्पूर्ण पाकिस्तान और सम्पूर्ण अफगानिस्तान का क्षेत्र था. लेकिन मध्यकाल में हुये हिन्दुओं पे आक्रमण, धर्मपरिवर्तन और युद्ध के चलते सम्पूर्ण हिन्दू जम्बू द्वीप जो आज घटकर सिर्फ हिन्दुस्तान का टुकड़ा रह गया. आज का हिंदुस्तान जिसे हम भारतवर्ष कहते हैं हकीक़त में वो सिर्फ एक छोटा सा टुकड़ा है. वामपन्थी विचारधाराओं की लड़ाई के चलते हिन्दुस्तान टुकड़ों में विखण्डित होता चला गया मगर इतने टुकड़े करने के बाद भी हिन्दुस्तान में कश्मीर की आजादी की मांग का उठना दुःख की बात है. 

हिन्दू धर्म में समाहित पूरा “जम्बू द्वीप” टूटते-टूटते आज सिर्फ खिलौना मात्र रह गया है. वामपन्थ उदारवादी विचारधारा और आजादी के नारों नें हमें क्या दिया ये इतिहास में झाँक कर देखना चाहिए मगर आश्चर्य है हिंदुस्तान कि अखण्डता की वकालत करने वाला “संघ” साम्प्रदायिक करार दिया जाता है वो भी अपनें लोगों के द्वारा ही. ये ध्रुव वामपन्थी और मध्य वामपन्थी हिन्दुस्तान की सत्ता पे काबिज़ रहे तो भारतवर्ष का और कई भागों में टूटना तय है. सोवियत संघ के टूटने के बाद पूर्वी यूरोप के देशों नें जिस तरह वामपन्थ विचारधारा को दरकिनार किया अब भारतवर्ष को भी ऐसा ही करना होगा. युवा जानकारी के आभाव में वामपन्थी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए हैं मगर उन्हें याद रखना होगा कि ये एक विचारधारा नहीं बल्कि एक मीठा जहर है. खुद को राष्ट्रवाद से जोड़कर भारत को अखण्ड बनायें. राष्ट्रवाद भारतवर्ष को जोड़ने का कार्य करता है इसका मजाक ना बनायें.

कब क्या खोया भारतवर्ष नें :
1 : अफगानिस्तान अलग हुआ – सन 1876 में
2 : पाकिस्तान अलग हुआ – सन 1947 में
3 : पाक अधिकृत कश्मीर अलग हुआ – सन 1948 में
4 : चीनी कब्ज़ा – 1962 युद्ध के बाद
5 : तिब्बत अलग हुआ – सन 1914 में
6 : भूटान अलग हुआ – सन 1905 में
7 : बांग्लादेश अलग हुआ – सन 1947 में
8 : म्यानमार अलग हुआ – सन 1937 में

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