05 July 2022

कस्तूरबा गांधी

कस्तूरबा गांधी भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी की पत्नी थी जो भारत में बा के नाम से विख्यात है. कस्तूरबा गाँधी का जन्म 11 अप्रैल सन् 1869 ई. में काठियावाड़ के पोरबंदर नगर में हुआ था. इस प्रकार कस्तूरबा गाँधी आयु में गाँधी जी से 6 महीने बड़ी थीं. कस्तूरबा गाँधी के पिता 'गोकुलदास मकनजी' साधारण स्थिति के व्यापारी थे. गोकुलदास मकनजी की कस्तूरबा तीसरी संतान थीं. उस जमाने में कोई लड़कियों को पढ़ाता तो था नहीं, विवाह भी अल्पवय में ही कर दिया जाता था. इसलिए कस्तूरबा भी बचपन में निरक्षर थीं और सात साल की अवस्था में 6 साल के मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई. तेरह साल की आयु में उन दोनों का विवाह हो गया.

पति-पत्नी 1888 ई. तक लगभग साथ-साथ ही रहे किंतु बापू के इंग्लैंड प्रवास के बाद से लगभग अगले बारह वर्ष तक दोनों प्राय: अलग-अलग से रहे. इंग्लैंड प्रवास से लौटने के बाद शीघ्र ही बापू को अफ्रीका जाना पड़ा. जब 1896 में वे भारत आए तब बा को अपने साथ ले गए. तब से बा बापू के पद का अनुगमन करती रहीं. उन्होंने उनकी तरह ही अपने जीवन को सादा बना लिया. वे बापू के धार्मिक एवं देशसेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं. यही उनके सारे जीवन का सार है. बापू के अनेक उपवासों में बा प्राय: उनके साथ रहीं और उनकी देख-भाल करती रहीं. जब 1932 में हरिजनों के प्रश्न को लेकर बापू ने यरवदा जेल में आमरण उपवास आरंभ किया उस समय बा साबरमती जेल में थीं. उस समय वे बहुत बेचैन हो उठीं और उन्हें तभी चैन मिला जब वे यरवदा जेल भेज दी गई. धर्म के संस्कार बा में गहरे बैठे हुए थे. वे किसी भी अवस्था में मांस और शराब लेकर मानुस देह भ्रष्ट करने को तैयार न थीं. अफ्रीका में कठिन बीमारी की अवस्था में भी उन्होंने मांस खाना अस्वीकार कर दिया और आजीवन इस बात पर दृढ़ रहीं.

दक्षिण अफ्रीका में 1913 में एक ऐसा कानून पास हुआ जिससे ईसाई मत के अनुसार किए गए और विवाह विभाग के अधिकारी के यहाँ दर्ज किए गए विवाह के अतिरिक्त अन्य विवाहों की मान्यता अग्राह्य की गई थी. दूसरे शब्दों में हिंदू, मुसलमान, पारसी आदि लोगों के विवाह अवैध करार दिए गए और ऐसी विवाहित स्त्रियों की स्थिति पत्नी की न होकर रखैल सरीखी बन गई. बापू ने इस कानून को रद कराने का बहुत प्रयास किया लेकिन जब वे सफल नही  हुए तब उन्होंने सत्याग्रह करने का निश्चय किया और उसमें सम्मिलित होने के लिये स्त्रियों का भी आह्वान किया. पर इस बात की चर्चा उन्होंने अन्य स्त्रियों से तो की किंतु बा से नहीं की. वे नहीं चाहते थे कि बा उनके कहने से सत्याग्रहियों में जाएं और फिर बाद में कठिनाइयों में पड़कर विषम परिस्थिति उत्पन्न करें. वे चाहते थे कि वे स्वेच्छानुसार जाएं और जाएं तो दृढ़ रहें. जब बा ने देखा कि बापू ने उनसे सत्याग्रह में भाग लेने की कोई चर्चा नहीं की तो बड़ी दु:खी हुई और बापू को उपालंभ दिया. फिर वे स्वेच्छानुसार सत्याग्रह में सम्मिलित हुई और तीन अन्य महिलाओं के साथ जेल गई. जेल में जो भोजन मिला वह अखाद्य था अत: उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया. किंतु जब उनके इस अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तो उन्होंने उपवास करना आरंभ कर दिया. जिसके कारण पाँचवें दिन अधिकारियों को झुकना पड़ा किंतु जो फल दिए गए वह पूरे भोजन के लिये पर्याप्त न थे. अत: बा को तीन महीने जेल में आधे पेट भोजन पर रहना पड़ा. जब वे जेल से छूटीं तो उनका शरीर ठठरी मात्र रह गया था.

दक्षिण अफ्रीका में जेल जाने के सिवा कदाचित् वहाँ के किसी सार्वजनिक काम में भाग नहीं लिया किंतु भारत आने के बाद बापू ने जितने भी काम उठाए, उन सबमें उन्होंने एक अनुभवी सैनिक की भाँति हाथ बँटाया. चंपारन के सत्याग्रह के समय बा भी तिहरवा ग्राम में रहकर गाँवों में घूमती और दवा वितरण करती रहीं. उनके इस काम में निलहे गोरों को राजनीति की बू आई. उन्होंने बा की अनुपस्थिति में उनकी झोपड़ी जलवा दी. बा की उस झोपड़ी में बच्चे पढ़ते थे. अपनी यह चटशाला एक दिन के लिए भी बंद करना उन्हें पसंद न था अत: उन्होंने सारी रात जागकर घास का एक दूसरा झोपड़ा खड़ा किया. इसी प्रकार खेड़ा सत्याग्रह के समय बा स्त्रियों में घूम-घूमकर उन्हें उत्साहित करती रही.

1922 में जब बापू गिरफ्तार किए गए और उन्हें छह साल की सजा हुई उस समय उन्होंने जो वक्तव्य दिया वह उन्हें वीरांगना के रूप में प्रतिष्ठित करता है. उन्होंने गांधी जी के गिरफ्तारी के विरोध में विदेशी कपड़ों के त्याग के लिए लोगों का आह्वान किया. बापू का संदेश सुनाने नौजवानों की तरह गुजरात के गाँवों में घूमती फिरीं. 1930 में दांडी कूच और धरासणा के धावे के दिनों में बापू के जेल जाने पर बा एक प्रकार से बापू के अभाव की पूर्ति करती रहीं. वे पुलिस के अत्याचारों से पीड़ित जनता की सहायता करती, धैर्य बँधाती फिरीं. 1932 और 1933 का अधिकांश समय उनका जेल में ही बीता.

1939 में राजकोट के ठाकुर साहब ने प्रजा को कतिपय अधिकार देना स्वीकार किया था किंतु बाद में मुकर गए. जनता ने इसके विरुद्ध अपना विरोध प्रकट करने के लिये सत्याग्रह करने का निश्चय किया. बा ने जब यह सुना तो उन्हें लगा कि राजकोट उनका अपना घर है. वहाँ होने वाले सत्याग्रह में भाग लेना उनका कर्तव्य है. उन्होंने इसके लिये बापू की अनुमति प्राप्त की और वे राजकोट पहुँचते ही सविनय अवज्ञा के अभियोग में नजरबंद कर ली गई. पहले उन्हें एक एकांत सूनसान में बसे गाँव में रखा गया जहाँ का वातावरण उनके तनिक भी अनुकूल न था. जनता ने आंदोलन किया कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें चिकित्सा की सुविधा से दूर रखना अमानुषिक है. फलत: वे राजकोट से 10-15 मील दूर एक राजमहल में रखी गयीं. बा के जाने के कुछ समय बाद बापू ने भी सत्याग्रह में भाग लेने का निश्चय किया और वहाँ पहुँचकर उपवास आरंभ किया. जब बा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने एक समय ही भोजन करने का निश्चय किया. बापू के उपवास के समय वे सदैव ही ऐसा करती थीं.

दो तीन दिन बाद ही राजकोट सरकार ने यह भुलावा देकर कि वे बापू से मिलना चाहें तो जा सकती हैं, उन्हें बापू के पास भेज दिया. किंतु जब शाम को कोई उन्हें नजरबंदी के स्थान पर वापस ले जाने नहीं आया तब पता चला कि इस छलावे से उन्हें रिहा किया गया है. बापू को यह सह्य न था. उन्होंने बा को एक बजे रात को जेल वापस भेजा. राजकोट सरकार की हिम्मत न हुई कि वह सारी रात उन्हें सड़क पर रहने दे. वे वापस राजमहल ले जाई गयीं और उसके बाद दूसरे दिन वे बाकायदा रिहा की गयीं.

9 अगस्त 1942 को बापू आदि के गिरफ्तार हो जाने पर बा ने, शिवाजी पार्क (बंबई) में, जहाँ स्वयं बापू भाषण देने वाले थे, सभा में भाषण करने का निश्चय किया किंतु पार्क के द्वार पर पहुँचने पर गिरफ्तार कर ली गई. दो दिन बाद वे पूना के आगा खाँ महल में भेज दी गई. बापू गिरफ्तार कर पहले ही वहाँ भेजे जा चुके थे. उस समय वे अस्वस्थ थीं. 15 अगस्त को जब एकाएक महादेव देसाई ने महाप्रयाण किया तो वे बार बार यही कहती रहीं महादेव क्यों गया; मैं क्यों नहीं? बाद में महादेव देसाई का चितास्थान उनके लिए शंकर-महादेव का मंदिर सा बन गया. वे नित्य वहाँ जाती, समाधि की प्रदक्षिणा कर उसे नमस्कार करतीं. वे उसपर दीप भी जलवातीं. गिरफ्तारी की रात को उनका जो स्वास्थ्य बिगड़ा वह फिर संतोषजनक रूप से सुधरा नहीं और अंततोगत्वा उन्होंने 22 फ़रवरी 1944 को अपना शारीर त्याग दिया.

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