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21 November 2021

देखिए चंद्रगुप्त मौर्य ने किस प्रकार किया मौर्य साम्राज्य की स्थापना

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरू चाणक्य की सहायता से 322 ई.पू. में धनानन्द की हत्या कर मौर्य वंश की नींव डाली थी. चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्दों के अत्याचार व घृणित शासन से मुक्‍ति दिलाई और देश को एकता के सूत्र में बाँधा और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की. चन्द्रगुप्त पिप्पलिवन के सूर्यवंशी मौर्य वंश का था. चन्द्रगुप्त के पिता पिप्पलिवन के नगर प्रमुख थे. जब वह गर्भ में ही था तब उसके पिता की मृत्यु युद्धभूमि में हो गयी थी. चंद्र गुप्त मौर्य की माता का नाम मुरा था. जब चन्द्रगुप्त 10 वर्ष के थे तो उनकी मां मुरा का भी देहांत हो गया था और तब से उनकी परवरिश एक गोपालक द्वारा किया गया था. चरावाह तथा शिकारी रूप में ही राजा-गुण होने का पता आचार्य चाणक्य ने कर लिया था तथा उसे एक हजार में खरीद लिया. तत्पश्‍चात्‌ तक्षशिला लाकर सभी विद्या में निपुण बनाया. 
जिस समय चन्द्रगुप्त राजा बना था भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत खराब थी. उसने सबसे पहले एक सेना तैयार की और सिकन्दर के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया. 317 ई.पू. तक उसने सम्पूर्ण सिन्ध और पंजाब प्रदेशों पर अधिकार कर लिया. अब चन्द्रगुप्त मौर्य सिन्ध तथा पंजाब का एकक्षत्र शासक हो गया. पंजाब और सिन्ध विजय के बाद चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने धनानन्द का नाश करने हेतु मगध पर आक्रमण कर दिया. युद्ध में धनानन्द मारा गया अब चन्द्रगुप्त भारत के एक विशाल साम्राज्य मगध का शासक बन गया. सिकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस उसका उत्तराधिकारी बना. वह सिकन्दर द्वारा जीता हुआ भू-भाग प्राप्त करने के लिए उत्सुक था. इस उद्देश्य से 305 ई. पू. उसने भारत पर पुनः चढ़ाई की. चन्द्रगुप्त ने पश्‍चिमोत्तर भारत के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर समस्त भू-भाग को अधिकृत कर विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की. सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया. उसने मेगस्थनीज को राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में नियुक्‍त किया.

चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्‍चिम भारत में सौराष्ट्र तक प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यक्ष शासन के अन्तर्गत शामिल किया. दक्षिण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी कर्नाटक तक विजय प्राप्त की. चन्द्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य में काबुल, हेरात, कन्धार, बलूचिस्तान, पंजाब, गंगा-यमुना का मैदान, बिहार, बंगाल, गुजरात था तथा विन्ध्य और कश्मीर के भू-भाग सम्मिलित थे, लेकिन चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना साम्राज्य उत्तर-पश्‍चिम में ईरान से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक विस्तृत किया था. अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त मौर्य जैन मुनि भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला चला गया था और उपवास द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना शरीर त्याग दिया.

चन्द्रगुप्त मौर्य के निधन के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार उसका उत्तराधिकारी था. यह 298 ई. पू. मगध साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा. बिन्दुसार के समय में भारत का पश्‍चिम एशिया से व्यापारिक सम्बन्ध अच्छा था. बिन्दुसार के दरबार में सीरिया के राजा एंतियोकस ने डायमाइकस नामक राजदूत भेजा था. प्रशासन के क्षेत्र में बिन्दुसार ने अपने पिता का ही अनुसरण किया. दिव्यादान के अनुसार अशोक अवन्ति का उपराजा था. बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली मन्त्रिपरिषद्‍ थी जिसका प्रधान खल्लाटक था. बिन्दुसार ने 25 वर्षों तक राज्य किया अन्ततः 273 ई.पू. उसकी मृत्यु हो गयी.

बिन्दुसार के निधन के बाद उसके पुत्र सम्राट अशोक 273 ई.पू. में मगध की राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष लगे. इस कारण राज्याभिषेक चार साल बाद 269 ई.पू. में हुआ था. अभिलेखों में उसे देवाना प्रिय एवं राजा आदि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है.  मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अखण्ड भारत पर राज्य किया है तथा उनका मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था. सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था. यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है. चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं. सम्राट अशोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट है. सम्राट अशोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है - ‘सम्राटों का सम्राट’, और यह स्थान भारत में केवल सम्राट अशोक को मिला है.

अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया था. कलिंग युद्ध में एक लाख 50 हजार व्यक्‍ति बन्दी बनाकर निर्वासित कर दिए गये, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी. सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा. कलिंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान परिवर्तन कर दिया. उसका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्वेलित हो गया. उसने युद्ध क्रियाओं को सदा के लिए बन्द कर देने की प्रतिज्ञा की. यहाँ से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ. उसने बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया. अशोक ने शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार किया. अशोक को अपने शासन के चौदहवें वर्ष में निगोथ नामक भिक्षु द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई थी. तत्पश्‍चात्‌ मोगाली पुत्र निस्स के प्रभाव से वह पूर्णतः बौद्ध हो गया था. अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में उन्होंने सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की. तदुपरान्त अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की थी तथा लुम्बिनी ग्राम को करमुक्‍त घोषित कर दिया था.

मगध साम्राज्य के महान मौर्य सम्राट अशोक की मृत्यु लगभग 236 ई.पू. में हुई थी. मौर्य सम्राट की मृत्यु के उपरान्त करीबन दो सदियों से चले आ रहे शक्‍तिशाली मौर्य साम्राज्य का विघटन होने लगा. अशोक के उपरान्त अगले पाँच दशक तक उनके निर्बल उत्तराधिकारी शासन संचालित करते रहे. मौर्य सम्राज्य का अन्तिम सम्राट वृहद्रथ था जिसके शासन काल में  भारत पर विदेशी आक्रमण बढते जा रहे थे. सम्राट बृहद्रथ ने उनका मुकाबला करने से मना कर दिया. तब प्रजा और सेना में विद्रोह होने लगा. उस समय पुष्यमित्र शुंग मगध का सेनापति था. एक दिन राष्ट्र और सेना के बारे में अप्रिय वचन कहने के कारण क्रोधित होकर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या कर दी. इस कार्य के पश्चात सेना और प्रजा ने पुष्यमित्र शुंग का साथ दिया. इसके बाद मौर्य सम्राज्य समाप्त हो गया और पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को सम्राट घोषित किया और एक नये राजवंश शुंग सम्राज्य की स्थापना की.

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