06 December 2021

देखिए वर्धन वंश के राजा हर्षवर्धन ने अपने भाई के हत्या का बदला लेने के लिए मालवा और गौड़ के शासको का किस प्रकार नरसंहार किया



पुष्यभूति राजवंश जिसे वर्धन वंश के रूप में भी जाना जाता है, ने छठी और सातवीं शताब्दी के दौरान उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया. पुष्यभूति श्रीकांत जनपद (आधुनिक कुरुक्षेत्र जिला ) में रहते थे, जिनकी राजधानी  थानेसर थी. शिव के एक भक्त, पुष्यभूति "दक्षिण" के एक शिक्षक, भैरवाचार्य के प्रभाव में, एक श्मशान भूमि पर एक तांत्रिक अनुष्ठान में शामिल हो गए. इस अनुष्ठान के अंत में, एक देवी ने उन्हें राजा का अभिषेक किया और उन्हें एक महान राजवंश के संस्थापक के रूप में आशीर्वाद दिया. पुष्यभूति वंश ने मूल रूप से अपनी राजधानी थानेसर के आसपास के एक छोटे से क्षेत्र पर शासन किया. इतिहासकारों के अनुसार, उनके शासक आदित्य-वर्धन कन्नौज के मौखरी राजा शरवा-वर्मन के सामंत थे. उनके उत्तराधिकारी प्रभाकर-वर्धन भी अपने शुरुआती दिनों में मौखरी राजा अवंती-वर्मन के सामंत थे. प्रभाकरवर्धन की माता गुप्त वंश की राजकुमारी महासेनगुप्त नामक स्त्री थी. अपने पड़ोसी राज्यों, मालव, उत्तर-पश्चिमी पंजाब के हूणों तथा गुर्जरों के साथ युद्ध करके प्रभाकरवर्धन ने काफ़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की थी. 

प्रभाकर-वर्धन पुष्यभूति वंश का प्रथम शासक था जिसने थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था. यह "प्रतापशील" के नाम से विख्यात था. इस वंश के शासकों में सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि प्रभाकरवर्धन ने ही धारण की. इसकी मृत्यु के बाद इसकी पत्नी यशोमती सती हो गयी. यशोमती की तीन संतान थी – राज्यवर्धन, हर्षवर्धन, राज्यश्री. राजयश्री का विवाह मौखरि नरेश ग्रहवर्मा से हुआ था. 605 ई. में प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद, मालवा के राजा ने गौड़ के शासक द्वारा समर्थित कन्नौज पर हमला किया. मालव राजा ने ग्रह-वर्मन को मार डाला, और राज्यश्री को पकड़ लिया. प्रभाकर के बड़े पुत्र राज्य-वर्धन ने मालव शासक को हराया, लेकिन गौड़ राजा शशांक ने उसे मार डाला. प्रभाकर के छोटे पुत्र हर्ष-वर्धन ने गौड़ राजा शशांक और उनके सहयोगियों को नष्ट करने की कसम खाई थी.

हर्ष वर्धन 16 वर्ष की छोटी उम्र में राजा बना. बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या के बाद हर्षवर्धन को राजपाट सौंप दिया गया. खेलने-कूदने की उम्र में हर्षवर्धन को राजा शशांक के खिलाफ युद्ध के मैदान में उतरना पड़ा. शशांक ने ही राज्यवर्धन की हत्या की थी. हर्षवर्धन ने एक विशाल सेना तैयार की और करीब 6 साल में गुजरात, पंजाब, उड़ीसा बंगाल, मिथिला और कन्नौज उत्तर प्रदेश जीत कर पूरे उत्तर भारत पर अपना दबदबा कायम कर लिया. जल्दी ही हर्षवर्धन का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में असाम तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैल गया. माना जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन की सेना में 1 लाख से अधिक सैनिक थे. यही नहीं, सेना में 60 हजार से अधिक हाथियों को रखा गया था. हर्ष परोपकारी सम्राट थे. सम्राट हर्षवर्धन ने भले ही अलग-अलग राज्यों को जीत लिया, लेकिन उन राज्यों के राजाओं को अपना शासन चलाने की इजाज़त दी. शर्त एक थी कि वे हर्ष को अपना सम्राट मानेंगे. हालांकि इस तरह की संधि कन्नौज और थानेश्वर के राजाओं के साथ नहीं की गई थी.

हर्ष ने ‘सती’ प्रथा पर लगाया प्रतिबंध. हर्षवर्धन ने सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाया था. उनके राज में सती प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया. कहा जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी बहन को भी सती होने से बचाया था. वह सभी धर्मों का समान आदर और महत्व देता थे. पारम्परिक हिन्दू परिवार में जन्म लेने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया. बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, हर्ष किसी भी धर्म में भेद-भाव नहीं करते थे. सम्राट हर्षवर्धन ने शिक्षा को देश भर में फैलाया. हर्षवर्धन के शासनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय एक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ.

हर्ष एक बहुत अच्छे लेखक ही नहीं, बल्कि एक कुशल कवि और नाटककार भी थे. हर्ष की ही देख-रेख में ‘बाणभट्ट’ और ‘मयूरभट्ट’ जैसे मशहूर कवियों का जन्म हुआ था. यही नहीं, हर्ष खुद भी एक बहुत ही मंजे हुए नाटककार के रूप में सामने आए. ‘नागनन्दा’, ‘रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ उनके द्वारा लिखे गए कुछ नामचीन नाटक हैं. प्रयाग में हर साल होने वाला ‘कुम्भ मेला’, जो सदियों से चला आ रहा है और हिन्दू धर्म के प्रचारकों के बीच काफी प्रसिद्ध है; माना जाता है कि वो भी राजा हर्ष ने ही शुरु करवाया था. भारत की अर्थव्यवस्था ने हर्ष के शासनकाल में बहुत तरक्की की थी. भारत, जो मुख्य तौर पर एक कृषि-प्रधान देश माना जाता है; हर्ष के कुशल शासन में तरक्की की उचाईयों को छू रहा था. हर्ष के शासनकाल में भारत ने आर्थिक रूप से बहुत प्रगति की थी.

हर्ष के बाद उनके राज्य को संभालने के लिए उनका कोई भी वारिस नहीं था. हर्षवर्धन के अपनी पत्नी दुर्गावती से 2 पुत्र थे- वाग्यवर्धन और कल्याणवर्धन. पर उनके दोनों बेटों की अरुणाश्वा नामक मंत्री ने हत्या कर दी. इस वजह से हर्ष का कोई वारिस नहीं बचा. 647 ई. में हर्ष के मरने के बाद, उनका साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखरता चला गया और फिर समाप्त हो गया. उनके बाद जिस राजा ने कन्नौज की बागडोर संभाली थी, वह बंगाल के राजा के विरुद्ध जंग में हार गया. वारिस न होने की वजह से, सम्राट हर्षवर्धन का साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया.

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