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27 September 2020

भारतीय संसद ने श्रम कानूनों में सुधार के लिए ऐतिहासिक श्रम संहिता पारित की

संसद ने 23 सितंबर, 2020 को तीन श्रम संहिताएं (लेबर कोड्स) पारित कीं हैं, जिनका उद्देश्य ऐतिहासिक "गेम चेंजर" श्रम कानूनों के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करना था. राज्यसभा द्वारा सदन से आठ सांसदों के निलंबन को लेकर विपक्षी नेताओं द्वारा बहिष्कार के दौरान ही राज्यसभा द्वारा ध्वनि मत के माध्यम से अपनी स्वीकृति देने के बाद यह श्रम सहिंता पारित की गई. लोकसभा ने 22 सितंबर को यह विधेयक पारित किया था.यह विधेयक हरेक संस्था में समयबद्ध विवाद समाधान प्रणाली प्रदान करने का प्रयास करता है.

नए लेबर कोड्स के तहत देश के 50 करोड़ ऑर्गनाइज्ड, अन-ऑर्गनाइज्ड और सेल्फ एम्प्लॉइड वर्कर्स को मिनिमम वेजेज और सोशल सिक्यॉरिटी देने की बात की गई है. अन-ऑर्गनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाले 40 करोड़ लोगों के लिए सोशल सिक्यॉरिटी फंड तैयार किया जाएगा. इस फंड की मदद से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजूदरों को डेथ इंश्योरेंस, ऐक्सिडेंटल इंश्योरेंस, मैटर्निटी बेनिफिट और पेंशन का लाभ मिलेगा. इसका मकसद यूनिवर्सल सिक्यॉरिटी कवरेज देना है. नए लेबर लॉ में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सैलरी देने की बात की गई है. वर्किंग जर्नलिस्ट की परिभाषा को भी बदला जाएगा. इसमें डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार भी शामिल होंगे.

अकूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ ऐंड वर्किंग कंडिशन कोड बिल 2020 (Occupational Safefty, Health and Working Conditions Code Bill 2020) ने लीव पॉलिसी के नियम में भी बदलाव किया है. इसके तहत अब 240 की जगह 180 दिन काम करने के बाद एक लेबर छुट्टी पाने का हकदार बन जाता है. इस कोड के मुताबिक, अगर कार्य स्थल पर किसी कर्मचारी को चोट लग जाती है तो उसे कम से कम 50 प्रतिशत जुर्माना मिलेगा. कुल मिलाकर वर्कर्स के लिए सेफ एनवायरनमेंट तैयार करने की कोशिश हुई है.

सोशल सिक्यॉरिटी कोड में ESIC और EPFO की सुविधा का विस्तार किया जा रहा है. ESIC की सुविधा अब अन-ऑर्गनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाले वर्कर्स, गिग्स, प्लैटफॉर्म वर्कर्स को भी मिलेगी. अगर किसी इंस्टिट्यूट में 10 से कम मजदूर काम करते हैं, वहां भी इसे लागू किया जाएगा. अगर किसी संस्थान में 20 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं तो वहां EPFO के नियम लागू होंगे.

माइग्रेंट वर्कर्स के लिए परिभाषा में बदलाव किया गया है. अगर कोई मजदूर दूसरे राज्यों से आता है और उसकी सैलरी 18 हजार से कम है तो वह माइग्रेंट वर्कर्स या प्रवासी मजदूरों की कैटिगरी में शामिल होगा. माइग्रेंट वर्कर्स को तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा. सरकार ने माइग्रेंट वर्कर्स के लिए डेटाबेस तैयार करने का फैसला किया है. प्रवासी मजदूरों के मालिकों को साल में एकबार उन्हें घर जाने के लिए ट्रैवल अलाउंस देना होगा.

श्रम मंत्री ने कहा कि इन श्रम सुधारों को लागू करने का प्रमुख उद्देश्य हमारे श्रम कानूनों को कार्यस्थल की निरंतर बदलती हुई दुनिया के अनुरूप बनाना है और श्रमिकों और उद्योगों की आवश्यकताओं को संतुलित करते हुए एक प्रभावी और पारदर्शी प्रणाली प्रदान करना है. उन्होंने कहा कि, यदि भारत अपने श्रम कानूनों में आवश्यक बदलाव नहीं करता है, तो हम इन दोनों क्षेत्रों अर्थात श्रमिकों के कल्याण और उद्योगों के विकास में पीछे रह जाएंगे. श्रम मंत्री ने कहा कि देश में 44 श्रम कानूनों के होने के बावजूद,  भारत के 50 करोड़ श्रमिकों में से केवल 30 प्रतिशत श्रमिकों को ही न्यूनतम मजदूरी का कानूनी अधिकार था और सभी श्रमिकों को समय पर वेतन नहीं दिया जाता था. इस नई श्रम संहिता के तहत, संगठित और असंगठित क्षेत्र के सभी 50 करोड़ श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी और समय पर मजदूरी का कानूनी अधिकार मिलेगा.

इस संहिता में प्रवासी श्रमिकों के लिए एक डाटाबेस बनाने का प्रावधान भी शामिल है ताकि उनकी कल्याणकारी योजनाओं की पोर्टेबिलिटी और एक अलग हेल्पलाइन व्यवस्था कायम की जा सके. इसके अलावा, इस नई श्रम संहिता के तहत नियोक्ताओं को प्रवासी श्रमिकों को वर्ष में एक बार अपने मूल स्थान पर जाने के लिए यात्रा भत्ता प्रदान करना होगा. कुल 29 श्रम कानूनों के समामेलन और व्यापक परामर्श के बाद यह नई श्रम संहिता तैयार की गई है. केंद्र सरकार ने इस श्रम संहिता को अंतिम रूप देने से पहले कई चर्चाएं कीं, जिनमें व्यापार संघों, विशेषज्ञों और अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ परामर्श और अंतर-मंत्रालयी परामर्श के साथ-साथ 2-3 महीनों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में यह श्रम संहिता रखकर हासिल किये गये सार्वजनिक सुझावों को ध्यान में रखना शामिल है.

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