03 December 2021

मगध पर गुप्तवंश की स्थापना

गुप्त राजवंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था. इतिहासकारों द्वारा इस अवधि को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है. 
मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही. मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है. गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था. गुप्त राजवंश की स्थापना महाराजा गुप्त ने लगभग 275 ई.में की थी. उनका वास्तविक नाम श्रीगुप्त था. श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक था. प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से राज्य प्रयाग का शासक था. श्रीगुप्त ने मगध के मृग शिखावन में एक मन्दिर का निर्माण करवाया था तथा मन्दिर के व्यय में 24 गाँव को दान दिये थे.

श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा. लगभग 280 ई. में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. घटोत्कच तत्सामयिक शक साम्राज्य का सेनापति था. उस समय शक जाति ब्राह्मणों से बलपूर्वक क्षत्रिय बनने को आतुर थी. घटोत्कच ने 'महाराज' की उपाधि को धारण किया था. शक राज परिवार तो क्षत्रियत्व हस्तगत हो चला था, किन्तु साधारण राजकर्मी अपनी क्रूरता के माध्यम से क्षत्रियत्व पाने को इस प्रकार लालायित हो उठे थे, कि उनके अत्याचारों से ब्राह्मण त्रस्त हो उठे. ब्राह्मणों ने क्षत्रियों की शरण ली, किन्तु वे पहले से ही उनसे रुष्ट थे, जिस कारण ब्राह्मणों की रक्षा न हो सकी. ठीक इसी जाति-विपणन में पड़कर एक ब्राह्मण की रक्षा हेतु घटोत्कच ने 'कर्ण' और 'सुवर्ण' नामक दो शक मल्लों को मार गिराया. ‘मधुमती’ नामक क्षत्रिय कन्या से घटोत्कच का पाणिग्रहण (विवाह) हुआ था. लिच्छिवियों ने घटोत्कच को शरण दी, साथ ही उनके पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम के साथ अपनी पुत्री कुमारदेवी का विवाह भी कर दिया. महाराज घटोत्कच ने लगभग 319 ई. तक शासन किया था.

सन् 320 में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद राजा बना. चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक था. इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी. उन्होंने महान पूर्ववर्ती शासक बिम्बिसार की भाँति  लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह कर द्वितीय मगध साम्राज्य की स्थापना की. कुमार देवी के साथ विवाह-सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया. चन्द्रगुप्त ने विवाह की स्मृति में जो सिक्के चलाए उसमें चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी के चित्र अंकित होते थे. लिच्छवियों के दूसरे राज्य नेपाल के राज्य को उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने मिलाया. चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्य को राजनैतिक दृष्टि से सुदृढ़ तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बना दिया. चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशाम्बी तथा कौशल के महाराजाओं को जीतकर अपने राज्य में मिलाया तथा साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित की.

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद 335 ई. में उसका तथा कुमारदेवी का पुत्र समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा. सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास में महानतम शासकों के रूप में वह नामित किया जाता है. इन्हें परक्रमांक कहा गया है. समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है. इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी. समुद्रगुप्त ने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की. समुद्रगुप्त एक असाधारण सैनिक योग्यता वाला महान विजित सम्राट था. समुद्रगुप्त एक अच्छा राजा होने के अतिरिक्त एक अच्छा कवि तथा संगीतज्ञ भी था. उसे कला मर्मज्ञ भी माना जाता है. समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्‍चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था. कश्मीर, पश्‍चिमी पंजाब, पश्‍चिमी राजस्थान, सिन्ध तथा गुजरात को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इसमें सम्मिलित थे. दक्षिणापथ के शासक तथा पश्‍चिमोत्तर भारत की विदेशी शक्‍तियाँ उसकी अधीनता स्वीकार करती थीं. समुद्रगुप्त के काल में सदियों के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण तथा विदेशी शक्‍तियों के आधिपत्य के बाद आर्यावर्त पुनः नैतिक, बौद्धिक तथा भौतिक उन्‍नति की चोटी पर जा पहुँचा था.

समुद्रगुप्त के दो पुत्र थे- रामगुप्त तथा चन्द्रगुप्त. रामगुप्त बड़ा होने के कारण पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा, लेकिन वह निर्बल एवं कायर था. वह शकों द्वारा पराजित हुआ और अत्यन्त अपमानजनक सन्धि कर अपनी पत्‍नी ध्रुवस्वामिनी को शकराज को भेंट में दे दिया था, लेकिन उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय बड़ा ही वीर एवं स्वाभिमानी व्यक्‍ति था. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या कर दी और उसकी पत्‍नी से विवाह कर लिया और गुप्त वंश का शासक बन बैठा. चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ. वह समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी दत्तदेवी से हुआ था. वह विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ. उसने 375 से 415 ई. तक  शासन किया. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर अपनी विजय हासिल की जिसके बाद गुप्त साम्राज्य एक शक्तिशाली राज्य बन गया. 

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक विस्तार हुआ. उसने नागवंश, वाकाटक और कदम्ब राजवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिससे एक कन्या प्रभावती गुप्त पैदा हुई. वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया. उसने ऐसा संभवतः इसलिए किया कि शकों पर आक्रमण करने से पहले दक्कन में उसको समर्थन हासिल हो जाए. उसने प्रभावती गुप्त के सहयोग से गुजरात और काठियावाड़ की विजय प्राप्त की. वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्‍ति से शकों का उन्मूलन किया. चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश में हुआ. शक उस समय गुजरात तथा मालवा के प्रदेशों पर राज कर रहे थे. शकों पर विजय के बाद उसका साम्राज्य न केवल मजबूत बना बल्कि उसका पश्चिमी समुद्र पत्तनों पर अधिपत्य भी स्थापित हुआ. इस विजय के पश्चात उज्जैन गुप्त साम्राज्य की राजधानी बना. चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है. चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल कला-साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है.

चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद कुमारगुप्त प्रथम सन् 415 में सत्तारूढ़ हुआ. अपने दादा समुद्रगुप्त की तरह उसने भी अश्वमेघ यज्ञ के सिक्के जारी किये. कुमारगुप्त ने चालीस वर्षों तक शासन किया. वह चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्‍नी ध्रुवदेवी से उत्पन्‍न सबसे बड़ा पुत्र था, जबकि गोविन्दगुप्त उसका छोटा भाई था. कुमारगुप्त प्रथम का शासन शान्ति और सुव्यवस्था का काल था. साम्राज्य की उन्‍नति के पराकाष्ठा पर था. इसने अपने साम्राज्य का अधिक संगठित और सुशोभित बनाये रखा. गुप्त सेना ने पुष्यमित्रों को बुरी तरह परास्त किया था. कुमारगुप्त ने अपने विशाल साम्राज्य की पूरी तरह रक्षा की जो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्‍चिम में अरब सागर तक विस्तृत था. उसी के शासनकाल में नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई थी. नालंदा को दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय निवासी विश्वविद्यालय माना जाता है.

गुप्त साम्राज्य का 550 ई. में पतन हो गया. गुप्तवंश का अंतिम राजा विष्णुगुप्त अयोग्य निकले और हूणों के आक्रमण का सामना नहीं कर सके जिसके कारण हूणों ने  ग्वालियर तथा मालवा तक के एक बड़े क्षेत्र पर अधिपत्य कायम कर लिया. इसके बाद सन् 606 में हर्ष का शासन आने के पहले तक आराजकता छाई रही.

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