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17 December 2018

अमिताव घोष को मिला 2018 का ज्ञानपीठ पुरस्कार

अंग्रेजी  के प्रतिष्ठित साहित्यकार अमिताव घोष को साल 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया है. इस सम्मान को पाने वाले वह अंग्रेजी के पहले लेखक हैं. जानकारी अनुसार शुक्रवार को प्रतिभा रॉय की अध्यक्षता में आयोजित ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में अंग्रेजी लेखक अमिताव घोष को इस साल लिए यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया. देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में अमिताव घोष को 11 लाख रूपए, वाग्देवी की प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा. बता दें कि अंग्रेजी को तीन साल पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार की भाषा के रूप में शामिल किया गया था और घोष इस सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक हैं.

अमिताव घोष का जन्म 11 जुलाई 1956 को कोलकाता में हुआ था. वे दिल्ली के सेंट स्टीफेन कॉलेज और 'दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' से उच्च शिक्षा ग्रहण किये. स्कालरशिप मिलने पर उन्होंने ऑक्सफोर्ड के सेंट एडमंड हॉल से सोशल एंथ्रोपोलॉजी में डीफिल किया. उन्होंने पहली नौकरी बतौर पत्रकार नई दिल्ली स्थित इंडियन एक्सप्रेस में की. इसके बाद उन्होंने देश--विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया. अमिताव घोष अंग्रेज़ी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं. इनके द्वारा रचित एक उपन्यास द शैडो लाइन्स के लिये उन्हें वर्ष 1989 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. घोष इससे पहले साहित्य अकादमी और पद्मश्री सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं. 62 वर्षीय घोष को लीक से हटकर काम करने वाले रचनाकार के तौर पर जाना जाता है. घोष को साहित्य अकादमी और पद्मश्री सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. उनकी प्रमुख रचनाओं में  'द सर्किल ऑफ रीजन', 'द शेडो लाइन', 'द कलकत्ता क्रोमोजोम', 'द ग्लास पैलेस', 'द हंगरी टाइड', 'रिवर ऑफ स्मोक' और 'फ्लड ऑफ फायर' प्रमुख हैं. वषर्ष 2016 में प्रकाशित उनकी सबसे नई किताब 'द ग्रेट डीअरेंजमेंट : क्लाइमेट चेंज एंड द अनथिंकबल' नॉनफिक्शन थी.

ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है. भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई 22 भाषाओं में से किसी भाषा में लिखता हो इस पुरस्कार के योग्य है. पुरस्कार में ग्यारह लाख रुपये की धनराशि,प्रशस्तिपत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा दी जाती है. 1965 में 1 लाख रुपये की पुरस्कार राशि से प्रारंभ हुए इस पुरस्कार को 2005 में 7 लाख रुपए कर दिया गया जो वर्तमान में ग्यारह लाख रुपये हो चुका है. 2005 के लिए चुने गये हिन्दी साहित्यकार कुंवर नारायण पहले व्यक्ति थे जिन्हें 7 लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ. 

प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम लेखक जी शंकर कुरुप को प्रदान किया गया था. अब तक हिन्दी तथा कन्नड़ भाषा के लेखक सबसे अधिक सात बार यह पुरस्कार पा चुके हैं. यह पुरस्कार बांग्ला को 5 बार, मलयालम को 4 बार,उड़िया, उर्दू और गुजराती को तीन-तीन बार, असमिया, मराठी, तेलुगू, पंजाबी और तमिल को दो-दो बार मिल चुका है. अब तक यह पुरस्कार 58 साहित्यकारों को मिल चुका है. इसे पाने वालों में कुछ अन्य प्रमुख लेखक कृष्णा सोबती, केदारनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ला, निर्मल वर्मा, गिरीश कर्नाड, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम और यूआर अनंतमूर्ति हैं.

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