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02 November 2018

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2018 जारी की

वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा हाल ही में लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2018 जारी की गई. इस रिपोर्ट में वन्यजीवन पर मानवीय गतिविधियों के भयानक प्रभाव की चर्चा की गई है. रिपोर्ट ‘लिविंग प्लैनेट’ के मुताबिक 1970 से 2014 के बीच कशेरुकी (रीढ़ वाले) प्राणियों की 60 फीसदी आबादी खत्म हो चुकी है. 2010 तक इनकी आबादी 48 प्रतिशत बची थी. जाहिर है, इनका तेजी से खात्मा हो रहा है और इसके लिए हम जिम्मेदार हैं. दुनिया भर के 59 विशेषज्ञों के समूह ने यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने अध्ययन में पक्षी, मछली, स्तनधारी, उभयचर और सरीसृप की अलग-अलग करीब चार हजार प्रजातियों को शामिल किया. स्टडी में पाया गया कि मनुष्य की आबादी पिछले पचास सालों में दोगुनी हुई है, जिसका असर पृथ्वी के अन्य जंतुओं पर पड़ रहा है. अफ्रीकी हाथी जैसी प्रजातियों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है. पिछले दस साल में ही इनकी आबादी एक तिहाई कम हो गई है. ताजे पानी में रहने वाले जीवों के लिए खतरा तेजी से बढ़ रहा है. नदियों और झीलों के प्रदूषण की वजह से 83 फीसद जलीय जीव खत्म हो चुके हैं. 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर इन्हें संरक्षित करने के लिए तत्काल जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो इनकी कई और जातियां विलुप्त हो जाएंगी, जिससे मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी खतरा पैदा हो जाएगा. दुनिया भर के पर्यावरणवादी लगातार यह दोहराते रहते हैं कि जैव विविधता संकट में है, इसे बचाने की जरूरत है, पर हम पर्यावरण और परिवेश से संबंधित मामलों को महज एक अकादमिक बहस मानकर इनसे मुंह फेर लेते हैं, या इस पर सेमिनार, नुक्कड़ नाटक, मैराथन दौड़ आयोजित करके अपना कर्तव्य समाप्त मान लेते हैं. जबकि जैव विविधता के संरक्षण के लिए पूरी जीवन-पद्धति में बुनियादी बदलाव की जरूरत है. पर्यावरण से संबंधित जो कानून बने हैं, उनका सख्ती से पालन करना होगा. विकास योजनाओं का स्वरूप ऐसा रखना होगा, जिससे प्रकृति को कम से कम नुकसान हो. 

वर्तमान में दुनिया के कुल स्तनधारी जीवों के सिर्फ 4 प्रतिशत जंगली जानवर हैं. वहीं मानव 36 प्रतिशत हैं और पशुधन (पालतू जानवर) 60 प्रतिशत हैं. 80 पृष्ठों की इस रिपोर्ट को 59 शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मानव ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोककर रख पाते हैं तो भी कोरल मोर्टालिटी (समुद्री जीवों की मौत) 70 से 90 प्रतिशत रहने की संभावना है.

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