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19 November 2021

गुरू नानक जयंती

सिख धर्म के संस्थापक बाबा गुरू नानक देव की जयंती आज 19नवंबर को दुनिया भर में मनाई गई. सिख समुदाय के लिए ये दिन बहुत ही विशेष है. सिखों के प्रथम गुरु नानकदेवजी की जयंती को प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है. गुरू नानक सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) हैं. इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, गुरु नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं. गुरुनानाक देव जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गांव में कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था. तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया. ननकाना साहिब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है. गुरु नानक 20 अगस्त, 1507 को सिक्खों के प्रथम गुरु बने एंव इस पद पर 22 सितम्बर, 1539 तक रहे. गुरुनानक का व्यक्तित्व असाधारण था. उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे. उनमें विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था. उन्होंने पूरे देश की यात्रा की. लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा. उनमें सभी गुण मौजूद थे. पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे. उनकी रचना 'जपुजी' का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है.


पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में 15 अप्रैल, 1469 को एक किसान के घर गुरु नानक उत्पन्न हुए. यह स्थान लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित है. अब यह 'नानकाना साहब' कहलाता है. तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया. नानक के पिता का नाम कालू एवं माता का नाम तृप्ता था. उनके पिता खत्री जाति एवं बेदी वंश के थे. वे कृषि और साधारण व्यापार करते थे और गाँव के पटवारी भी थे. गुरु नानक देव की बाल्यावस्था गाँव में व्यतीत हुई. बाल्यावस्था से ही उनमें असाधारणता और विचित्रता थी. उनके साथी जब खेल-कूद में अपना समय व्यतीत करते तो वे नेत्र बन्द कर आत्म-चिन्तन में निमग्न हो जाते थे. इनकी इस प्रवृत्ति से उनके पिता कालू चिन्तित रहते थे. नानक को विक्षिप्त समझकर कालू ने उन्हें भैंसे चराने का काम दिया. भैंसे चराते-चराते नानक जी सो गये। भैंसें एक किसान के खेत में चली गयीं और उन्होंने उसकी फ़सल चर डाली. किसान ने इसका उलाहना दिया किन्तु जब उसका खेत देखा गया, तो सभी आश्चर्य में पड़े गये। फ़सल का एक पौधा भी नहीं चरा गया था.

सात वर्ष की आयु में वे पढ़ने के लिए गोपाल अध्यापक के पास भेजे गये. एक दिन जब वे पढ़ाई से विरक्त हो, अन्तर्मुख होकर आत्म-चिन्तन में निमग्न थे, अध्यापक ने पूछा- पढ़ क्यों नहीं रहे हो? गुरु नानक का उत्तर था- मैं सारी विद्याएँ और वेद-शास्त्र जानता हूँ. गुरु नानक देव ने कहा- मुझे तो सांसारिक पढ़ाई की अपेक्षा परमात्मा की पढ़ाई अधिक आनन्दायिनी प्रतीत होती है, यह कहकर निम्नलिखित वाणी का उच्चारण किया- मोह को जलाकर (उसे) घिसकर स्याही बनाओ, बुद्धि को ही श्रेष्ठ काग़ज़ बनाओ, प्रेम की क़लम बनाओ और चित्त को लेखक. गुरु से पूछ कर विचारपूर्वक लिखो (कि उस परमात्मा का) न तो अन्त है और न सीमा है. इस पर अध्यापक जी आश्चर्यान्वित हो गये और उन्होंने गुरु नानक को पहुँचा हुआ फ़क़ीर समझकर कहा- तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो. इसके पश्चात् गुरु नानक ने स्कूल छोड़ दिया. वे अपना अधिकांश समय मनन, ध्यानासन, ध्यान एवं सत्संग में व्यतीत करने लगे. गुरु नानक की 9 वर्ष की अवस्था में यज्ञोपवीत संस्कार हुआ. यज्ञोपवीत के अवसर पर उन्होंने पण्डित से कहा - दया कपास हो, सन्तोष सूत हो, संयम गाँठ हो, (और) सत्य उस जनेउ की पूरन हो. यही जीव के लिए (आध्यात्मिक) जनेऊ है. ऐ पाण्डे यदि इस प्रकार का जनेऊ तुम्हारे पास हो, तो मेरे गले में पहना दो, यह जनेऊ न तो टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न यह जलता है और न यह खोता ही है.

सन 1485 ई. में नानक का विवाह बटाला निवासी, मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ. उनके वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी है. 28 वर्ष की अवस्था में उनके बड़े पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। 31 वर्ष की अवस्था में उनके द्वितीय पुत्र लक्ष्मीदास अथवा लक्ष्मीचन्द उत्पन्न हुए. गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए. घोड़े के व्यापार के निमित्त दिये हुए रुपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा कि यही सच्चा व्यापार है. नवम्बर, सन् 1504 ई. में उनके बहनोई जयराम (उनकी बड़ी बहिन नानकी के पति) ने गुरु नानक को अपने पास सुल्तानपुर बुला लिया. नवम्बर, 1504 ई. से अक्टूबर 1507 ई. तक वे सुल्तानपुर में ही रहें अपने बहनोई जयराम के प्रयास से वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत ख़ाँ के यहाँ मादी रख लिये गये. उन्होंने अपना कार्य अत्यन्त ईमानदारी से पूरा किया. वहाँ की जनता तथा वहाँ के शासक दौलत ख़ाँ नानक के कार्य से बहुत सन्तुष्ट हुए. वे अपनी आय का अधिकांश भाग ग़रीबों और साधुओं को दे देते थे. कभी-कभी वे पूरी रात परमात्मा के भजन में व्यतीत कर देते थे. मरदाना तलवण्डी से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अन्त तक उनके साथ रहा. गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाता था. गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे. कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात् वन में अन्तर्धान हो गये. उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ. परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है. जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेगें, वे भी आनन्दित होगे.। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं. इस घटना के पश्चात् वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे. मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा.

गुरु नानक की पहली 'उदासी' (विचरण यात्रा) अक्तूबर , 1507 ई. में 1515 ई. तक रही. इस यात्रा में उन्होंने हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारिका, नर्मदातट, बीकानेर, पुष्कर तीर्थ, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, मुल्तान, लाहौर आदि स्थानों में भ्रमण किया. उन्होंने बहुतों का हृदय परिवर्तन किया. ठगों को साधु बनाया, वेश्याओं का अन्त:करण शुद्ध कर नाम का दान दिया, कर्मकाण्डियों को बाह्याडम्बरों से निकालकर रागात्मिकता भक्ति में लगाया, अहंकारियों का अहंकार दूर कर उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया. यात्रा से लौटकर वे दो वर्ष तक अपने माता-पिता के साथ रहे. उनकी दूसरी 'उदासी' 1517 ई. से 1518 ई. तक यानी एक वर्ष की रही. इसमें उन्होंने ऐमनाबाद, सियालकोट, सुमेर पर्वत आदि की यात्रा की और अन्त में वे करतारपुर पहुँचे. तीसरी 'उदासी' 1518 ई. से 1521 ई. तक लगभग तीन वर्ष की रही. इसमें उन्होंने रियासत बहावलपुर, साधुबेला (सिन्धु), मक्का, मदीना, बग़दाद, बल्ख बुखारा, क़ाबुल, कन्धार, ऐमानाबाद आदि स्थानों की यात्रा की. 1521 ई. में ऐमराबाद पर बाबर का आक्रमण गुरु नानक ने स्वयं अपनी आँखों से देखा था. अपनी यात्राओं को समाप्त कर वे करतारपुर में बस गये और 1521 ई. से 1539 ई. तक वहीं रहे.

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