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21 March 2018

कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश को मंजूरी दी

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने 19 मार्च 2018 को लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की मांग मंजूर कर ली है. इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए केंद्र के पास भेजा गया है. लिंगायत की मांग पर विचार करने के लिए नागमोहन दास समिति गठित की गई थी. राज्य की कैबिनेट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है. कर्नाटक ने इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र के पास भेज दिया है. लिंगायत समाज को कर्नाटक के अगड़ी जातियों में गिना जाता है. कर्नाटक में करीब 18 प्रतिशत लिंगायत समुदाय के लोग हैं. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा इसी समुदाय से आते हैं. शिवराज सिंह चौहान भी लिंगायत हैं.

लिंगायत समुदाय वर्षों से हिंदू धर्म से अलग होने की मांग करता रहा है. समुदाय की मांगों पर विचार के लिए नागमोहन दास समिति गठित की गई थी. राज्य कैबिनेट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है. कर्नाटक ने इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र के पास भेजा है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला ऐसे समय किया है, जब अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने हैं. लिंगायत को कर्नाटक में फिलहाल ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी 10 से 17 फीसद है. लिंगायत का विधानसभा की तकरीबन 100 सीटों पर प्रभाव माना जाता है. लिंगायत समुदाय के प्रतिनिधि रविवार (18 मार्च) को मुख्यमंत्री से मिलकर समिति की सिफारिशों को लागू करने की मांग की थी, जिसे सोमवार (19 मार्च) को स्वीकार कर लिया.

अलग धर्म का दर्जा देने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास है. राज्य सरकारें इसको लेकर सिर्फ अनुशंसा कर सकती हैं. लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा मिलने पर समुदाय को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25-28) के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा भी मिल सकता है. इसके बाद लिंगायत समुदाय अपना शिक्षण संस्थान भी खोल सकता है. फिलहाल मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन को अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल है. भाजपा लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग करने की मांग का विरोध करती रही है.

लिंगायत कौन हैं जानिये....
बारहवीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने हिंदुओं में जाति व्यवस्था में दमन के खिलाफ आंदोलन आरंभ किया था. उस आंदोलन के दौरान बासवन्ना ने वेदों को खारिज किया और वह मूर्ति पूजा के भी खिलाफ थे. आम मान्यता यह है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही हैं. वहीं लिंगायतों का मानना है कि वीरशैव लोगों का अस्तित्व बासवन्ना के उदय से भी पहले था और वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं. लिंगायत समुदाय के लोगों का कहना है कि वे शिव की पूजा नहीं करते बल्कि अपने शरीर पर इष्टलिंग धारण करते हैं. यह एक गेंदनुमा आकृति होती है, जिसे वे धागे से अपने शरीर से बांधते हैं. लिंगायत इष्टलिंग को आंतरिक चेतना का प्रतीक मानते हैं. बासवन्ना का अनुयायी बनने के लिए जिन लोगों ने अपने धर्म को छोड़ा वे बनजिगा लिंगायत कहे गए.

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