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18 October 2017

धनतेरस का महत्व, क्यों मनाते है धनतेरस?

धनतेरस हिन्दू धर्म में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध त्योहार है. कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वन्तरि का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को 'धनतेरस' या 'धनत्रयोदशी' के नाम से जाना जाता है. आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि वैद्य समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती भी कहते हैं. वे अमृत मंथन से उत्पन्न हुए थे. कहते हैं कि जन्म के समय उनके हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश था. यही कारण है कि धनतेरस के दिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए बर्तन खरीदा जाता है. इसीलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है. बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि की स्मृति में मनाया जाता है. इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन ख़रीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धन्वंतरि को अर्पित करते हैं. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है. भारत सरकार ने धनतेरस को 'राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. धनतेरस दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है. हमारे देश में सर्वाधिक धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार दीपावली का प्रारंभ धनतेरस से हो जाता है. इसी दिन से घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ कर देते हैं. दीपावली के लिए विविध वस्तुओं की ख़रीद आज की जाती है. इस दिन से कोई किसी को अपनी वस्तु उधार नहीं देता. इसके उपलक्ष्य में बाज़ारों से नए बर्तन, वस्त्र, दीपावली पूजन हेतु लक्ष्मी-गणेश, खिलौने, खील-बताशे तथा सोने-चांदी के जेवर आदि भी ख़रीदे जाते हैं.

धन्वंतरि ईसा से लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व हुए थे. वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे. उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्त्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं. उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए इस तरह सुश्रुत संहिता किसी एक का नहीं, बल्कि धन्वंतरि, दिवोदास और सुश्रुत तीनों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है. धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है. उनके जीवन के साथ अमृत का कलश जुड़ा है. वह भी सोने का कलश. अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था. उन्होंने कहा कि जरा मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था. सुश्रुत उनके रासायनिक प्रयोग के उल्लेख हैं. धन्वंतरि के संप्रदाय में सौ प्रकार की मृत्यु है. उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही निदान और चिकित्सा हैं. आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है.

धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्त्व है. शास्त्रों में इस बारे में कहा है कि जिन परिवारों में धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती. घरों में दीपावली की सजावट भी आज ही से प्रारम्भ हो जाती है. इस दिन घरों को स्वच्छ कर, लीप-पोतकर, चौक, रंगोली बना सायंकाल के समय दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है. इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना व नए बर्तन ख़रीदना शुभ माना गया है. इस दिन चांदी के बर्तन ख़रीदने से तो अत्यधिक पुण्य लाभ होता है. इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता है. पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है. यह पूजा दिन में नहीं की जाती अपितु रात्रि होते समय यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है. इस दिन यम के लिए आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता हैं इस दीप को जमदीवा अर्थात यमराज का दीपक कहा जाता है.

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