24 June 2022

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिन्तक और संगठनकर्ता थे. वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद नामक विचारधारा दी. वे एक समावेशित विचारधारा के समर्थक थे जो एक मजबूत और सशक्त भारत चाहते थे. राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी. उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में कई लेख लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को मथुरा जिले के "नगला चन्द्रभान" ग्राम में हुआ था. उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था, जो नगला चंद्रभान (फरह, मथुरा) के निवासी थे. उनकी माता का नाम रामप्यारी था, जो धार्मिक प्रवृत्ति की थीं. पिता रेलवे में जलेसर रोड स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर थे. रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर ही बीतता था. कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे.

दीनदयाल अभी 3 वर्ष के भी नहीं हुये थे, कि उनके पिता का देहान्त हो गया. पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा. वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं. उन्हें क्षय रोग लग गया. 8 अगस्त 1924 को उनका भी देहावसान हो गया. उस समय दीनदयाल 7 वर्ष के थे. 1926 में नाना चुन्नीलाल भी नहीं रहे. 1931 में पालन करने वाली मामी का निधन हो गया.  8वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उपाध्याय जी ने कल्याण हाईस्कूल, सीकर, राजस्थान से दसवीं की परीक्षा में बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया. 1937 में पिलानी से इंटरमीडिएट की परीक्षा में पुनः बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया. 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कालेज से बी०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और  एम०ए० करने के लिए सेंट जॉन्स कालेज, आगरा में प्रवेश लिया और पूर्वार्द्ध में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये. बीमार बहन रामादेवी की शुश्रूषा में लगे रहने के कारण उत्तरार्द्ध न कर सके. बहन की मृत्यु ने उन्हें झकझोर कर रख दिया. मामाजी के बहुत आग्रह पर उन्होंने प्रशासनिक परीक्षा दी, उत्तीर्ण भी हुये किन्तु अंगरेज सरकार की नौकरी नहीं की. 1941 में प्रयाग से बी०टी० की परीक्षा उत्तीर्ण की. बी०ए० और बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की.

1937 में जब वह कानपुर से बी०ए० कर थे, अपने सहपाठी बालूजी महाशब्दे की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये. संघ के संस्थापक डॉ० हेडगेवार का सान्निध्य कानपुर में ही मिला. उपाध्याय जी ने पढ़ाई पूरी होने के बाद संघ का दो वर्षों का प्रशिक्षण पूर्ण किया और संघ के जीवनव्रती प्रचारक हो गये. आजीवन संघ के प्रचारक रहे. संघ के माध्यम से ही उपाध्याय जी राजनीति में आये. 21 अक्टूबर 1951 को डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना हुई. गुरुजी (गोलवलकर जी) की प्रेरणा इसमें निहित थी. 1952 में इसका प्रथम अधिवेशन कानपुर में हुआ. उपाध्याय जी इस दल के महामंत्री बने. इस अधिवेशन में पारित 15 प्रस्तावों में से 7 उपाध्याय जी ने प्रस्तुत किये. डॉ० मुखर्जी ने उनकी कार्यकुशलता और क्षमता से प्रभावित होकर कहा- "यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं, तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा बदल दूँ."

1967 तक उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे. 1967 में कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. वह मात्र 43 दिन जनसंघ के अध्यक्ष रहे. 11 फरवरी 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई. 11 फरवरी को प्रातः पौने चार बजे सहायक स्टेशन मास्टर को खंभा नं० 1276 के पास कंकड़ पर पड़ी हुई लाश की सूचना मिली. शव प्लेटफार्म पर रखा गया तो लोगों की भीड़ में से चिल्लाया- "अरे, यह तो जनसंघ के अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय हैं." पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी.

दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं. उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था. उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी. उन्हें जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार माना जाता है. उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है. उपाध्याय जी पत्रकार होने के साथ-साथ चिन्तक और लेखक भी थे. उनकी असामयिक मृत्यु से यह बात स्पष्ट है कि जिस धारा में वे भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी. 

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