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20 November 2021

मगध सम्राज्य पर शिशुनाग राजवंश एंव नन्द सम्राज्य की स्थापना

मगध में हर्यक वंश के राजा नागदशक को उसका सेनापति शिशुनाग ने राज्य विद्रोह कर 492 ई.पू. में हत्या कर दिया और स्वंय मगध का राजा बन गया और मगध पर इस प्रकार शिशुनाग वंश की स्थापना की. शिशुनाग लिच्छवि राजा के वेश्या पत्‍नी से उत्पन्‍न पुत्र था. पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था. इसने सर्वप्रथम मगध के प्रबल प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिलाया. मगध की सीमा पश्‍चिम मालवा तक फैल गई और वत्स को मगध में मिला दिया. वत्स और अवन्ति के मगध में विलय से, पाटलिपुत्र को पश्‍चिमी देशों से व्यापारिक मार्ग के लिए रास्ता खुल गया.
शिशुनाग ने मगध से बंगाल की सीमा से मालवा तक विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया. शिशुनाग एक शक्‍तिशाली शासक था जिसने गिरिव्रज के अलावा वैशाली नगर को भी अपनी राजधानी बनाया. 394 ई.पू. में इसकी मृत्यु हो गई जिसके बाद उसका पुत्र कालाशोक मगध का शासक बना. महावंश में इसे कालाशोक तथा पुराणों में काकवर्ण कहा गया है. कालाशोक ने अपनी राजधानी को पाटलिपुत्र स्थानान्तरित कर दिया था. इसने 28 वर्षों तक शासन किया. कालाशोक के शासनकाल में ही बौद्ध धर्म की द्वितीय संगीति का आयोजन हुआ. कालाशोक को राजधानी पाटलिपुत्र में घूमते समय महापद्यनन्द नामक व्यक्‍ति ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी. 366 ई.पू. कालाशोक की मृत्यु हो गई. कालाशोक के दस पुत्र थे, जिन्होंने मगध पर 22 वर्षों तक शासन किया. शिशुनाग वंश का अंतिम राजा महानन्दि था. महानन्दि का हत्या उसी के शूद्र दासी के साथ हुए पुत्र महापद्मनन्द द्वारा नगर विहार के दौरान कर दी गई और महापद्मनन्द मगध का राजा बनकर नन्द वंश की स्थापना की. इस प्रकार 344 ई.पू. में शिशुनाग वंश का अन्त हो गया और नन्द वंश का उदय हुआ. 

पुराणों में महापद्मनन्द को महापद्म तथा महाबोधिवंश में उग्रसेन कहा गया है. यह नाई जाति का था. इन्हें महापद्म एकारट, सर्व क्षत्रान्तक आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है. महापद्मनन्द पहला शासक था जो गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विन्ध्य पर्वत के दक्षिण तक विजय पताका लहराई. नन्द वंश के समय मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया. भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई जो कुलीन नहीं था तथा जिसकी सीमाएं गंगा के मैदानों को लांघ गई. ये एक  एक अखंड राजतंत्र था, जिसके पास अपार सैन्यबल, धनबल और जनबल था. महापद्मनंद ने निकटवर्ती सभी राजवंशो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की एवं केंद्रीय शासन की व्यवस्था लागू की. इसीलिए सम्राट महापदम नंद को "केंद्रीय शासन पद्धति का जनक" कहा जाता है.

महापद्मनंद के आठ पुत्र थे- पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त और धनानन्द. घनानन्द मगध नंदवंश का अंतिम राजा था. इसके शासन काल में भारत पर आक्रमण सिकन्दर द्वारा किया गया. सिकन्दर के भारत से जाने के बाद मगध साम्राज्य में अशान्ति और अव्यवस्था फैली. धनानन्द एक लालची और धन संग्रही शासक था, जिसे असीम शक्‍ति और सम्पत्ति के बावजूद वह जनता के विश्‍वास को नहीं जीत सका. उसने एक महान विद्वान ब्राह्मण चाणक्य को अपमानित किया था. चाणक्य ने अपनी कूटनीति से धनानन्द को पराजित कर सूर्यवंशी चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाया. धननंद 322 ईसापूर्व में अपदस्थ हुआ और इसके साथ ही मौर्य काल का आरम्भ हो गया. इस प्रकार 22 वर्षों तक मगध पर नन्दवंश का राज रहा.

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