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20 June 2018

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की 11वीं कॉमन रिव्यु मिशन रिपोर्ट जारी

नेशनल हेल्थ मिशन को लागू हुए 13 साल बीत चुके हैं, लेकिन अब भी कई राज्यों में लोगों को इसका पूरा फायदा नहीं मिल रहा है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की 11 वीं कॉमन रिव्यु मिशन (CRM) रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2013 से एमएमआर में 22% की कमी दर्ज की है, जो एमएमआर के पहले दौर के अनुसार एमएमआर में पिछले सभी कटौती की तुलना में अब तक की सबसे उच्चतम (प्रतिशत में)  गिरावट है. 2011-2013 में भारत में मातृ मृत्यु दर 167 से घटकर 2014-2016 में 130 हो गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों को सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. आम लोगों की जेब से पैसा खर्च होना चिंता की बात है. सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा और सभी तरह के इलाज की सुविधाओं के लिए विभिन्न योजनाओं के बावजूद कई राज्यों में लोगों को अपनी जेब से पैसे खर्च करने की सूचना मिली. 
 
इस रिपोर्ट के मुताबिक, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में डायबीटिज और हाइपरटेंशन जैसी क्रॉनिक डिजीज के इलाज में लोगों को काफी पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. मरीजों और उनके रिश्तेदारों को इन बीमारियों के लिए अस्पताल के बाहर से मेडिसिन खरीदने में अपने जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं. एनएचएम की इस रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में मरीज की देखभाल के लिए अस्पताल कर्मचारियों को घूस तक देने पड़ते हैं. वहीं मरीज को अस्पताल लाने-ले जाने के लिए भी उनके रिश्तेदारों को ही पैसे खर्च करने पड़ते हैं.

गर्भवती महिलाओं की सेहत और सुरक्षित डिलिवरी के लिए सरकार की तरफ से जननी सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) चलाया जा रहा है. इसके तहत गर्भवास्था के दौरान होनेवाली सभी प्रमुख जांचों से लेकर, टीकाकरण, बच्चे की डिलीवरी, मेडिसिन और अस्पताल आने-जाने की सभी सुविधाओं की मुफ्त व्यवस्था है. लेकिन एनएचएम की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई राज्यों में लोगों को इसके लिए 5000 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गैर-संक्रामक बीमारियों के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के बावजूद सर्वाइकल कैंसर की जांच की सुविधा की काफी कमी है. साथ ही हर लेवल के हेल्थ सेंटर पर कर्मचारियों की काफी कमी है.

देशभर में टीबी के मरीजों लिए मुफ्त में 'डॉट्स' (दवा) की व्यवस्था है. लेकिन एनएचएम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में टीबी की दवा की काफी कमी रहती है. देशभर में फैमिली प्लानिंग की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है. एनएचएम की रिपोर्ट के मुताबिक, साल-2017-18 के दौरान पिछले साल अक्टूबर तक देशभर में कुल 14,73,418 नसबंदी हुई. इनमें 93.1% फीसदी महिलाओं ने इसे कराया, जबकि पुरुषों की भागीदारी महज 6.8 फीसदी की रही.

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