28 March 2022

चंगेज़ ख़ान का भारत की ओर प्रस्थान

चंगेज़ ख़ान एक मंगोल शासक था जिसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई. इतिहासकार मानते हैं कि चंगेज खान एक 'बौद्ध' था. उसने अपनी तलवार के दम पर मुस्लिम साम्राज्य को लगभग खत्म ही कर दिया था. वह अपनी संगठन शक्ति, बर्बरता तथा साम्राज्य विस्तार के लिए प्रसिद्ध हुआ. इससे पहले किसी भी यायावर जाति (जाति के लोग भेड़ बकरियां पालते जिन्हें गड़रिया कहा जाता है) के व्यक्ति ने इतनी विजय यात्रा नहीं की थी. वह पूर्वोत्तर एशिया के कई घुमंतू जनजातियों को एकजुट करके सत्ता में आया. 

चंगेज़ खान का जन्म 1962 के आसपास आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था. चंगेज़ खान की दांयी हथेली पर पैदाइशी खूनी धब्बा था. उसके तीन सगे भाई व एक सगी बहन थी और दो सौतेले भाई भी थे. उसका वास्तविक या प्रारंभिक नाम तेमुजिन (या तेमूचिन) था. मंगोल भाषा में तिमुजिन का मतलब लौहकर्मी होता है. उसकी माता का नाम होयलन और पिता का नाम येसूजेई था जो कियात कबीले का मुखिया था. येसूजेई ने विरोधी कबीले की होयलन का अपहरण कर विवाह किया था. लेकिन कुछ दिनों के बाद ही येसूजेई की हत्या कर दी गई. उसके बाद तेमूचिन की माँ ने बालक तेमूजिन तथा उसके सौतले भाईयों बहनों का लालन पालन बहुत कठिनाई से किया. बारह वर्ष की आयु में तिमुजिन की शादी बोरते के साथ कर दी गयी. इसके बाद उसकी पत्नी बोरते का भी विवाह् के बाद ही अपहरण कर लिया था. अपनी पत्नी को छुडाने के लिए उसे लड़ाईया लड़नी पड़ीं थी. इन विकट परिस्थितियों में भी वो दोस्त बनाने में सक्षम रहा. नवयुवक बोघूरचू उसका प्रथम मित्र था और वो आजीवन उसका विश्वस्त मित्र बना रहा. उसका सगा भाई जमूका भी उसका एक विश्वसनीय साथी था. तेमुजिन ने अपने पिता के वृद्ध सगे भाई तुगरिल उर्फ़ ओंग खान के साथ पुराने रिश्तों की पुनर्स्थापना की.

जमूका हँलांकि प्रारंभ में उसका मित्र था, बाद में वो शत्रु बन गया. 1180 तथा 1190 के दशकों में वो ओंग ख़ान का मित्र रहा और उसने इस मित्रता का लाभ जमूका जैसे प्रतिद्वंदियों को हराने के लिए किया. जमूका को हराने के बाद उसमें बहुत आत्मविश्वास आ गया और वो अन्य कबीलों के खिलाफ़ युद्ध के लिए निकल पड़ा. इनमें उसके पिता के हत्यारे शक्तिशाली तातार कैराईट और खुद ओंग खान शामिल थे. ओंग ख़ान के विरूद्ध उसने 1203 में युद्ध छेड़ा. 1206 इस्वी में तेमुजिन, जमूका और नेमन लोगों को निर्णायक रूप से परास्त करने के बाद स्टेपी क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली व्य़क्ति बन गया. उसके इस प्रभुत्व को देखते हुए मंगोल कबीलों के सरदारों की एक सभा (कुरिलताई) में मान्यता मिली और उसे चंगेज़ ख़ान (समुद्री खान) या सार्वभौम शासक की उपाधि देने के साथ महानायक घोषित किया गया. 

कुरिलताई से मान्यता मिलने तक वो मंगोलों की एक सुसंगठित सेना तैयार कर चुका था. उसकी पहली इच्छा चीन पर विजय प्राप्त करने की थी. चीन उस समय तीन भागों में विभक्त था - उत्तर पश्चिमी प्रांत में तिब्बती मूल के सी-लिया लोग, जरचेन लोगों का चीन राजवंश जो उस समय आधुनिक बीजिंग के उत्तर वाले क्षेत्र में शासन कर रहे थे तथा शुंग राजवंश जिसके अंतर्गत दक्षिणी चीन आता था. 1209 में सी लिया लोग परास्त कर दिए गए. 1213 में चीन की महान दीवीर का अतिक्रमण हो गया और 1215 में पेकिंग नगर को लूट लिया गया. चिन राजवंश के खिलाफ़ 1234 तक लड़ाईयाँ चली पर अपने सैन्य अभियान की प्रगति भर को देख चंगेज़ खान अपने अनुचरों की देखरेख में युद्ध को छोड़ वापस मातृभूमि को मंगोलिया लौट गया. सन् 1218 में करा खिता की पराजय के बाद मंगोल साम्राज्य अमू दरिया, तुरान और ख्वारज़्म राज्यों तक विस्तृत हो गया. 1219-1221 के बीच कई बड़े राज्यों - ओट्रार, बुखारा, समरकंद, बल्ख़, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हेरात - ने मंगोल सेना के सामने समर्पण कर दिया. जिन नगरों ने प्रतिशोध किया उनका विध्वंस कर दिया गया. इस दौरान मंगोलों ने बेपनाह बर्बरता का परिचय दिया और लाखों की संख्या में लोगों का वध कर दिया.

भारत की ओर प्रस्थान: चंगेज खान ने गजनी और पेशावर पर अधिकार कर लिया तथा ख्वारिज्म वंश के शासक अलाउद्दीन मुहम्मद को कैस्पियन सागर की ओर खदेड़ दिया जहाँ 1220 में उसकी मृत्यु हो गई. उसका उत्तराधिकारी जलालुद्दीन मंगवर्नी हुआ जो मंगोलों के आक्रमण से भयभीत होकर गजनी चला गया. चंगेज़ खान ने उसका पीछा किया और सिन्धु नदी के तट पर उसको हरा दिया. जलालुद्दीन सिंधु नदी को पार कर भारत आ गया जहाँ उसने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश से सहायता की फरियाद रखी. इल्तुतमिश ने शक्तिशाली चंगेज़ ख़ान के भय से उसको सहयता देने से इंकार कर दिया. इस समय चेगेज खान ने सिंधु नदी को पार कर उत्तरी भारत और असम के रास्ते मंगोलिया वापस लौटने की सोची. पर असह्य गर्मी, प्राकृतिक आवास की कठिनाईयों तथा उसके शमन निमितज्ञों द्वारा मिले अशुभ संकेतों के कारण वो जलालुद्दीन मंगवर्नी के विरुद्ध एक सैनिक टुकड़ी छोड़ कर वापस आ गया. इस तरह भारत में उसके न आने से तत्काल भारत एक संभावित लूटपाट और वीभत्स उत्पात से बच गया. अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्ध में व्यतीत करने के बाद सन् 1227 में उसकी मृत्यु हो गई.

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