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08 March 2019

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है. एक हफ्ते के भीतर मध्यस्थता की प्रक्रिया को शुरू किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए तीन सदस्यों का पैनल गठित किया है, जिसके अध्यक्ष जस्टिस खलीफुल्ला होंगे. इसके अलावा श्री श्री रविशंकर और श्रीराम पंचु भी पैनल में शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले की रिपोर्टिंग न की जाए.कोर्ट ने कहा है कि मध्यस्थता करने वाले तीन सदस्यीय पैनल को 4 हफ्तों में अपनी शुरुआती रिपोर्ट देनी होगी और 8 हफ्तों में अपनी पूरी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपनी होगी. कार्रवाही फैजाबाद (अयोध्या) में होगी और गोपनीय होगी. 06 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.

जस्टिस खलीफुल्ला: इस पैनल के चेयरमैन जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहिम खलीफुल्ला हैं. तमिलनाडु के रहने वाले जस्टिस खलीफुल्ला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं. जस्टिस खलीफुल्लाह ने 1975 में पहली बार वकालत शुरू की थी. साल 2000 में खलीफुल्ला मद्रास हाई कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किए गए. उसके बाद 2011 में, वह जम्मू और कश्मीर के हाई कोर्ट के सदस्य बने और उन्हें दो महीने बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया.

श्री श्री रवि शंकर: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए श्री श्री रविशंकर का नाम भी दिया है. श्री श्री रविशंकर आध्यात्मिक गुरु है. उनकी संस्था का नाम आर्ट ऑफ लिविंग है.

श्रीराम पंचू: श्रीराम पंचू एक सीनियर वकील है और जाने माने मध्यस्थ हैं. वह द मेडिएशन चेम्बर्स के संस्थापक हैं, जो मध्यस्थता की सेवाएं देता है. इसके अलावा वो भारतीय मध्यस्थों के संघ के अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संस्थान (IMI) के बोर्ड में डायरेक्टर हैं. उन्होंने 2005 में भारत का पहला कोर्ट-एनेक्स मध्यस्थता सेंटर बनाया था. उन्होंने मध्यस्थता को भारत की कानूनी प्रणाली का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय बेंच ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद मध्यस्थता के लिए नाम सुझाने को कहा था. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली पांच जजों की बेंच के सामने पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि यह सही और विवेकपूर्ण नहीं होगा. उत्तर प्रदेश सहित हिंदू पक्षकारों ने भी अदालत के प्रस्ताव का विरोध किया था. राम लला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सी.एस.वैद्यनाथन ने भी मध्यस्थता का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि भगवान राम की जन्मभूमि विश्वास व मान्यता का विषय है और वे मध्यस्थता में विरोधी विचार को आगे नहीं बढ़ा सकते.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संवैधानिक बेंच अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई कर रही संवैधानिक बेंच में सीजेआई रंजन गोगोई के अलावा न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं. सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबडे ने कहा है कि इस मामले में मध्यस्थता के लिए एक पैनल का गठन होना चाहिए. इससे पहले 26 फरवरी 2018 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में मध्यस्थ के जरिए विवाद का समाधान निकालने पर सहमति जताई थी. कोर्ट ने कहा था कि एक फीसदी भी उम्मीद है तो मध्यस्थ के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए.

मध्‍यस्‍थता (Arbitraton) एक वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रम है जिसमें पक्षकर किसी तीसरे व्‍यक्ति के हस्‍तक्षेप के माध्‍यम से तथा न्‍यायालय का सहारा लिए बिना अपने विवादों का निपटान करवाते हैं. यह ऐसी विधि है जिसमें विवाद किसी नामित व्‍यक्ति के सामने रखा जाता है जो दोनों पक्षों को सुनने के पश्‍चात अर्ध-न्‍यायिक तरीके से मसले का निर्णय करता हैं. समाधान समाधानकर्ता की सहायता से पक्षकारों द्वारा विवादों के सौहार्दपूर्ण निपटान की प्रक्रिया है.

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 में जो फैसला दिया था उसके खिलाफ हिंदू महासभा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इससे पहले मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर कर रहे थे. रिटायरमेंट से पहले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने इस मामले पर एक फैसले में कहा था कि यह मामला जमीन विवाद का है और इसे संवैधानिक बेंच को रेफर नहीं किया जाएगा.

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