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29 October 2021

भारत के महान वीर योद्धा पोरस जिन्होंने विश्व विजेता सिकंदर को नानी याद दिला दिया

सिकंदर (356 ईपू से 323 ईपू) मेसेडोनिया. का ग्रीक प्रशासक था. वह एलेक्ज़ेंडर तृतीय तथा एलेक्ज़ेंडर मेसेडोनियन नाम से भी जाना जाता है. सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठा था. अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला. उसकी खास दुश्मनी ईरानियों से थी. सिकंदर ने ईरान के पारसी राजा दारा को पराजित कर दिया और विश्व विजेता कहलाने लगा. यहीं से उसकी भूख बड़ गई. इतिहास में वह कुशल और यशस्वी सेनापतियों में से एक माना गया है. अपनी मृत्यु तक वह उन सभी भूमि मे से लगभग आधी भूमि जीत चुका था. उसने अपने कार्यकाल में इरान, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया तक के प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी  लेकिन भारत के महान राजा पोरस ने उसे पराजित कर दिया.

 
जब सिकंदर ईरान से आगे बड़ा तो उसका सामना भारतीय सीमा पर बसे छोटे छोटे राज्यों से हुआ. भारत की सीमा में पहुंचते ही छोटे-छोटे राजाओ को पराजित कर उनके राज्अय पर अधिकार कर लिया और आगे बढ़ने पर  भारत के गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने सिकंदर से लड़ने के बजाय उसका भव्य स्वागत किया. आम्भी ने ऐसे इसलिए किया क्योंकि उसे राजा पोरस से शत्रुता थी और दूसरी ओर उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था. गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने पोरस के खिलाफ सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की. सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस एक महान योद्ध था उसने सिकंदर की अधीनता अस्वीकार कर दी और युद्ध की तैयारी करना शुरू कर दी. पुरुवंशी महान सम्राट पोरस का साम्राज्य विशालकाय था. महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे. पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था. पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था. 

सिकंदर अपने चुने हुए 11 हजार आम्भी की सेना भारतीय और सिकंदर की सेना के यूनानी सैनिकों को लेकर झेलम पार की. राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े. पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का भयंकर रूप से संहार किया उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे. इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली. सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए. यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया. कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है. राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया. ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था.

सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था. सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया. यह डर नहीं था, बल्कि यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, कि किसी निहत्थे राजा को यूं न मारा जाए. यह सहिष्णुता पोरस के लिए भारी पड़ गई. पोरस कुछ समझ पाता तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से उठाकर भगा ले गए. सिकंदर की सेना का मनोबल भी इस युद्ध के बाद टूट गया था और उसने नए अभियान के लिए आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था. इसके बाद सिकंदर वापस अपने प्रदेश को लौटने लगा और रास्ते में ही बीमार पर गया जहाँ उसका निधन हो गया.

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