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16 November 2021

जानिए विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय नालन्दा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी को किसने जलाया

नालंदा विश्वविद्यालय: शिक्षा के मामले में आज भले ही भारत दुनिया के कई देशों से पीछे हो, लेकिन एक समय था, जब हिंदुस्तान शिक्षा का केंद्र हुआ करता था. भारत में ही दुनिया का पहला विश्वविद्यालय खुला था, जिसे नालंदा विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है. इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (450-470) ने की थी. इस विश्वविद्यालय को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी, लेकिन अब यह एक खंडहर बनकर रह चुका है, जहां दुनियाभर से लोग घूमने के लिए आते हैं. बिहार के नालंदा में स्थित इस विश्वविद्यालय में आठवीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच दुनिया के कई देशों से छात्र पढ़ने आते थे. इस विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार छात्र पढ़ते थे, जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस और तुर्की से आते थे. यहां करीब दो हजार शिक्षक पढ़ाते थे. 
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस विश्वविद्यालय में तीन सौ कमरे, सात बड़े-बड़े कक्ष और अध्ययन के लिए नौ मंजिला एक विशाल पुस्तकालय था, जिसमें तीन लाख से भी अधिक किताबें थीं. प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था, जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार थ.। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे. मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुंदर मूर्तियां स्थापित थीं, जो अब नष्ट हो चुकी हैं. नालंदा विश्वविद्यालय की दीवारें इतनी चौड़ी हैं कि इनके ऊपर ट्रक भी चलाया जा सकता है.

विक्रमशिला विश्वविद्यालय: बिहार प्रांत के भागपलुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति का शिक्षा केन्द्र रहा है. विक्रमशिला के महाविहार की स्थापना नरेश धर्मपाल (775-800ई.) ने करवायी थी. यहाँ 160 विहार तथा व्याख्यान के लिये अनेक कक्ष बने हुये थे. धर्मपाल के उत्तराधिकारी तेरहवीं शताब्दी तक इसे राजकीय संरक्षण प्रदान करते रहे. परिणामस्वरूप विक्रमशिला लगभग चार शताब्दियों से भी अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय बना रहा. विश्वविद्यालय में अध्ययन के विशेष विषय व्याकरण, तर्कशास्त्र, मीमांसा, तंत्र, विधिवाद आदि थे. आचार्यों में दीपंकर श्रीज्ञान का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है, जो इस विश्वविद्यालय के कुलपति थे. वर्तमान समय में विश्वविद्यालय के भग्नावशेष को देख कर इसके गौरवशाली अतीत और विख्याति की अनुभूति कर सकते है.

उदंतपुरी विश्वविद्यालय:  ओदंतपुरा भारत में बौद्ध महाविहार था. यह 8 वीं शताब्दी में पाला सम्राट गोपाला प्रथम द्वारा स्थापित किया गया था. इसे नालंदा विश्वविद्यालय के बाद भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन विश्वविद्यालय था और यह महाविहार भारत के मगध क्षेत्र के अंतर्गत हिरण्य प्रभात पर्वत नामक पहाड़ पर और पंचानन नदी के किनारे स्थित था. विक्रमाशिला के आचार्य श्री गंगा इस महाविहार में छात्र थे. तिब्बती रिकॉर्ड के मुताबिक ओडिंतपुरी में लगभग 12,000 छात्र थे और आधुनिक युग में, यह नालंदा जिले के मुख्यालय बिहार शरीफ में स्थित है. ,ओदांतपुरी में 500 बौद्ध भिक्षुक के रहने और खाने का इंतजाम था. राजा रामपाला के शासनकाल के दौरान, हिन्यान और महायान दोनों के हजारों भिक्षु ओडंतपुरी में रहते थे और कभी-कभी बारह हजार भिक्षु वहां एकत्र होते थे.

नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय को जलाकर नष्ट कर दिया: तुर्की शासक बख्तियार खिलजी ने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय में आग लगाकर उसे जला दिया था. उसका पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था. बिहार का वह मुगल शासक था. उस समय दिल्ली के बादशाह कुतुबुद्दीन एबक ने यूपी के मिर्जापुर की जिम्मेदारी बख्तियार खिलजी को दिया था. यूपी से बिहार और बंगाल नजदीक होने के कारन उसका नजर बिहार और बंगाल पर पड़ा और वह पुरे बिहार पर अधिकार कर लिया. एक समय बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया. उसके हकीमों ने इसका काफी उपचार किया पर कोई फायदा नहीं हुआ. तब उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से उपचार कराने की सलाह दी गई. उसने आचार्य राहुल को बुलवा लिया तथा इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी हिंदुस्तानी दवाई का सेवन नहीं करेगा. उसके बाद भी उसने कहा कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा.

अगले दिन आचार्य उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढिए ठीक हो जाएंगे. उसने पढ़ा और ठीक हो गया. खिलजी के ठीक होने के जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था. वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया और ठीक हो गया. उसको खुशी नहीं हुई उसको बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है. बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने भारत से आयुर्वेद को समाप्त करने के लिए 1199 में नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दी. वहां इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकेंं जलती रहीं. उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले. उसने इस एहसान का बदला नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय को जलाकर दिया.

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