31 May 2022

विद्यापति

विद्यापति (1352-1448ई) मैथिली और संस्कृत कवि, संगीतकार, लेखक, दरबारी और राज पुरोहित थे. वह शिव के भक्त थे, लेकिन उन्होंने प्रेम गीत और भक्ति वैष्णव गीत भी लिखे. उन्हें 'मैथिल कवि कोकिल' (मैथिली के कवि कोयल) के नाम से भी जाना जाता है. विद्यापति का प्रभाव केवल मैथिली और संस्कृत साहित्य तक ही सीमित नहीं था, बल्कि अन्य पूर्वी भारतीय साहित्यिक परम्पराओं तक भी था. उन्हें "बंगाली साहित्य का जनक" कहा है. विद्यापति भारतीय साहित्य की 'शृंगार-परम्परा' के साथ-साथ 'भक्ति-परम्परा' के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं. इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है. इन्हें वैष्णव, शैव और शाक्त भक्ति के सेतु के रूप में भी स्वीकार किया गया है. मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महान् प्रयास किया है. मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की शृंगार और भक्ति-रस में पगी रचनाएँ जीवित हैं. पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनाएँ हैं.

विद्यापति का जन्म उत्तरी बिहार के मिथिला क्षेत्र के वर्तमान मधुबनी जिला के विस्फी गाँव में एक शैव ब्राह्मण परिवार में हुआ था. विद्यापति नाम दो संस्कृत शब्दों, विद्या और पति से लिया गया है. उनके स्वयं के कार्यों और उनके संरक्षकों की परस्पर विरोधी जानकारी के कारण उनकी सही जन्म तिथि के बारे में भ्रम है. वह गणपति ठाकुर के पुत्र थे, एक मैथिल ब्राह्मण जिसे शिव का बहुत बड़ा भक्त कहा जाता है. वह तिरहुत के शासक राजा गणेश्वर के दरबार में एक पुरोहित थें. उनके परदादा देवादित्य ठाकुर सहित उनके कई निकट पूर्वज अपने आप में उल्लेखनीय थे, जो हरिसिंह देव के दरबार में युद्ध और शान्ति मंत्री थे.

विद्यापति ने स्वयं मिथिला के ओइनवार वंश के विभिन्न राजाओं के दरबार में काम किया. विद्यापति सर्व प्रथम कीर्ति सिंह दरबार मे काम किया था, जिन्होंने लगभग 1370 से 1380 तक मिथिला पर शासन किया था. इस समय विद्यापति ने 'कीर्त्तिलता' की रचना की, जो पद्य में उनके संरक्षक के लिए एक लंबी स्तुति-कविता थी. इस कृति में दिल्ली के दरबारियों की प्रशंसा करते हुए एक विस्तारित मार्ग है, जो प्रेम कविता की रचना में उनके बाद के गुण को दर्शाता है. हालांकि कीर्त्तिसिंह ने कोई और काम नहीं किया, विद्यापति ने कीर्ति सिंह उत्तराधिकारी देवसिंह के दरबार में एक स्थान हासिल किया. गद्य कहानी संग्रह भूपरिक्रमण देवसिंह के तत्वावधान में लिखा गया था. विद्यापति ने देवसिंह के उत्तराधिकारी शिवसिंह के साथ घनिष्ठ मित्रता की और प्रेम गीतों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया. उन्होंने मुख्य रूप से 1380 और 1406 के बीच लगभग पाँच सौ प्रेम गीत लिखे. उस अवधि के बाद उन्होंने जिन गीतों की रचना की, वे शिव, विष्णु, दुर्गा और गंगा की भक्तिपूर्ण स्तुति थे.

1402 से 1406 तक मिथिला के राजा शिवसिंह और विद्यापति के बीच घनिष्ठ मित्रता थी. जैसे ही शिवसिंह अपने सिंहासन पर बैठें, उन्होंने विद्यापति को अपना गृह ग्राम बिस्फी प्रदान किया, जो एक ताम्र पत्र पर दर्ज किया गया था. थाली में, शिवसिंह उसे "नया जयदेव" कहते हैं. 1406 में, एक मुस्लिम सेना के साथ लड़ाई में शिवसिंह लापता हो गए थें. इस हार के बाद, विद्यापति और दरबार ने नेपाल के राजाबनौली में एक राजा के दरबार में शरण ली. 1418 में, पद्मसिंह एक अंतराल के बाद मिथिला के शासक के रूप में शिवसिंह के उत्तराधिकारी बने, जब शिवसिंह की प्रमुख रानी लखीमा देवी ने 12 वर्षों तक शासन किया. विद्यापति फिर अपने पद्मसिंह पर लौट आए और लेखन जारी रखा, मुख्य रूप से कानून और भक्ति नियमावली पर ग्रंथ लिखा. 

मैथिल कोकिल के नाम से चर्चित विद्यापति ठाकुर भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. एक कथा प्रचलित है कि उनकी भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक दिन नौकर के वेश में इनके घर पहुंचे और चाकरी करने का मौका देने की गुहार लगाई. शिव ने अपना नाम 'उगना' बताया. विद्यापति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उगना को बतौर नौकर अपने घर में रखने से मना कर दिया. लेकिन शिव मानने वाले कहां थे. पगार के बजाय सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने को तैयार हो गए. विद्यापति की पत्नी सुधीरा ने कहा, उगना बड़ा नेक लड़का लगता है, रख लीजिए, हमारी सेवा करने वाला भी तो कोई नहीं है. विद्यापति ने पत्नी की बात मान ली और शिव की इच्छा पूरी हो गई.

एक दिन विद्यापति के साथ राजा शिव सिंह के दरबार में जा रहे थे. साथ में उगना भी था. तेज गर्मी की वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा. आसपास पानी का कोई स्रोत नहीं था. व्याकुल विद्यापति ने उगना से कहा, कहीं से जल का प्रबंध करो, अन्यथा मैं प्यासा ही मर जाऊंगा. शिव कुछ दूर जाकर पेड़ों की आड़ में छिपकर अपने को वास्तविक रूप में ले आए. उनकी जटा में गंगा थीं. जटा खोलकर उन्होंने लोटे में जल भर लिया और फिर उगना रूप में विद्यापति के सामने पानी भरा लोटा रख दिया. विद्यापति ने जब जल पिया तो उन्हें गंगाजल का स्वाद महसूस हुआ. वह आश्चर्यचकित हो उठे कि इस वन में दूर तक कहीं जल का कोई स्रोत नहीं दिखता, लेकिन उगना को गंगाजल कहां मिल गया. विद्यापति को उगना पर संदेह होने लगा. उन्होंने सोचा, कोई साधारण व्यक्ति इतनी जल्दी गंगाजल नहीं ला सकता. इसमें जरूर कोई दिव्यशक्ति है. वह उगना से उसका वास्तविक परिचय बताने की जिद करने लगे.

जब विद्यापति ने उगना को शिव कहकर उनके चरण पकड़ लिए, तब उगना को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा. शिव ने विद्यापति से कहा, मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर रहना चाहता हूं, लेकिन कभी किसी को मेरा वास्तविक परिचय मत देना. जिस दिन किसी को मेरा वास्तविक परिचय दोगे, मैं तत्क्षण ओझल हो जाऊंगा. विद्यापति को बिना मांगे संसार के ईश्वर का सान्निध्य मिल चुका था. उन्होंने शिव की शर्त मान ली. एक दिन सुधीरा ने उगना को जंगल से लकड़ियां बीनकर लाने के लिए कहा. उगना दूसरे काम में लग गया और वह काम भूल गया. सुधीरा इससे नाराज हो गईं और चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर लगी उगना की पिटाई करने. विद्यापति ने जब यह श्य देखा तो अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा, अरे, अहां ई की अनर्थ करै छी, ई त' साक्षात् भगवान शिव थिकाह! विद्यापति के मुंह से ये शब्द निकलते ही शिव अंर्तध्यान हो गए.

इसके बाद विद्यापति पागलों की भांति 'उगना रे मोर कतय गेलाह' कहते हुए वनों में, खेतों में, हर जगह उगना को ढूंढने लगे. भक्त की ऐसी मनोदशा देखकर शिव को दया आ गई. एक वन में भगवान शिव उगना के रूप में प्रकट हो गए, मगर कहा कि 'अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता. उगना रूप में मैं जो तुम्हारे साथ रहा उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिव लिंग के रूप में विराजमान रहूंगा.' शिव की इस लीला से गौरी भी प्रसन्न हुईं. इसके बाद शिव अपने लोक लौट गए और उस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हो गया. उगना महादेव का प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में स्थित है.

विद्यापति को एक दिन अपनी मृत्यु का आभास हुआ और वे गंगा लाभ करना चाहते थे. वे मधुबनी के अपने बिस्फी ग्राम से गंगा के लिए चले और रास्ते में थक जाने पर एक जगह बैठ गये और कहा कि वे माता के लिए इतनी दूर आ सकते है तो मां यहां क्यों नहीं आ सकती है. कहते है की बिहार के समस्तीपुर जिले के विद्यापतिधाम से तीन कोस की दूरी पर स्थित गंगा की धारा आयी और उन्हें अपने साथ बहा कर ले गयी. उन्होंने आवाहन किया तो गंगा प्रकट हुईं और वह उसमें समा गए. वह तिथि थी कार्तिक धवल त्रयोदशी. इस तिथि को देशभर में मैथिल समुदाय हर साल विद्यापति स्मृति पर्व मनाता है.

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