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06 September 2018

विधि आयोग ने ‘परिवार कानून में सुधार’ हेतु परामर्श पत्र जारी किया

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर विधि आयोग की अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि फिलहाल देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है. आयोग ने मौजूदा कॉमन लॉ और अन्य कानून में बदलाव के साथ-साथ उसपर अमल की जरूरत बताई है. आयोग ने कहा कि वयस्कों के बीच शादी की अलग अलग उम्र की व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए. दरअसल, विभिन्न कानूनों के तहत, शादी के लिए महिलाओं और पुरुषों की शादी की कानूनी उम्र क्रमश: 18 वर्ष और 21 वर्ष है. गौरतलब है कि केंद्र की मोदी
सरकार ने 17 जून 2016 को समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था. 

'परिवार कानून में सुधार' पर अपने परामर्श पत्र में आयोग ने कहा कि अगर बालिग होने की सार्वभौमिक उम्र को मान्यता है जो सभी नागरिकों को अपनी सरकारें चुनने का अधिकार देती है तो निश्चित रूप से, उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने में सक्षम समझा जाना चाहिए. बालिग होने की उम्र (18 साल) को भारतीय बालिग अधिनियम 1875 के तहत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए शादी की कानूनी उम्र के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए. पत्र में कहा गया है कि पति और पत्नी के लिए उम्र में अंतर का कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि शादी कर रहे दोनों लोग हर तरह से बराबर हैं और उनकी साझेदारी बराबर वालों के बीच वाली होनी चाहिए.

विधि आयोग ने पत्र में कहा कि इस समय समान नागरिक संहिता की ‘न तो जरूरत है और ना ही वांछित’. समान नागरिक संहिता पर पूर्ण रिपोर्ट देने की बजाए विधि आयोग ने परामर्श पत्र को तरजीह दी क्योंकि समग्र रिपोर्ट पेश करने के लिहाज से उसके पास समय का अभाव था. परामर्श पत्र में कहा गया कि समान नागरिक संहिता एक व्यापक मुद्दा है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गए हैं. इसलिये दो वर्षों के दौरान किए गए विस्तृत शोध और तमाम परिचर्चाओं के बाद आयोग ने भारत में पारिवारिक कानून में सुधार को लेकर यह परामर्श पत्र प्रस्तुत किया है. पत्र में कहा गया है की मौजूदा पर्सनल कानूनों में सुधार की ज़रूरत है. धार्मिक परम्पराओं और मूल अधिकारों के बीच सामंजस्य बनाने की ज़रूरत है. ट्रिपल तलाक़ ना तो धार्मिक परम्पराओं और ना ही मूल अधिकारों से जुड़ा है. कमीशन के मुताबिक एकतरफा तलाक़ की स्थिति में घरेलू हिंसा रोकथाम कानून और IPC की धारा 498 के तहत सजा मिलनी चाहिए. मुस्लिम में बहुविवाह का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए कमीशन ने कहा कि वो फिलहाल इसकी सिफारिश नही कर रहा है.

रिपोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकाहनामा पर विचार करने के लिए कहा गया. लॉ कमीशन ने सभी धर्मो के illegitimate बच्चों के लिए स्पेशल कानून बनाने की सिफारिश की है. कहा गया है कि इन बच्चों को अपने माता-पिता की सम्पति में बराबर हक़ मिलना चाहिए. लॉ कमीशन ने स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में बदलाव की बात की है. अभी शादी को कानूनी मान्यता देने से पहले परिवार वालों को 30 दिन का नोटिस पीरियड दिया जाता है. लॉ कमीशन ने कहा कि ये पीरियड ख़त्म होना चाहिए और कपल को सुरक्षा दी जानी चाहिए. कमीशन का मानना है कि इस पीरियड को अंतर्जातीय शादी का विरोध करने वाले परिवार वाले ग़लत इस्तेमाल करते है, साथ ही ये महज शादी के लिए धर्मांतरण को बढ़ावा देता है. कमीशन ने कहा है कि शादी के लिए लड़का लड़की के उम्र में मौजूदा अन्तर खत्म किया जाना चाहिए.

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