मासिक करेंट अफेयर्स

16 October 2018

वैज्ञानिकों ने विश्व की पहली बायोइलेक्ट्रिक मेडिसिन विकसित की

अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी तथा वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन द्वारा दावा किया गया है कि उन्होंने विश्व की पहली बायोइलेक्ट्रिक मेडिसिन विकसित की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दवा को शरीर में इंप्लांट किया जा सकता है. यह एक बायोडिग्रेडेबल वायरलेस डिवाइस है, जो तंत्रिकाओं के रीजनरेशन तथा क्षतिग्रस्त तंत्रिकाओं के उपचार में सहायक है. माना जा रहा है कि यह खोज भविष्य में तंत्रिका कोशिकाओं के उपचार के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती है.

ज्ञात हो कि बायोइलेक्ट्रॉनिक दवा एक किस्म की वायरलेस डिवाइस होती है, इसे शरीर के बाहर एक ट्रांसमीटर द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है. एक बार इंप्लांट करने के बाद यह अगले दो सप्ताह तक शरीर में कार्य कर सकती है. एक निश्चित अवधि के उपरांत यह दवा स्वतः ही शरीर में सोख ली जाती है. इसका आकार एक छोटे सिक्के जितना और मोटाई कागज के बराबर होती है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि इसका प्रयोग सबसे पहले चूहों पर किया गया था जिसमें काफी सकरात्मक रिजल्ट देखे गए थे. इस प्रयोग में पाया गया कि चूहों में बायोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस सर्जिकल रिपेयर प्रक्रिया के बाद नियमित रूप से तंत्रिकाओं के क्षतिग्रस्त हिस्से को इलेक्ट्रिक इंपल्स देती है. इससे उन चूहों की टांगों में तंत्रिका कोशिकाओं में पुनः वृद्धि हुई और बाद में उनकी मांसपेशी की मजबूत व नियंत्रण में भी बढ़ोत्तरी दर्ज हुई.

गौरतलब है कि इस प्रकार की दवा से सीधे ही शरीर के क्षतिग्रस्त भाग अथवा इलाज की जरूरत वाले हिस्से पर काम किया जा सकेगा. साथ ही इसमें साइड इफेक्ट का खतरा भी काफी कम होगा. इस इम्प्लांट को शरीर में स्थापित करने के बाद उसकी देखरेख करने की अधिक चिंता नहीं करनी होगी, क्योंकि यह अपने आप ही शरीर द्वारा सोख ली जाती है. चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि आने वाले भविष्य में इस प्रकार की दवा फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में एक नई क्रांति का कारण बन सकती है.

No comments:

Post a comment