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30 September 2018

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सुधार प्रक्रिया को लेकर जी-4 देशों के बीच बैठक संपन्न

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सुधार प्रक्रिया को लेकर जी-4 देशों के बीच बैठक आयोजित की गई. इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सुधार प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं होने पर जी-4 देशों भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने चिंता जताई है. इन देशों के विदेश मंत्रियों ने कहा कि यह प्रक्रिया लंबे समय से ठंडे बस्ते में है. संयुक्त राष्ट्र की इस शक्तिशाली संस्था के औचित्य और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए इसमें शीघ्र सुधार की जरूरत है. इस बैठक के बाद जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया, 'विदेश मंत्रियों ने सुरक्षा परिषद में सुधार के मसले पर चर्चा की और अपने राजनयिकों को सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के तरीकों पर गौर करने को कहा. सुधार की इस प्रक्रिया को अंतर सरकारी वार्ता के तौर पर जाना जाता है. जी-4 के चारों देश सुरक्षा परिषद में सुधार के प्रमुख पक्षधर हैं. विदेश मंत्रियों द्वारा दिये
गए सामूहिक बयान में संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था की कार्यपद्धति को मज़बूत करने के साथ-साथ एक-दूसरे की उम्मीदवारी के लिये उनके समर्थन पर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई.

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ब्रिक्स समूह के सदस्यों से कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में काफी समय से लंबित सुधारों को हासिल करने के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदस्यों के बीच मतभेद नहीं होने चाहिए और इस मुद्दे पर उन्हें दृढ़ता से बात रखनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र महासभा के 73वें सत्र से इतर गुरुवार को ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए स्वराज ने कहा कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के पांच सदस्यीय समूह की शुरुआत एक दशक पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों में यथास्थिति खत्म करने और बहुपक्षवाद की विकृतियों को सुधारने के लिए हुई थी. उन्होंने कहा कि एक दशक बाद बहुपक्षवाद का आह्वान इस यथास्थिति को मजबूत करने के लिए नहीं, बल्कि उसे बदलने का होना चाहिए. स्वराज ने कहा कि व्यापक स्तर पर अगर ब्रिक्स को ज्यादा मजबूत होकर उभरना है, तो हमें आने वाले वर्षों में साझे सरोकार के मुद्दों पर बेहतर समझ और सहमति विकसित करना होगी. 

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुपक्षवाद में सुधार के आह्वान का जिक्र करते हुए कहा कि अभी तक अधूरा रहने वाले सबसे अहम एजेंडा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का है. विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधार पर चर्चा अनंत काल की कवायद नहीं हो सकती, जबकि सुरक्षा परिषद की वैधता और साख का लगातार क्षरण हो रहा है. ब्रिक्स में अतंरराष्ट्रीय शासन के अहम क्षेत्र में आपस में विभाजित होने की जगह हमें ज्यादा मजबूत आवाज में अपनी बात रखनी चाहिए. स्वराज ने आतंकवाद निरोध पर संयुक्त कार्रवाई के लिए ब्रिक्स देशों की रणनीति को रेखांकित करते हुए कहा कि आतंकवादी संगठनों के समर्थन के बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करना पहला कदम होगा. लश्कर-ए-तैयबा, आईएसआईएस, अल-कायदा, जैश-ए-मोहम्मद, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकवादी संगठन ऐसे संगठित गिरोह हैं, जो सरकारी समर्थन पर फलते-फूलते हैं.

विदेश मंत्री ने ब्रिक्स देशों से आग्रह किया कि वे आतंवादियों और उनके संगठनों को सूचीबद्ध करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद निरोधी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए हाथ मिलाएं. उन्होंने कहा कि सभी अधिकार-क्षेत्रों में एफएटीएफ (वित्तीय कार्रवाई कार्यबल) मानकों का क्रियान्वयन आतंकवाद से निबटने में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को मजबूत करेगा. स्वराज ने कहा कि पिछले दशक में ब्रिक्स ने अनेक प्रभावशाली कदम उठाये और उसे आगे ले जाने के लिए पांच देशों के इस मंच को और भी मजबूत बनाने की जरूरत है. इस बैठक में ब्राजील के विदेश मंत्री अलॉयसियो नून्स फेरेरा फिल्हो, रूस के विदेश मंत्री सर्जेइ लावराव, चीन के विदेश मंत्री वांग यी और दक्षिण अफ्रीका की विदेशी संबंध एवं सहयोग मंत्री लिंडिवे सिसुलू शामिल हुए.

जी-4 समूह: सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग के लिये जापान, जर्मनी, भारत और ब्राज़ील ने जी 4 के नाम से एक गुट बनाया है और स्थायी सदस्यता के मामले में एक-दूसरे का समर्थन करते हैं. सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में विस्तार का यूएफसी देश विरोध करते हैं. इनमें इटली, पाकिस्तान, मैक्सिको, मिस्र, स्पेन, अर्जेंटीना और दक्षिण कोरिया जैसे 13 देश शामिल हैं, जिन्हें 'कॉफ़ी क्लब' कहा जाता है. यह देश स्थायी सदस्यता के विस्तार के पक्षधर न होकर अस्थायी सदस्यता के विस्तार के समर्थक हैं.

सुरक्षा परिषद: यह संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है, जिसका गठन द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में हुआ था और इसके पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और चीन) हैं. सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है. इन देशों की सदस्यता दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के उस शक्ति संतुलन को प्रदर्शित करती है, जब सुरक्षा परिषद का गठन किया गया था. इन स्थायी सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देशों को दो साल के लिये अस्थायी सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है. स्थायी और अस्थायी सदस्य बारी-बारी से एक-एक महीने के लिये परिषद के अध्यक्ष बनाए जाते हैं.

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