06 July 2022

दुनिया का पहला गणतंत्र वैशाली

आज जब आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है तो हजारो साल पुरानी समृद्ध विरासत को भी स्मरण किया जाना चाहिए क्योकि भारत केवल 75 साल पुराना राष्ट्र नहीं है. भारत लोकतंत्र की जननी है और पूरी दुनिया में जहां भी गणतांत्रिक व्यवस्था लागू दिखती है, वो प्राचीन भारत की देन है. 
प्राचीन भारत में सबसे पहला गणराज्य वैशाली था. बिहार के इस प्रांत को वैशाली गणराज्य के नाम से जाना जाता था. ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक ईसा से लगभग छठी सदी पहले वैशाली में ही दुनिया का पहला गणतंत्र यानी ‘गणराज्य’ कायम हुआ था. 

आज जो लोकतांत्रिक देशों में अपर हाउस और लोअर हाउस की प्रणाली है, जहां सांसद जनता के लिए पॉलिसी बनाते हैं. ये प्रणाली भी वैशाली गणराज्य में था. वहां उस समय छोटी-छोटी समितियां थी, जो गणराज्य के अंतर्गत आने वाली जनता के लिए नियमों और नीतियों को बनाते थे. अमेरिका में होने वाले चुनावों के वक़्त हमें प्रेसिडेंशियल डिबेट्स की खबर देखने को मिलती है. ऐसी ही बहसें आज से लगभग 2500 साल पहले वैशाली गणराज्य में अपने नए गणनायक को चुनने के लिए होती थीं. कई इतिहासकारों का ये भी मानना है कि अमेरिका में जब लोकतंत्र का ताना-बाना बुना जा रहा था, तब वहां के पॉलिसी-मेकर्स के दिमाग में वैशाली के गणतंत्र का मॉड्यूल चल रहा था.

वैशाली नगर वज्जी महाजनपद की राजधानी थी. महाजनपद का मतलब प्राचीन भारत के शक्तिशाली राज्यों में से एक होता था. ये क्षेत्र प्रभावशाली था अपने गणतंत्रिक मूल्यों की वजह से. वैशाली में गणतंत्र की स्थापना लिच्छवियों ने की थी. लिच्छवियों का संबंध एक हिमालयन ट्राइब लिच्छ से था. वैशाली गणराज्य को लिच्छवियों ने खड़ा किया था और ये इसलिए किया गया था, ताकि बाहरी आक्रमणकारियों से बचा जा सके और अगर कोई बाहर से आक्रमण करे तो गणराज्य को जनता का पूरा समर्थन हासिल हो.

गणराज्य बनने के बाद ठीक ऐसा ही हुआ था. कलांतर में वैशाली एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा. इस प्रकार एक नई प्रणाली ईजाद हुई, जिसे हम गणतंत्र कहते हैं. इसे दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपनाया है और मॉडर्न ग्लोबल वर्ल्ड का बेस्ट सिस्टम माना गया. आज इंडिया हो या यूरोप का कोई देश या फिर अमेरिका, सब इसी सिस्टम को मानते हैं, जिसकी शुरुआत आज से 2600 साल पहले भारत के वैशाली में हुई थी. हिमालय की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर लिच्‍छवियों के संघ द्वारा गणतंत्र सिस्टम की शुरूआत की गई थी, जिसका नाम 'वैशाली गणराज्य' था. वैशाली को कुछ इतिहासकार गणतंत्र का 'मक्का' भी कहते हैं.

आज के गणराज्य में और वैशाली के गणराज्य में बहुत से फर्क हैं, पर मेन आइडिया वहीं से लिया गया था. वैशाली गणराज्य को नियंत्रित करने के लिए कुछ समितियां बनाई गई थीं, जो हर तरह के कामों पर बारीकी से नजर रखती थीं. ये समितियां समय के हिसाब से गणराज्य की नितियों में तब्दीली लाती थीं, जो काम आज के समय में किसी लोकतांत्रिक देशों में जनता के द्वारा चुने गए सांसद करते हैं. सभी चुने गए जन प्रतिनिधियों का अभिषेक करने के लिए अभिषेक पुष्कर्णी  तालाब था जिसके जल से सभी प्रतिनिधियों का अभिषेक किया जाता था.

वैशाली का इतिहास: ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वैशाली में ही विश्व का सबसे पहला गणतंत्र यानि "रिपब्लिक" कायम किया गया था. भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलम्बियों के लिए वैशाली एक पवित्र स्थल है. भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ, यह उनकी कर्म भूमि भी थी. महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्त्वपूर्ण था. अतिमहत्त्वपूर्ण बौद्ध एवं जैन स्थल होने के अलावा यह जगह पौराणिक हिन्दू तीर्थ एवं पाटलीपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है. मशहूर राजनर्तकी और नगरवधू आम्रपाली वैशाली की ही रहने वाली थी जो अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध  थी.

रामधारी सिंह दिनकर वैशाली के बारे में लिखते है:
वैशाली जन का प्रतिपालक, विश्व का आदि विधाता,
जिसे ढूंढता विश्व आज, उस प्रजातंत्र की माता.
रुको एक क्षण पथिक, इस मिट्टी पे शीश नवाओ,
राज सिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ.

वैशाली का नामाकरण महाभारत काल एक राजा ईक्ष्वाकु वंशीय राजा विशाल के नाम पर हुआ है. विष्णु पुराण में इस क्षेत्र पर राज करने वाले 34 राजाओं का उल्लेख है, जिसमें प्रथम नमनदेष्टि तथा अंतिम सुमति या प्रमाति थे. राजा सुमति अयोध्या नरेश भगवान राम के पिता राजा दशरथ के समकालीन थे. ईसा पूर्व सातवीं सदी के उत्तरी और मध्य भारत में विकसित हुए 16 महाजनपदों में वैशाली का स्थान अति महत्त्वपूर्ण था. नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जियों तथा लिच्‍छवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की गयी थी. लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाने लगा और गणतंत्र की स्थापना हुई. विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्‍थान वैशाली ही है. आज वैश्विक स्‍तर पर जिस लोकशाही को अपनाया जा रहा है, वह यहाँ के लिच्छवी शासकों की ही देन है. 

प्राचीन वैशाली नगर अति समृद्ध एवं सुरक्षित नगर था जो एक-दूसरे से कुछ अन्तर पर बनी हुई तीन दीवारों से घिरा था. प्राचीन ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि नगर की किलेबन्दी यथा सम्भव इन तीनों कोटि की दीवारों से की जाए ताकि शत्रु के लिए नगर के भीतर पहुँचना असम्भव हो सके. चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार पूरे नगर का घेरा 14 मील के लगभग था. मौर्य और गुप्‍त राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्‍यापार और उद्योग का प्रमुख केन्द्र था. भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अन्तिम सम्बोधन दिया था. इसकी याद में महान मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व सिंह स्‍तम्भ का निर्माण करवाया था. महात्‍मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग 100 वर्ष बाद वैशाली में दूसरे बौद्ध परिषद् का आयोजन किया गया था. इस आयोजन की याद में दो बौद्ध स्‍तूप बनवाये गये. वैशाली के समीप ही एक विशाल बौद्ध मठ है, जिसमें महात्‍मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे. भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद की पवित्र अस्थियाँ हाजीपुर (पुराना नाम - उच्चकला) के पास एक स्तूप में रखी गयी थी.

वैशाली को महान भारतीय दरबारी आम्रपाली की भूमि के रूप में भी जाना जाता है, जो कई लोक कथाओं के साथ-साथ बौद्ध साहित्य में भी दिखाई देती है. आम्रपाली बुद्ध की शिष्या बन गई थी. मनुदेव संघ के शानदार लिच्छवी कबीले के प्रसिद्ध राजा थे, जिन्होंने वैशाली में अपने नृत्य प्रदर्शन को देखने के बाद आम्रपाली के पास रहना चाहा. वैशाली को चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म स्थल का गौरव भी प्राप्त है. जैन धर्मावलम्बियों के लिए वैशाली काफी महत्त्‍वपूर्ण है. यहीं पर  जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्‍म कुंडलपुर (कुंडग्राम) में हुआ था. वज्जिकुल में जन्में भगवान महावीर यहाँ 22 वर्ष की उम्र तक रहे थे. इस तरह वैशाली हिन्दू धर्म के साथ-साथ भारत के दो अन्य महत्त्वपूर्ण धर्मों का केन्द्र था. बौद्ध तथा जैन धर्मों के अनुयायियों के अलावा ऐतिहासिक पर्यटन में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों के लिए भी वैशाली महत्त्‍वपूर्ण है. वैशाली की भूमि न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है वरन् कला और संस्‍कृति के दृष्टिकोण से भी काफी धनी है.

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