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29 October 2021

भारत के महान वीरांगना पद्मावती जिन्होंने जौहर कर ली लेकिन खिलजी के अधिपत्य को कभी स्वीकार नही की

आज कहानी है एक ऐसे रानी की, जो इतिहास की सबसे चर्चित रानियों में से एक है. आज भी राजस्थान में चित्तौड़ की इस रानी की सुंदरता के साथ-साथ शौर्य और बलिदान के किस्से प्रसिद्ध हैं. लेकिन इन्हें ख्याति मिली कुछ वर्ष पूर्व जब उनके और क्रूर मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी पर फ़िल्म बनी और पूरे इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया. हम बात कर रहे हैं चितौड़ की शेरनी जिसे रानी पद्मावती के नाम से भी जानते हैं. 

जायसी द्वारा रचित पद्मावत महाकाव्य के अनुसार, राजकुमारी पद्मिनी का जन्म 1270 ईसवी में सिंहल देश (मौजूदा श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती के महल में हुआ था. बचपन में पदमिनी के पास “हीरामणी ” नाम का बोलता तोता हुआ करता था, जिससे साथ वो अपना अधिकतर समय बिताती थीं. रानी पदमिनी बचपन से ही बहुत सुंदर थी और बड़ी होने पर उनके पिता ने उनका स्वयंवर आयोजित किया. इस स्वयंवर में उनके पिता ने सभी हिन्दू राजाओं और राजपूतों को बुलाया. राजा रावल रतन सिंह भी पहले से ही अपनी एक पत्नी नागमती होने के बावजूद स्वयंवर में गए थे. प्राचीन समय में राजा एक से अधिक विवाह करते थे, ताकि वंश को अधिक उत्तराधिकारी मिले. राजा रावल रतन सिंह वहाँ एक योगी के वेश में पहुंचे और उन्होंने मलखान सिंह (अनाम छोटे प्रदेश के राजा) को स्वयंवर में हराकर पदमिनी से विवाह कर लिया. विवाह के बाद वो अपनी दुसरी पत्नी पदमिनी के साथ वापस चित्तौड़ लौट आए.

रावल रतन सिंह का राज चितौड़ पर था, एक अच्छे शासक और पति होने के अलावा रतन सिंह कला के संरक्षक भी थे. उनके दरबार में कई प्रतिभाशाली लोग थे जिनमे से राघव चेतन संगीतकार भी एक था. एक दिन राघव चेतन की किसी बुरी आदत से नाराज़ होकर राजा ने उसका मुंह काला करवाकर और गधे पर बिठाकर अपने राज्य से निर्वासित कर दिया. राजा रतन सिंह की इस कठोर सजा के कारण राघव चेतन उनका दुश्मन बन गया और दिल्ली दरबार जाकर अलाउदीन ख़िलजी से मिल गया. राघव चेतन ने सुल्तान को रानी पद्मिनी की सुन्दरता का बखान किया जिसे सुनकर खिलजी की रानी को पाने के लिए लालायित हो उठा. अपनी राजधानी पहुचने के तुरंत बात उसने अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने को कहा क्योंकि उसका सपना रानी पद्मावती को अपने हरम में रखना था. बेचैनी से चित्तौड़ पहुचने के बाद अलाउदीन को चित्तौड़ का किला भारी सुरक्षा में दिखा. उस प्रसिद्ध सुन्दरी की एक झलक पाने के लिए वो पागल हो रहा था और उसने राजा रतन सिंह को ये कहकर भेजा कि वो रानी पदमिनी को अपनी बहन समान मानता है और उससे मिलना चाहता है. सुल्तान की बात सुनते ही रतन सिंह ने उसके रोष से बचने और अपना राज्य बचाने के लिए उसकी बात से सहमत हो गया. रानी पदमिनी अलाउदीन को कांच में अपना चेहरा दिखाने के लिए राजी हो गयी. जब अलाउदीन को ये खबर पता चली कि रानी पदमिनी उससे मिलने को तैयार हो गयी है वो अपने चुनिन्दा योद्धाओं के साथ सावधानी से किले में प्रवेश कर गया. रानी पदमिनी के सुंदर चेहरे को कांच के प्रतिबिम्ब में जब अलाउदीन खिलजी ने देखा तो उसने सोच लिया कि रानी पदमिनी को अपनी बनाकर रहेगा.वापस अपने शिविर में लौटते वक़्त अलाउदीन कुछ समय के लिए रतन सिंह के साथ चल रहा था. खिलजी ने मौका देखकर रतन सिंह को बंदी बना लिया और पदमिनी की मांग करने लगा. 

चौहान राजपूत सेनापति गोरा और बादल ने सुल्तान को हराने के लिए एक चाल चलते हुए खिलजी को संदेश भेजा कि अगली सुबह पद्मिनी को सुल्तान को सौप दिया जाएगा. अगले दिन सुबह भोर होते ही 150 पालकियां किले से खिलजी के शिविर की तरफ रवाना की गई. पालकियां वहाँ रुक गयी जहा पर रतन सिंह को बंदी बना रखा था. पालकियों को देखकर रतन सिंह ने सोचा, कि ये पालकियां किले से आयी है और सम्भवतः उनके साथ रानी भी यहाँ आयी होगी, लेकिन उन पालकियों में ना ही उनकी रानी और ना ही दासियां थीं और अचानक से उसमे से पूरी तरह से सशस्त्र सैनिक निकले और रतन सिंह को छुड़ा दिया और खिलजी के अस्तबल से घोड़े चुराकर तेजी से घोड़ो पर पर किले की ओर भाग गये. किंतु गोरा इस मुठभेड़ में बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये जबकि बादल,रतन सिंह को सुरक्षित किले में पहुचा दिया.

जब सुल्तान को पता चला कि उसकी योजना नाकाम हो गयी, तब सुल्तान ने गुस्से में आकर अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया. सुल्तान के सेना ने किले में प्रवेश करने की कड़ी कोशिश की लेकिन नाकाम रहा. अब खिलजी ने किले की घेराबंदी करने का निश्चय किया और ये घेराबंदी इतनी कड़ी थी कि किले में खाद्य आपूर्ति धीरे धीरे समाप्त हो गयी. अंत में राजा रतन सिंह ने द्वार खोलने का आदेश दिया, लेकिन ख़िलजी और उसके सैनिकों से लड़ते हुए रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए. ख़िलजी ने किले के अंदर सूचना भिजवाया कि रानी पद्मिनी को दासियों के साथ उसके हवाले कर दिया जाए या फिर वो चित्तौड़ के सभी पुरुषों को खोजकर मार डालेगा. ये सुचना सुनकर रानी पद्मिनी ने सोचा कि अब सुल्तान की सेना चितौड़ के सभी पुरुषो को मार देगी. अब चित्तौड़ की औरतों के पास दो विकल्प थे या तो वो जौहर के लिए प्रतिबद्ध हो या विजयी सेना के समक्ष अपना निरादर सहे.

सभी महिलाओं का पक्ष जौहर की तरफ था. इसके बाद एक विशाल चिता जलाई गयी और रानी पदमिनी के बाद चित्तौड़ की सारी औरतें उसमें कूद गयी और इस प्रकार दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गये. अपनी महिलाओं की मौत पर चित्तौड़ के पुरुष के पास जीवन में कुछ नही बचा था. चित्तौड़ के सभी पुरुषों ने साहस प्रदर्शन करने का प्रण लिया जिसमे प्रत्येक सैनिक केसरी वस्त्र और पगड़ी पहनकर दुश्मन सेना से तब तक लड़े जब तक कि वो सभी खत्म नही हो गये. विजयी ख़िलजी सेना ने जब किले में प्रवेश किया तो उनको राख और जली हुई हड्डियों के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला. जिन महिलाओं ने जौहर किया उनकी याद आज भी लोकगीतों में जीवित है जिसमे उनके गौरवान्वित कार्य का बखान किया जाता है. 

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