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19 November 2021

मगध सम्राज्य पर हर्यक राजवंश की स्थापना

बिम्बिसार को मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक/राजा माना जाता है. बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना 544 ई.पू. में की थी. इसके साथ ही राजनीतिक शक्‍ति के रूप में बिहार का सर्वप्रथम उदय हुआ. बिम्बिसार ने गिरिव्रज (राजगीर) को अपनी राजधानी बनायी. बिम्बिसार एक कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी शासक था. उसने प्रमुख राजवंशों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर राज्य को फैलाया. सबसे पहले उसने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेतक की पुत्री चेलना के साथ विवाह किया. दूसरा प्रमुख वैवाहिक सम्बन्ध कौशल राजा प्रसेनजीत की बहन महाकौशला के साथ विवाह किया. इसके बाद भद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ विवाह किया.
महावग्ग के अनुसार बिम्बिसार की 500 रानियाँ थीं. उसने अवंति के शक्‍तिशाली राजा चन्द्र प्रद्योत के साथ दोस्ताना सम्बन्ध बनाया. सिन्ध के शासक रूद्रायन तथा गांधार के मुक्‍कु रगति से भी उसका दोस्ताना सम्बन्ध था. उसने अंग राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था वहाँ अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा नियुक्‍त किया था. बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का मित्र और संरक्षक था. बुद्ध से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया, लेकिन जैन और ब्राह्मण धर्म के प्रति उसकी सहिष्णुता थी. बिम्बिसार ने करीब 52 वर्षों तक शासन किया.

महात्मा बुद्ध के विरोधी देवव्रत के उकसाने पर उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया था जहाँ 492 ई.पू. में उसका निधन हो गया. जिसके बाद अजातशत्रु मगध के सिंहासन पर बैठा. इसके बचपन का नाम कुणिक था. वह अपने पिता की हत्या कर गद्दी पर बैठा. अजातशत्रु ने अपने पिता के साम्राज्य विस्तार की नीति को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया. अजातशत्रु के सिंहासन मिलने के बाद वह अनेक राज्य संघर्ष एवं कठिनाइयों से घिर गया लेकिन अपने बाहुबल और बुद्धिमानी से सभी पर विजय प्राप्त की. 

महत्वाकांक्षी अजातशत्रु ने अपने पिता को कारागार में डालकर कठोर यातनाएँ देकर मार दिया था जिससे दुखित होकर कौशल रानी की भी मृत्यु हो गई. बिम्बिसार की पत्‍नी (कौशल) की मृत्यु से प्रसेनजीत बहुत क्रोधित हुआ और अजातशत्रु के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया. आजतशत्रु ने युद्ध में प्रसेनजीत को पराजित कर उसकी पुत्री वाजिरा से विवाह कर लिया जिसके उपरांत प्रसेनजीत  ने काशी को दहेज में दे दिया. इसके बाद अजातशत्रु  ने लिच्छवी और मल्ल संघ पर भी आक्रमण करके जीत लिया और अपने राज्य में मिला लिया . इस प्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश का  एक बड़े भू-भाग मगध साम्राज्य का अंग बन गया. अजातशत्रु ने अपने प्रबल प्रतिद्वन्दी अवन्ति राज्य पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की.

अजातशत्रु धार्मिक उदार सम्राट था. विभिन्‍न ग्रन्थों के अनुसार वे बौद्ध और जैन दोनों मत के अनुयायी माने जाते हैं. उसने अपने शासनकाल के आठवें वर्ष में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों पर राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया और 483 ई.पू. राजगृह की सप्तपर्णि गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया. इस संगीति में बौद्ध भिक्षुओं के सम्बन्धित पिटकों को सुतपिटक और विनयपिटक में विभाजित किया. उसने लगभग ३२ वर्षों तक शासन किया और  460 ई.पू. में अपने पुत्र उदयन द्वारा मारा गया था. अजातशत्रु के शासनकाल में ही महात्मा बुद्ध 482 ई.पू. महापरिनिर्वाण तथा महावीर का भी निधन 469 ई.पू. हुआ था.

अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र  उदयन 460 ई.पू. में मगध का राजा बना. इसकी माता का नाम पद्‍मावती था. उदयन शासक बनने से पहले चम्पा का उपराजा था. वह पिता की तरह ही वीर और विस्तारवादी नीति का पालक था. इसने पाटलि पुत्र (गंगा और सोन के संगम) को बसाया तथा अपनी राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थापित की. मगध के प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति के गुप्तचर द्वारा उदयन की हत्या कर दी गई. उदयन के तीन पुत्र अनिरुद्ध, मंडक और नागदशक थे. उदयन के तीनों पुत्रों ने राज्य किया. अन्तिम राजा नागदशक था. जो अत्यन्त विलासी और निर्बल था. शासनतन्त्र में शिथिलता के कारण व्यापक असन्तोष जनता में फैला. राज्य विद्रोह कर उनका सेनापति शिशुनाग ने उदयन की हत्या कर दिया और स्वंय मगध का राजा बना. इस प्रकार हर्यक वंश का अन्त और शिशुनाग वंश की स्थापना 492 ई.पू. हुई.

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