30 May 2022

राजा पोरस

राजा पोरस पौरों का राजा था. राजा पोरस का राज्य पंजाब में झेलम से लेकर चेनाब नदी तक फैला हुआ था. वर्तमान लाहौर के आस-पास इसकी राजधानी थी.
 महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे. पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था. पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था. उसने उन सभी के समर्थन से अपने साम्राज्य का निर्माण किया था जिन्होंने खुखरायनों पर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था. जब सिकंदर हिन्दुस्तान आया और झेलम के समीप पोरस के साथ उसका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था. इस तरह पोरस, उनका शक्तिशाली नेता बन गया.

सिन्धु और झेलम को पार किए बगैर पोरस के राज्य में पैर रखना मुश्किल था. राजा पोरस अपने क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति, भूगोल और झेलम नदी की प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ थे. पुरु को अपनी वीरता और हस्तिसेना पर विश्वास था लेकिन उसने सिकंदर  को झेलम नदी पार करने से नहीं रोका और सिकंदर  झेलम नदी के इस पार आने के बाद  बुरी तरह फंस गया था, क्योंकि नदी पार करने के बाद नदी में बाढ़ आ गई थी. जब सिकंदर  ने आक्रमण किया तो उसका गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने स्वागत किया और आम्भी ने सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की. आम्भी राजा पोरस को अपना दुश्मन समझता था. सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस ने तब सिकंदर  की अधीनता स्वीकार नहीं की.

जासूसों और धूर्तताके बल पर सिकंदर  के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः विश्वस्त थे. राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर  ने झेलम पार की. राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े. पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे. भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों भी मार गिरा सकता था. इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली. सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए. 

यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया. कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है. राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया. ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था. सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था. सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया. यह डर नहीं था, शायद यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, बहरहाल तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से भगा ले गए. 

लेकिन कुछ समय बाद सिकंदर ने सेना ने छल से पोरस को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें सिकंदर के सामने पेश किया गया. सिकंदर ने पोरस से सवाल किया कि उनके साथ कैसा बर्ताव किया जाए? इस सवाल के जवाब में पोरस ने सिकंदर से बड़े आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ कहा कि ठीक वैसा, जैसा एक शासक दूसरे शासक के साथ करता है. सिकंदर को उनका आत्मविश्वास से भरा जवाब पसंद आया और उसके बाद सिकंदर को महसूस हुआ कि उनकी सेना को यहां काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है और नुक़सान झेलना पड़ा है. इस तरह के नुक़सान और टकराव से बचने के लिए सिकंदर ने पोरस से दोस्ताना संबंध स्थापित किया. पोरस से संधि के बाद सिकंदर जनरल नियाज़ को ज़िम्मेदारी सौंप कर अपने प्रदेश की तरफ़ लौटने लगे, लेकिन रास्ते में उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और उनकी मृत्यु हो गई. सिकंदर की मौत के बाद 323 ईसा पूर्व में  उनके ही एक जनरल ने पोरस की हत्या करवा दी.

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