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13 September 2018

चुनाव आयोग ने राज्य सभा और विधान परिषद चुनावों से ‘नोटा’ विकल्प हटाया

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों के मतपत्रों से 'उपर्युक्त में से कोई भी नहीं' (नोटा) विकल्प मंगलवार को वापस ले लिया. बता दें उच्चतम न्यायालय ने 21 अगस्त को कहा था कि राज्यसभा चुनाव के मतपत्र में नोटा का विकल्प नहीं होगा. लोकसभा और राज्य विधानसभाओं जैसे प्रत्यक्ष चुनावों में नोटा एक विकल्प के रूप में जारी रह सकता है. फैसले के आलोक में चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के प्रमुख निर्वाचन अधिकारियों को जारी एक आदेश में कहा, 'राज्यसभा चुनाव और विधान परिषद चुनाव में अब नोटा का विकल्प नहीं होगा.' इसमें कहा गया है कि अब से इन चुनावों के मतपत्रों में नोटा के लिए कॉलम मुद्रित नहीं किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा लागू करना पहली निगाह में बुद्धिमत्तापूर्ण लगता है, लेकिन अगर उसकी पड़ताल की जाए तो ये आधारहीन दिखता है क्योंकि इसमें ऐसे चुनाव में मतदाता की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया गया है, इससे लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास होता है. कोर्ट के अनुसार, शुरुआत में यह सोच आकर्षक लग सकती है लेकिन इसके व्यवहारिक प्रयोग से अप्रत्यक्ष चुनावों में समाहित चुनाव निष्पक्षता समाप्त होती है. वह भी तब जबकि मतदाता के मत का मूल्य हो और वह मूल्य ट्रांसफरेबल हो. ऐसे में नोटा एक बाधा है. कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा लागू करने से न सिर्फ संविधान के दसवीं अनुसूची मे दिये गए अनुशासन का हनन होता है (अयोग्यता के प्रावधान) बल्कि दल बदल कानून में अयोग्यता प्रावधानों पर भी विपरीत असर डालता है.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का विकल्प दिया गया है जिसे आप चुनाव में अपने पंसद के प्रत्याशी न होने पर नोटा बटन का प्रयोग कर सकते हैं. इंडिया में नोटा 2013 में सुप्रीम कोर्ट के दिये गए एक आदेश के बाद शुरू हुआ. पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जनता को मतदान के लिये नोटा का भी विकल्प उपलब्ध कराया जाए. भारत नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने वाला विश्व का 14वाँ देश है.

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