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25 November 2021

तीनों कृषि कानून वापस लेने के बाद भी किसान MSP को लेकर आन्दोलन पर अडिग है, ये MSP क्या है? समझिए जिसपर हो रहा है इतना हंगामा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रकाश पर्व के दिन तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया लेकिन किसानों ने कहा है कि उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जबतक सरकार MSP की गारंटी नहीं देती. कड़ाके की ठंड और भूख-प्यास की परवाह किए बिना देश का अन्नदाता कहा जाने वाला किसान पिछले एस साल से भी ज्यादा दिनों से सड़कों पर है. अपने घर की सुख-सुविधाएं छोड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर हजारों किसान दिल्ली के बॉडर्र की सड़कों पर डेरा जमाए हुए बैठे हैं. किसानों के आंदोलन में एक चीज बार-बार निकल कर सामने आ रही है और वह है फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी. आज बहुत से लोग वाकिफ नहीं होंगे कि ये एमएसपी क्या होता है या फिर ये कैसे तय किया जाता है, इससे किसानों को क्या फायदा है. यहां हम आपको तफ्सील के साथ बता रहे हैं कि ये एमएसपी क्या है और इसे तय करने का फार्मूला क्या है.
न्यूनतम समर्थन मूल्य: MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम सर्मथन मूल्य होता है. MSP सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की गारंटी होती है. राशन सिस्टम के तहत जरूरतमंद लोगों को अनाज मुहैया कराने के लिए इस एमएसपी पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है. बाजार में उस फसल के रेट भले ही कितने ही कम क्यों न हो, सरकार उसे तय एमएसपी पर ही खरीदेगी. इससे यह फायदा होता है कि किसानों को अपनी फसल की एक तय कीमत के बारे में पता चल जाता है कि उसकी फसल के दाम कितने चल रहे हैं. हालांकि मंडी में उसी फसल के दाम ऊपर या नीचे हो सकते हैं. यह किसान की इच्छा पर निर्भर है कि वह फसल को सरकार को बेचे एमएसपी पर बेचे या फिर व्यापारी को आपसी सहमति से तय कीमत पर.

फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य CACP यानी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग तय करता है. CACP तकरीबन सभी फसलों के लिए दाम तय करता है. हालांकि, गन्ने का समर्थन मूल्य गन्ना आयोग तय करता है. आयोग समय के साथ खेती की लागत के आधार पर फसलों की कम से कम कीमत तय करके अपने सुझाव सरकार के पास भेजता है. सरकार इन सुझाव पर स्टडी करने के बाद एमएसपी की घोषणा करती है. रबी और खरीफ की कुछ अनाज वाली फसलों के लिए एमएसपी तय किया जाता है. एमएसपी का गणना हर साल सीजन की फसल आने से पहले तय की जाती है.

फिलहाल 23 फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है. इनमें अनाज की 7, दलहन की 5, तिलहन की 7 और 4 कमर्शियल फसलों को शामिल किया गया है. धान, गेहूं, मक्का, जौ, बाजरा, चना, तुअर, मूंग, उड़द, मसूर, सरसों, सोयाबीन, सूरजमूखी, गन्ना, कपास, जूट आदि की फसलों के दाम सरकार तय करती है. एमएसपी तय करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर बाजार में फसल का दाम गिरता है, तब भी यह तसल्ली रहती है कि सरकार को वह फसल बेचने पर एक तय कीमत तो जरूर मिलेगी.

एमएसपी तय करने का फार्मूला: केंद्र में जब मोदी सरकार आई थी तब उसने फसल की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी तय करने के नए फार्मूले अपनाने की पहल की थी. कृषि सुधारों के लिए 2004 में स्वामीनाथन आयोग बना था. आयोग ने एमएसपी तय करने के कई फार्मूले सुझाए थे. डा. एमएस स्‍वामीनाथन समिति ने यह सिफारिश की थी कि एमएसपी औसत उत्‍पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को लागू किया औ 2018-19 के बजट में उत्‍पादन लागत के कम-से-कम डेढ़ गुना एमएसपी करने की घोषणा की.

हर साल बुआई से पहले फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय हो जाता है. हर खरीफ और रबी सीजन के लिए एमएसपी तय होता है. बहुत से किसान तो एमएसपी देखकर ही फसल बुआई करते हैं. एमएसपी पर सरकार विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से किसानों से अनाज खरीदती है. MSP पर खरीदकर सरकार अनाजों का बफर स्टॉक बनाती है. सरकारी खरीद के बाद FCI और नैफेड के पास यह अनाज जमा होता है. इस अनाज का इस्तेमाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिए होता है. अगर बाजार में किसी अनाज में तेजी आती है तो सरकार अपने बफर स्टॉक में से अनाज खुले बाजार में निकालकर कीमतों को काबू करती है.

केरल सरकार ने सब्जियों के लिए आधार मूल्‍य तय कर दिया है. केरल सब्जियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. सब्जियों का यह न्यूनतम या आधार मूल्य उत्पादन लागत  से 20 फीसदी अधिक होगा. एमएसपी के दायरे में फिलहाल 16 तरह की सब्जियों को लाया गया है. केरल की तर्ज पर ही हरियाणा सरकार ने भी सब्जियों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाने की पहल की है. इसके लिए सुझाव मांगे जा रहे हैं. मंडियों का सर्वे किया जा रहा है.

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