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15 May 2018

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस हर वर्ष 15 मई को मनाया जाता है. 1993 में, संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने यह फैसला किया कि प्रत्येक वर्ष 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के रूप में मनाया जाएगा. क्योंकि पश्चिम सभ्यता में  परिवार टूट कर बिखर रहे हैं. पहले पश्चिम में भी संयुक्त परिवार थे लेकिन धीरे- धीरे पहले संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार रह गये.  फिर माँ बाप से शादी के बाद विवाहित जोड़ा अलग हो गया उसने अपना घोसला बसा लिया. वृद्धावस्था में बूढ़े या तो अकेले निराश्रित रह जाते या उन्हें वृद्धाश्रम में जाना पड़ता अब वहीं उनको बाकी बचा जीवन काटना है
उनके जन्म दिन या पेरेंट डे के दिन माँ बाप को उनका बेटा याद कर ले एक गुलदस्ता भेज दे उससे वह  खुश हो जाते हैं. दम्पति इस भय से उनका बुढापा कैसे गुजरेगा अपने भविष्य की चिंता करने लगे हैं. लड़के एक उम्र बाद घर छोड़ कर चले जाते हैं उन्हें अपने माता पिता द्वारा की जाने वाली टोका टिप्पणी पसंद नहीं आती.

भारत मुख्यत: एक कृषि प्रधान देश है. यहाँ की पारिवारिक रचना कृषि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गयी है. इसके अतिरिक्त भारतीय परिवार में परिवार की मर्यादा और आदर्श परंपरागत है. विश्व के किसी अन्य समाज़ में गृहस्थ जीवन की इतनी पवित्रता, स्थायीपन, और पिता - पुत्र, भाई - भाई और पति - पत्नी के इतने अधिक व स्थायी संबंधों का उदाहरण प्राप्त नहीं होता. भारत में कुछ अपवादों को छोड़ कर परिवार का सदैव महत्व रहा है. इसलिए ऐसे किसी दिन की जरूरत ही नहीं थी जिसे परिवार दिवस कहा जाये लेकिन धीरे-धीरे पहले संयुक्त परिवार टूटे क्योंकि रोजी रोटी के लिए घर त्यागना पड़ता हैं. शहरों में जाने से एकल परिवार रह गये लेकिन तीज त्योहारों पर अपने घर आते थे और मिल कर त्यौहार मनाये जाते थे दिवाली ,होली और छट पूजा पर सभी अपने घर जा कर त्यौहार सबके साथ मनाना पसंद करते हैं. पश्चिम की हवा ने भारत में भी अपना प्रभाव फैलाना शुरू कर दिया. 

प्राणी जगत में परिवार सबसे छोटी इकाई है या फिर इस समाज में भी परिवार सबसे छोटी इकाई है. यह सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है. परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है. प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिवार का सदस्य रहा है या फिर है. उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है. हमारी संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों को स्वीकार करके अपने को परिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई. वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है. उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है. हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं.

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