01 December 2021

मगध पर शुंगवंश, कण्ववंश एंव सातवाहन वंश की स्थापना

मगध साम्राज्य के महान मौर्य सम्राट अशोक की मृत्यु लगभग 236 ई.पू. में हुई थी. मौर्य सम्राट की मृत्यु के उपरान्त करीबन दो सदियों से चले आ रहे शक्‍तिशाली मौर्य साम्राज्य का विघटन होने लगा. अशोक के उपरान्त अगले पाँच दशक तक उनके निर्बल उत्तराधिकारी शासन संचालित करते रहे. मौर्य सम्राज्य का अन्तिम सम्राट वृहद्रथ था जिसके शासन काल में भारत पर विदेशी आक्रमण बढते जा रहे थे. सम्राट बृहद्रथ ने उनका मुकाबला करने से मना कर दिया. तब प्रजा और सेना में विद्रोह होने लगा. उस समय पुष्यमित्र शुंग मगध का सेनापति था. एक दिन राष्ट्र और सेना के बारे में अप्रिय वचन कहने के कारण क्रोधित होकर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या कर दी. इस कार्य के पश्चात सेना और प्रजा ने पुष्यमित्र शुंग का साथ दिया. इसके बाद मौर्य सम्राज्य समाप्त हो गया और पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को सम्राट घोषित किया और एक नये राजवंश शुंग सम्राज्य की स्थापना की.
शुंग ब्राह्मण थे. बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के फ़लस्वरुप अशोक द्वारा यज्ञों पर रोक लगा दिये जाने के बाद उन्होंने पुरोहित का कर्म त्यागकर सैनिक वृति को अपना लिया था. दीर्घकाल तक मौर्यों की सेना का सेनापति होने के कारण पुष्यमित्र इसी रूप में विख्यात था तथा राजा बन जाने के बाद भी उसने अपनी यह उपाधि बनाये रखी. शुंग काल में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान हुआ था मनुस्मृति के वर्तमान स्वरुप की रचना इसी युग में हुई थी. परवर्ती मौर्यों के निर्बल शासन में मगध का सरकारी प्रशासन तन्त्र शिथिल पड़ गया था एवं देश को आन्तरिक एवं बाह्य संकटों का खतरा था. ऐसी विकट स्थिति में पुष्यमित्र शुंग ने मगध साम्राज्य पर अपना अधिकार जमाकर जहाँ एक ओर यवनों के आक्रमण से देश की रक्षा की और देश में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना कर वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार किया जो अशोक के शासनकाल में अपेक्षित हो गये थे. इसी कारण इसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल कहलाता है. 

पुष्यमित्र शुंग ने यवनों को पराजित कर मध्य देश से निकालकर सिन्धु के किनारे तक खदेङ दिया था. यह पुष्यमित्र के काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी. पुष्यमित्र शुंग के समय मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी. पुष्यमित्र प्राचीन मौर्य साम्राज्य के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रख सकने में सफ़ल रहा. पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक तथा पश्‍चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में मगध तक फ़ैला हुआ था. साम्राज्य के विभिन्न भागों में राजकुमार या राजकुल के लोगो को राज्यपाल नियुक्‍त करने की परम्परा चलती रही. पुष्यमित्र ने अपने पुत्रों को साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सह -शाशक नियुक्‍त कर रखा था और उसका पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा था. पुष्यमित्र की मृत्यु  के पश्‍चात उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का राजा हुआ. उसने कुल 8 वर्षों तक शासन कीया. अग्निमित्र के बाद वसुज्येष्ठ, वसुमित्र, भद्रक, पुलिंदक, घोष, वज्रमित्र, भागवत और देवभूति क्रमशः राजा हुए. शुंग वंश के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या करके उसके सचिव वसुदेव ने 75 ई.पू. में कर दी जिसके बाद शुंगवंश समाप्त हो गया और वसुदेव ने कण्ववंश की नींंव डाली

कण्व वंश ने 75ई.पू. से 60ई.पू. तक शासन किया. वसुदेव पाटलिपुत्र के कण्व वंश का प्रवर्तक था. वैदिक धर्म एवं संस्कृति संरक्षण की जो परम्परा शुंगो ने प्रारम्भ की थी उसे कण्व वंश ने जारी रखा. इस वंश का अन्तिम सम्राट सुशमी कण्य अत्यन्त अयोग्य और दुर्बल था जिसके कारन इसके समय में मगध क्षेत्र संकुचित होने लगा. कण्व वंश का साम्राज्य बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित हो गया और अनेक प्रान्तों ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया. अन्त में सुशमी को सातवाहन वंश के संस्थापक सिमुक ने पदच्युत कर दिया और  कण्ववंश को समाप्त कर सातवाहन वंश की स्थापना की. इस प्रकार कण्ववंश के चार राजाओं ने 75ई.पू.से 30ई.पू.तक शासन किया.

सिमुक ने 60ई.पू. में सातवाहन वंश की स्थापना करने के बाद प्रतिष्ठांन (आन्ध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले)में अपनी राजधानी स्थापित की. सातवाहन राजाओं ने 300 वर्षों तक शासन किया. सातवाहन वंश में राजा सिमुक , शातकर्णी, गौतमीपुत्रशातकर्णी, वशिस्थिपुत्र, पुलुमावी शातकर्णी, यज्ञश्री शातकारणी प्रमुख राजा थे. सातवाहन राजाओं ने 300 वर्षों तक शासन किया. सातवाहन साम्राज्य की राजकीय भाषा प्राकृत वा लिपि ब्राम्ही थी. इस समय अमरावती कला का विकास हुआ था. सातवाहन राजवंश में मातृसत्तात्मक प्रचलन में था अर्थात राजाओं के नाम उनकी माता के नाम पर (गौतमीपुत्र सातकारणी) रखने की प्रथा थी लेकिन सातवाहन राजकुल पितृसत्तात्मक था क्योंकि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी वंशानुगत ही होता था. सातवाहन राजवंश के द्वारा अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण किया गया था. सातवाहन राजाओं ने चांदी, तांबे, सीसे, पोटीन और कांसे के सिक्कों का प्रचलन किया. ब्राम्हणों को भूमि दान करने की प्रथा का आरंभ सर्वप्रथम सातवाहन राजाओं ने किया था.

सातवाहन राजवंश के सबसे प्रतापी वा महान राजा शालीवाहन थे. उनके शासनकाल में यह राजवंश अपनी चरम सीमा पर था. राजा शालीवाहन की मां गौतमी प्रजापति थी. इसलिए राजा शालिवाहन को गौतमी पुत्र शातकर्णी भी कहा जाता था. राजा शालीवाहन का बचपन समस्याओं से भरा हुआ था परंतु राजा शालीवाहन को ईश्वर की घोर तपस्या के फलस्वरूप अनेकों वरदान प्राप्त हुए, जिससे राजा सलीवाहन ने राजपाठ और युद्ध के क्षेत्र में महारथ हासिल की इसलिए इन्हे दक्षिणपथ का स्वामी एवं वर्दिया (वरदान प्राप्त करने वाला) कहा जाता है. लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया और 25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया बल्कि शक, यवन तथा पहलाव शासको को पराजित कर एक विशाल साम्राज्य की भी स्थापना की. लेकिन तीसरी शताब्दी में सातवाहन वंश की शक्ति बहुत कमजोर हो गया था और लगभग 225 ई. में यह राजवंश समाप्त हो गया.

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