24 May 2022

मुग़ल सम्राज्य (1719 से 1857)

रफ़ी उद-दाराजात अथवा रफ़ीउद्दाराजात अथवा रफ़ी उद-दर्जत का जन्म- 1 दिसम्बर, 1699 को हुआ था और वह दसवाँ मुग़ल बादशाह था. वह रफ़ी उस-शहान का पुत्र तथा अज़ीमुश्शान का भाई था. फ़र्रुख़सियर के बाद 28 फ़रवरी, 1719 को सैयद बंधुओं के द्वारा उसे बादशाह घोषित किया गया था. बादशाह रफ़ी उद-दाराजात बहुत ही अल्प समय (28 फ़रवरी से 4 जून, 1719 ई.) तक ही शासन कर सका. सैय्यद बन्धुओं ने फ़र्रुख़सियर के विरुद्ध षड़यन्त्र रचकर 28 अप्रैल, 1719 को गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी. मुग़ल साम्राज्य के इतिहास में किसी अमीर द्वारा किसी मुग़ल बादशाह की हत्या का यह पहला उदाहरण था. इसके बाद सैय्यद बन्धुओं ने रफ़ी उद-दाराजात को सिंहासन पर बैठाया. रफ़ी उद-दाराजात सबसे कम समय तक शासन करने वाला मुग़ल बादशाह था. इसके काल की उल्लेखनीय घटना 'नेकसियर' का विद्रोह था. नेकसियर को विरोधियों ने सम्राट घोषित कर आगरा की गद्दी पर बैठा दिया था. नेकसियर अकबर द्वितीय का पुत्र था. रफ़ी उद-दाराजात की मृत्यु क्षय रोग के कारण हुई.

रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य में हस्तक्षेप की नीति अपनाने वाले सैय्यद बन्धुओं ने रफ़ीउद्दौला को दिल्ली में मुग़ल वंश की गद्दी पर बैठा दिया. गद्दी पर बैठने के बाद रफ़ीउद्दौला ने 'शाहजहाँ शानी', 'शाहजहाँ द्वितीय' की उपाधियाँ धारण कीं. रफ़ीउद्दौला मुग़ल वंश का 11वाँ बादशाह था. वह जून, 1719 से सितम्बर, 1719 ई. (4 महीने) तक ही मुग़ल साम्राज्य का बादशाह रहा. वह दूसरा सबसे कम समय तक शासन करने वाला मुग़ल सम्राट था. अपने भाई रफ़ीउद्दाराजात की भाँति रफ़ीउद्दौला भी सैयद बन्धुओं के हाथ की कठपुतली ही बना रहा. अल्प काल के समय में ही सैयद बन्धुओं ने उसे भी गद्दी से उतार दिया. जिस प्रकार रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु क्षय रोग के कारण हुई, उसी प्रकार इसकी मृत्यु भी पेचिश रोग के कारण हुई. जबकि कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि उसकी हत्या कर दी गई थी.

रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद नेकसियर  मुग़ल वंश का 12वाँ बादशाह बना. वह चालीस वर्ष की आयु में 1719 ई. में मुग़ल राजगद्दी पर बैठा. नेकसियरऔरंगज़ेब का पौत्र और अकबर द्वितीय का पुत्र था. वह उन पाँच कठपुतली बादशाहों में से तीसरा था, जिन्हें सैयद बन्धुओं ने सिंहासनासीन किया था. सैयद बन्धुओं ने उसे 1719 ई. में दिल्ली में मुग़ल गद्दी का अधिकारी बनाया था. नेकसियर केवल थोड़े दिनों के लिए ही बादशाह बन पाया. मुहम्मद इब्राहीम को राजगद्दी पर बैठाने के लिए सैयद बन्धुओं ने उसे गद्दी से उतार दिया.

नेकसियर के बाद मुहम्मद इब्राहीम  मुग़ल वंश का 13वाँ बादशाह बना. वह सैयद बन्धुओं द्वारा 1719 ई. में मुग़ल साम्राज्य का शासक बनाया गया था. मुहम्मद इब्राहीम बहादुरशाह प्रथम के तीसरे पुत्र रफ़ीउश्शान का पुत्र था. सैयद बन्धुओं ने जिन चार नाममात्र के मुग़ल बादशाहों को गद्दी पर बैठाया था, यह उनमें से एक था. इसे भी कुछ समय बाद ही सैयद बन्धुओं ने गद्दी से उतार दिया, और धोखे से मरवा दिया. उस समय दिल्ली के बादशाहों को बनाना और बिगाड़ना इन सैयद बन्धुओं के हाथों में ही था. इसीलिए सैयद बन्धु भारत के इतिहास में बादशाह बनाने वालों के नाम से मशहूर हैं.

मुहम्मुमद इब्हराहीम के बाद मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर मुग़ल वंश का 14वाँ बादशाह बना. उसने लम्बे समय 1719 से 1748 ई. तक मुग़ल साम्राज्य पर शासन किया. वह जहानशाह का चौथा बेटा था. मुहम्मदशाह के शासन काल में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुर्शिद कुली ख़ाँ, अवध में सआदत ख़ाँ तथा दक्कन में निजामुलमुल्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर लीं. इसके अतिरिक्त इसके काल में गंगा तथा दोआब क्षेत्र में रोहिला सरदारों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी. मुहम्मदशाह अयोग्य शासक था. वह अपना अधिकांश समय पशुओं की लड़ाई देखने तथा वेश्याओं और मदिरा के बीच गुजारता था. इसी कारण उसे 'रंगीला' के उपनाम से भी जाना जाता था. 

इसके दरबार में सैय्यद बन्धुओं के बढ़ते हुए प्रभुत्व के कारण एक रोष उत्पन्न हुआ तथा उन्हें समाप्त करने का षडयंत्र किया गया. इस षडयंत्र में ईरानी दल का नेता मुहम्मद अमीन ख़ाँ, मुहम्मदशाह तथा राजमाता कुदसिया बेगम शामिल थीं. 8 अक्टूबर, 1720 को हैदर बेग़ ने छुरा घोपकर हुसैन अली की हत्या कर दी. अपने भाई का बदला लेने के लिए अब्दुल्ला ख़ाँ ने विशाल सेना लेकर मुहम्मदशाह के विरुद्ध चढ़ाई कर दी. 13 नवम्बर, 1720 को हसनपुर के स्थान पर अब्दुल्ला ख़ाँ हार गया, उसे बन्दी बना लिया गया और विष देकर मार डाला गया. इस प्रकार मुहम्मदशाह के शासनकाल में सैय्यद बन्धुओं का पूरी तरह से अन्त हो गया. फ़ारस के शासक नादिरशाह ने 1739 में मुहम्मदशाह के समय में ही दिल्ली पर आक्रमण किया था. बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में 500 घुड़सवार लेकर मार्च, 1737 ई. में उसने दिल्ली पर चढ़ाई की, परन्तु सम्राट ने इसका कोई विरोध नहीं किया.

मुहम्मद शाह रौशन के बाद इसका बेटा अहमद शाह बहादुर 1748 में 23 वर्ष की आयु में 15वां मुगल सम्राट बना. इसकी माता उधमबाई थी, जो कुदसिया बेगम के नाम से प्रसिद्ध थीं. अहमद शाह बहादुर बचपन से ही काफी लाड-प्यार में बड़े हुए. इस समय मुगल साम्राज्य अपने आप में कमजोर होता जा रहा था और कम नेतृत्व क्षमता साफ तौर पर नजर आ रही थी जिसके कारण फिरोज जंग तृतीय नामक एक वजीर का उदय हुआ और बाद में 1754 में उसने अहमद शाह बहादुर को अपनी ताकत के दम पर कैद कर लिया और आलमगीर को सम्राट बनाया. अहमदशाह बचपन से ही आलसी थे. उनको तलवारबाजी चलाना नहीं आता था. अपनी माता कोदिया बेगम के और अपने पिता मोहम्मदशाह के बलबूते के दम पर उन्हें सम्राट की प्राप्त हुई थी. सम्राट बनने के बाद ये हमेशा हरम में लिप्त रहते थे जिसके कारण उनका ध्यान शासन की ओर नहीं जाता था. उन्होंने सफदरजंग को अवध का नवाब घोषित किया और अपनी सारी शक्तियां अपने वजीर के हाथ में दे दी. जिसके कारण बाद में फिरोजजंग ने सदाशिव राव भाऊ जो कि मराठा सरदार थे उनकी सहायता से अहमद शाह बहादुर को कैद कर लिया और वहां उनको और उनकी माता कुदसिया बेगम को अंधा कर दिया गया. इस घटना के बाद जनवरी 1775 में सामान्य तौर पर उनकी मृत्यु हो गई.

अहमद शाह बहादुर के बाद  अज़ीज़-उद्दीन आलमगीर द्वितीय 3 जून 1754 को मुगल सम्राट बना. ये जहांदार शाह का पुत्र था. 1754 में इमाद उल मुल्क की मदद से जो कि उस वक्त काफी ताकतवर मुगल मंत्री था उसकी सहायता से आलमगीर द्वितीय ने सत्ता प्राप्त की और उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जेल में ही काटा था. जिसके कारण इन को सत्ता चलाने या फिर मंत्रियों को काबू में रखने की क्षमता नहीं थी और उनके पास किसी भी तरीके का सैन्य ज्ञान भी नहीं था. जिसके कारण ही इमाद उल मूल्क पर ही उन्हें सभी कार्य करना पड़ता था. आलमगीर द्वितीय एक बहुत ही कमजोर और दूरदर्शी शासक था. 1756 में मराठों के प्रभाव से बचने के लिए उन्होंने फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांगी. इन्होंने उत्तर भारत में अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमणों को रोकने के लिए अपनी बेटी का विवाह तिमुर शाह दुर्रानी जो कि अहमद शाह का पुत्र था उसके साथ कर दिया और दुर्रानी साम्राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए. आलमगीर द्वितीय बहुत ही कमजोर शासक थे उन्होंने मोहम्मद शाह की पुत्री का विवाह अहमद शाह दुर्रानी से करवा दिया. 1757 ईस्वी में अली वर्दी खान की मृत्यु हो गई जो कि बंगाल के नवाब थे और सिराजुद्दोला उनके बाद नबाव बने. सिराजुद्दौला को 1757 ईस्वी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी के युद्ध में हरा दिया जिसके बाद मीर जाफरको नवाब घोषित किया गया. परंतु आलमगीर द्वितीय इस बात से नाखुश थे परंतु इमादुल मुलक की तानाशाही की वजह से मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया गया.

अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए उसने इमिद उल मुलक को खत्म करना ही सही समझा जिसके बाद उसने सदाशिवराव भाऊ को दिल्ली में आने का न्योता दिया. इससे इमाद उल मुल्क और नजीब खान रोहिल्ला दोनों ही आलमगीर द्वितीय से काफी ना खुश हो गए. जिसके बाद उन दोनों ने साजिश रचकर 1759 ईस्वी में आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी. जिसके बाद उनके पुत्र शाह आलम द्वितीय वहां से भाग निकला और वहां से भाग कर पटना की ओर भाग गया. उसके बाद उन्होंने शाहजहां तृतीय को वापस मुगल सम्राट बनाया.  ये मुहम्मद कम बख्श का ज्येष्ठ पुत्र था, जो औरंगज़ेब का कनिष्ठ पुत्र था.

इस घटना के बाद शाह आलम द्वितीय अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए इमाद उल मुल्क और शाहजहां तृतीय के विरुद्ध षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया. उन्होंने अपनी एक बहुत बड़ी सेना बनाई और शाहजहां तृतीय और इमादउल मुलक को हटाने के लिए सदाशिवराव भाऊ से सहायता मांगी. सदाशिवराव भाऊ ने उनकी मदद की और इमादउल मुलक को खत्म कर शाहजहां तृतीय को गद्दी से हटाकर 1760 में शाह आलम को दिल्ली का मुगल सम्राट बनाया गया. इसके बाद 1760 से लेकर 1806 तक इन्होने  शासन किया. 1764 में अवध के नवाब, बंगाल के नवाब और मुगल सम्राट की सेनाओं ने बक्सर के युद्ध में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई भी लड़ी. बक्सर के युद्ध में उन्होंने अवध के नवाब सूजाउददौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम और खुद को ही अपनी बड़ी मुगल सेनाओं को लेकर बक्सर में पहुंचे जहां पर उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं से उनका सामना हुआ. परंतु उस युद्ध में पराजित हुए और अंत में उन्हें 1765 में इलाहाबाद की संधि करनी पड़ी यह उनके लिए बहुत शर्मनाक हार थी.  जिसके कारण मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दीवानी इलाहाबाद की संधि के तहत अंग्रेजों को दे दी. अंग्रेजों की यह बहुत बड़ी सफलता थी और मुगल कमजोर हो गए. 

1764 से लेकर 1771 ईसवी तक वे अवध के नवाब के संरक्षण में रहे उस वक्त उनके बेटे ने मुगल दरबार के सभी राज्य को संभाला. परंतु 1771 में महादजी शिंदे के नेतृत्व में मराठा सेना ने वापस उन्हें दिल्ली का सुल्तान बनाया और दिल्ली की गद्दी वापस दिलाई. महादाजी से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे अमीरुल हमारा और वकील उल मुतल्क की उपाधि प्रदान की. उन्होंने अपनी सेना को यूरोपियन तरीके से तैयार करने की पूरी कोशिश की जिसकी कमान उन्होंने मिर्जा नजफ खान जो कि परसिया से 1740 में में भारत आए थे उनको दी. उन्होंने मुगल सेना को वापस तैयार करने की पूरी कोशिश की परंतु ऐसा करने में सफल नहीं हुए और  1771 में उनकी मृत्यु हो गई. शाह आलम का ध्यान भारतीय कला की तरफ बिल्कुल नहीं था और वह एक कमजोर शासक थे. हालांकि उन्होंने दिल्ली सल्तनत को वापस ताकतवर बनाने का पूरा प्रयास किया परंतु ऐसा करने में भी सफल नहीं हो सके. 

1788 ई0 मे गुलाम कादिर जो रोहिला सरदार था उसने शाह आलम को कैद कर लिया और आलम की दोनों आंखें फोड़  दी  और उनके बच्चों का रेप किया गया. कुछ बचने के लिए नदी में कूद गई. महादजी शिंदे ने जल्द से दिल्ली पर आक्रमण किया और गुलाम कादिर को खत्म कर दिया. एक बार फिर शाह आलम को बचा लिया. 1803 में एक बार फिर अंग्रेजों ने दिल्ली पर आक्रमण किया और महादाजी सिंधिया के वारिस दौलतराव शिंदे को पराजित कर दिल्ली पर अपना कब्जा कर लिया और मुगल सम्राट को कठपुतली मुगल सम्राट बना दिया. मात्र एक नाम मात्र के सम्राट और अंग्रेजों ने उनके ऊपर राज करना शुरू कर दिया. इसके तहत संपूर्ण ताकत अंग्रेजों के हाथ में चली गई 1806  मे उनकी मृत्यु हो गयी. उनका राज अपनी मृत्यु के समय से दिल्ली तक ही सीमित रह गया. 

 शाह आलम द्वितीय के बाद अकबर द्वितीय 1806 में अगला मुगल सम्राट बना. उन्होंने 1806 से 1837 तक शासन किया. वह शाह आलम द्वितीय के दूसरे पुत्र और बहादुर शाह ज़फ़र के पिता थे. उन्होंने हिंदू मुस्लिमों को एक करने के लिए एक नया त्योहार मनाना शुरू किया जिसको फूल वालों की सैर कहा जाता है और वह आगे चलकर उनके पुत्रों ने भी इस त्यौहार को मनाना चालू रखा और आज तक दिल्ली में त्योहार मनाया जाता है. उसके समय तक भारत का अधिकांश राज्य अंग्रेज़ों के हाथों में चला गया था और 1803 ई. में दिल्ली पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया. वह ईस्ट इंडिया कम्पनी की कृपा के सहारे नाम मात्र का ही बादशाह था. 1835 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सम्राट का अपमान करने के लिए उनके नाम के सिक्के चलाना बंद कर दिया. इस बात को लेकर वे काफी नाराज हो गए परंतु उन्होंने अंग्रेजों के साथ एक समझौता कर ली थी जिसके तहत साम्राज्य का सारा कारोबार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में था. 

अकबर द्वितीय से गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स  की ओर से कहा गया कि वह कम्पनी के क्षेत्र पर अपनी बादशाहत का दावा छोड़ दे. लॉर्ड हेस्टिंग्स ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से मुग़ल बादशाह को दी जाने वाली सहायता आदि की भी नज़रबन्दी कर दी. इसके बाद अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को 'राजा' की उपाधि प्रदान की तथा उनसे इंग्लैंण्ड जाकर बादशाह की पेंशन बढ़ाने की सिफ़ारिश करने का आग्रह किया. इंग्लेंड की महारानी ने इस बात से साफ इंकार कर दिया और इस कारण से दिल बहुत ही दुखी हो और अंत में निजाम हैदराबाद के नवाब ने भी सम्मान करना छोड़ दिया. वह मिजा फखरू को गददी पर देखना चाहते थे परंतु वजीर और कई सारे मंत्रियों के कहने पर बहादुर शाह जफर को गददी दिलाई. जफर 1837 में मुगल सम्राट बने और अंतिम मुगल सम्राट के रूप में जाने जाते हैं. 1857 में उनकी गद्दी खत्म कर दी गई और उनको बर्मा भेज दिया गया जहां 1862 में उनकी मृत्यु हो गई. इस तरह 332 सालों से चले आये महान मुगल साम्राज्य का  1857 में अंत हो गया.

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