09 May 2022

मुग़ल बादशाह जहाँगीर

जहाँगीर एक मुगल सम्राट था जो अपने पिता अकबर के बाद सिंहासन पर बैठा था. मुगल सम्राट जहांगीर को आगरा में बनी “न्याय की जंजीर” के लिए भी याद किया जाता है. जहाँगीर का जन्म 31 अगस्त 1569 को फतेहपुर सीकरी में हुआ था. उनका वास्तविक नाम मिर्ज़ा नूर-उद्दीन बेग़ मोहम्मद ख़ान सलीम जहाँगीर था. उनके पिता का नाम अकबर तथा उनकी माता का नाम मरियम उज़-ज़मानी था. जहाँगीर से पहले अकबर की कोई भी संतानें जीवित नहीं बचती थी, जिसके चलते सम्राट अकबर ने काफी मिन्नतें कीं और फिर बाद सलीम का जन्म हुआ था. जहांगीर को बचपन में सब उन्हें सुल्तान मुहम्मद सलीम कहकर पुकारते थे. 
जहांगीर के अपनी सभी पत्नियों से पांच बेटे खुसरो मिर्जा, खुर्रम मिर्जा (शाहजहां), परविज मिर्जा, शाहरियर मिर्जा, जहांदर मिर्जा और इफत बानू बेगम, बहार बानू बेगम, बेगम सुल्तान बेगम, सुल्तान-अन-निसा बेगम,दौलत-अन-निसा बेगम नाम की पुत्रियां थी.

अकबर का इकलौता वारिस होने के कारण और वैभव-विलास में पालन-पोषण की वजह से जहांगीर एक बेहद शौकीन और रंगीन मिजाज का शासक था, जिसने करीब 20 शादियां की थी, हालांकि उनकी सबसे चहेती और पसंदीदा बेगम नूर जहां थीं. वहीं उनकी कई शादियां राजनीतिक कारणों से भी हुईं थी. 16 साल की उम्र में जहांगीर की पहली शादी आमेर के राजा भगवान राज की राजकुमारी मानबाई से हुई थी. जिनसे उन्हें दो बेटों की प्राप्ति हुई थी. वहीं जहांगीर के बड़े बेटे खुसरो मिर्जा के जन्म के समय मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी पत्नी मानबाई को शाही बेगम की उपाधि प्रदान की थी. इसके बाद जहांगीर कई अलग-अलग राजकुमारियों से उनकी सुंदरता पर मोहित होकर शादी की. आपको बता दें साल 1586 में जहांगीर ने उदय सिंह की पुत्री जगत गोसन की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह किया. जिनसे उन्हें दो पुत्र और दो पुत्रियां पैदा हुईं. हालांकि, इनमें से सिर्फ एक ही पुत्र खुर्रम जीवित रह सका, अन्य संतान की बचपन में ही मौत हो गई. बाद में उनका यही पुत्र सम्राट शाहजहां के रुप में मुगल सिंहासन पर बैठा और मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया, वहीं शाहजहां को लोग आज भी सात आश्चर्यों में से एक ताजमहल के निर्माण के लिए याद करते हैं.

जहाँगीर जब महज 4 साल के थे, तब सम्राट अकबर ने उनके लिए बैरम खां के पुत्र अब्दुल रहीम खान-ए-खाना जैसे विद्धान शिक्षक नियुक्त किया. जिससे जहांगीर ने इतिहास, अंकगणित, भूगोल, अरबी, फारसी, और विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की थी, जिसकी वजह से जहांगीर अरबी और फारसी में विद्धान हो गया था. 1599 ई. तक सलीम अपनी महत्वाकांक्षा के कारण अकबर के विरुद्ध विद्रोह में संलग्न रहा. 21, अक्टूबर 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपनी पगड़ी एवं कटार से सुशोभित कर उत्तराधिकारी घोषित किया. अकबर की मृत्यु के आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को सलीम का राज्याभिषेक ‘नुरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह ग़ाज़ी’ की उपाधि से आगरा के क़िले में सम्पन्न हुआ।

साल 1605 में अकबर की मृत्यु के बाद सुल्तान सलीम को मुगल ‘बादशाह’ का ताज पहनाया गया और उन्हें जहाँगीर नाम की उपाधि दी गई. वहीं जब मुगल शासक जहांगीर की उम्र 36 साल की थी, तब उन्हें मुगल साम्राज्य की जिम्मेदारी एक आदर्श शासक के रुप में संभाली और कई सालों तक मुगल सिंहासन संभाला. उन्होंने अपने शासनकाल में मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया और विजय अभियान चलाया. वहीं जो क्षेत्र उनके पिता अकबर द्धारा नहीं हासिल किए गए थे, उन्होंने सबसे पहले ऐसे निर्विवाद क्षेत्रों को जीतने के प्रयास किए. मुगल सम्राट जहांगीर ने अपना सबसे पहला सैन्य अभियान मेवाड़ के शासक अमर सिंह के खिलाफ चलाया. जिसके बाद अमर सिंह को जहांगीर के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा और फिर दोनों शासकों के बीच साल 1615 ईसवी में शांति संधि हुई.

मेवाड़ में मुगल साम्राज्य का विस्तार करने के बाद अपना विजय अभियान चलाते हुए, जहांगीर ने दक्षिण भारत में मुगलों का आधिपत्य जमाने के मकसद से दक्षिण में फोकस करना शुरु किया. हालांकि वे इस पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण करने में तो कामयाब नहीं हो सके, लेकिन उनके सफल प्रयासों से बीजापुर के शासक, अहमदनगर और मुगल साम्राज्य के बीच शांति समझौता किया गया, जिसके बाद कुछ किले और बालाघाट के क्षेत्र मुगलों को दे दिए गए. जबकि जहांगीर ने अपने पुत्र खुर्रम उर्फ शाहजहां के नेतृत्व में साल 1615 में उत्तरी भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार किया. इस दौरान उनकी सेना ने कांगड़ा के राजा को हार की धूल चटाई और अपने विजयी अभियानों को दक्करन तक आगे बढ़ाया. इस तरह मुगल साम्राज्य का विस्तार होता चला गया.

मुगल सम्राट जहांगीर चित्रकला का बेहद शौकीन था, वे अपने महल में कई अलग-अलग तरह के चित्र इकट्ठे करते रहते थे उसने अपने शासनकाल में चित्रकला को काफी बढ़ावा भी दिया था. यही नहीं जहांगीर खुद के एक बेहतरीन आर्टिस्ट थे. मनोहर और मंसूर बिशनदास जहांगीर के शासनकाल के समय के मशहूर चित्रकार थे. जहांगीर के शासनकाल को चित्रकला का स्वर्णकाल भी कहा जाता है. वहीं मुगल सम्राट जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है कि “कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या फिर जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरंत बता सकता हुँ कि यह किस चित्रकार की कृति है.”

जहाँगीर ने न्याय व्यवस्था ठीक रखने की ओर विशेष ध्यान दिया था. न्यायाधीशों के अतिरिक्त वह स्वयं भी जनता के दु:ख-दर्द को सुनता था. उसके लिए उसने अपने निवास−स्थान से लेकर नदी के किनारे तक एक जंजीर बंधवाई थी और उसमें बहुत सी घंटियाँ लटकवा दी थीं. यदि किसी को कुछ फरियाद करनी हो, तो वह उस जंजीर को पकड़ कर खींच सकता था, ताकि उसमें बंधी हुई घंटियों की आवाज़ सुनकर बादशाह उस फरियादी को अपने पास बुला सके. यह कार्य राजा और जनता के बीच सम्बन्ध स्थापित करने के लिहाज़ से बहुत अहम था. इसे बजाने वाले नागरिको की फरियाद राजा खुद सुनते थे. यह जंजीर सोने की थी और उसके बनवाने में बड़ी लागत आई थी. उसकी लंबाई 40 गज़ की थी और उसमें 60 घंटियाँ बँधी हुई थीं. उन सबका वज़न 10 मन के लगभग था.

उससे जहाँ बादशाह के वैभव का प्रदर्शन होता था, वहाँ उसके न्याय का भी ढ़िंढोरा पिट गया था. किंतु इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता है कि, किसी व्यक्ति ने उस जंजीर को हिलाकर बादशाह को कभी न्याय करने का कष्ट दिया हो. उस काल में मुस्लिम शासकों का ऐसा आंतक था कि, उस जंजीर में बँधी हुई घंटियों को बजा कर बादशाह के ऐशो−आराम में विघ्न डालने का साहस करना बड़ा कठिन था. जहाँगीर को शराब पीने की लत थी, जो अंतिम काल तक रही थी. वह उसके दुष्टपरिणाम को जानता था; किंतु उसे छोड़ने में असमर्थ था. किंतु जनता को शराब से बचाने के लिए उसने गद्दी पर बैठते ही उसे बनाने और बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. उसने शासन सँभालते ही एक शाही फ़रमान निकाला था, जिसमें 12 आज्ञाओं को साम्राज्य भर में मानने का आदेश दिया गया था. इन आज्ञाओं में से एक शराबबंदी से संबंधित थी. उस प्रकार की आज्ञा होने पर भी वह स्वयं शराब पीता था और उसके प्राय: सभी सरदार सामंत, हाकिम और कर्मचारी भी शराब पीने के आदी थे. ऐसी स्थिति में शराबबंदी की शाही आज्ञा का कोई प्रभावकारी परिणाम निकला हो, इससे संदेह है.

जहांगीर को लिखने का काफी शौकिन था, जहांगीर द्वारा शुरू की गई किताब “तुजुक-ए-जहांगीर” नाम की आत्मकथा को मौतबिंद खान द्धारा पूरा किया गया. जहांगीर की मृत्यु 28 अक्टूबर 1627 ई. में कश्मीर से वापस आते समय रास्ते में ही भीमवार नामक स्थान पर हुई. उन्हे लाहौर के पास शहादरा में रावी नदी के किनारे दफनाया गया.

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