22 December 2021

मुहम्मद गौरी का भारत पर आक्रमण



शिहाबुद्दीन उर्फ़ मुइज़ुद्दीन मुहम्मद ग़ौरी 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान सेनापति था जो 1202 ई. में ग़ौरी साम्राज्य का सुल्तान बना. 
ग़ोरी राजवंश की नीव अला-उद-दीन जहानसोज़ ने रखी और सन् 1161 में उसके देहांत के बाद उसका पुत्र सैफ़-उद-दीन ग़ोरी सिंहासन पर बैठा. अपने मरने से पहले अला-उद-दीन जहानसोज़ ने अपने दो भतीजों - शहाबुद्दीन (मुहम्मद ग़ोरी) और ग़ियास-उद-दीन - को क़ैद कर रखा था लेकिन सैफ़-उद-दीन ने उन्हें रिहा कर दिया. उस समय ग़ोरी वंश ग़ज़नवियों और सलजूक़ों की अधीनता से निकलने के प्रयास में था. उन्होंने ग़ज़नवियों को तो 1148-1149 में ही ख़त्म कर दिया था लेकिन सलजूक़ों का तब भी ज़ोर था और उन्होंने कुछ काल के लिए ग़ोर प्रान्त पर सीधा क़ब्ज़ा कर लिए था, हालांकि उसके बाद उसे ग़ोरियों को वापस कर दिया था. सलजूक़ों ने जब इस क्षेत्र पर नियंत्रण किया था जो उन्होंने सैफ़-उद-दीन की पत्नी के ज़ेवर भी ले लिए थे. गद्दी ग्रहण करने के बाद एक दिन सैफ़-उद-दीन ने किसी स्थानीय सरदार को यह ज़ेवर पहने देख लिया और तैश में आकर उसे मार डाला. जब मृतक के भाई को कुछ महीनो बाद मौक़ा मिला तो उसने सैफ़-उद-दीन को बदले में भाला मरकर मार डाला. इस तरह सैफ़-उद-दीन का शासनकाल केवल एक वर्ष के आसपास ही रहा. ग़ियास-उद-दीन नया शासक बना और उसके छोटे भाई शहाबुद्दीन ने उसका राज्य विस्तार करने में उसकी बहुत वफ़ादारी से मदद करी. शहाबुद्दीन उर्फ़ मुहम्मद ग़ोरी ने पहले ग़ज़ना पर क़ब्ज़ा किया, फिर 1175 में मुल्तान और ऊच पर और फिर 1186 में लाहौर पर. जब उसका भाई 1202 में मरा तो शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी सुलतान बन गया.

उस समय दिल्ली पर पृथ्वीराज के नाना तोमरवंश के अनंगदेव का  आधिपत्य था. उनका कोई वारिस नहीं था. अपने नवासे के युद्ध कौशल और राज-काज से प्रभावित होकर अनंगदेव ने पृथ्वीराज को दिल्ली का साम्राज्य सौंप दिया. उसके बाद पृथ्वीराज ने आस-पास के छोटे राज्यों को फतह कह अपने अधीन कर लिया. 1182 में तब के जेजाकभूक्ति के राजा परमर्दिदेव को हराकर अपने साम्राज्य के अधीन कर लिया. आज का बुंदेलखंड ही तब जेजाकभूक्ति के नाम से जाना जाता था. इस युद्ध में कन्नौज के राजा जयचंद ने परमर्दिदेव का साथ दिया था लिहाजा पृथ्वीराज ने कन्नौज पर भी धावा बोला. अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने गुजरात के चालुक्य शासक भीम प्रथम को भी परास्त किया.

जिन वर्षों में भारतवर्ष के अंदर पृथ्वीराज अपने अजेय अभियान पर थे उसी दौरान मोहम्मद गोरी अफगानिस्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों को जीतने में जुटा था. 1186 में लाहौर जीतकर गोरी ने सियालकोट के किले पर कब्जा कर लिया. जाहिर है उसकी नजर दिल्ली पर थी. लेकिन पृथ्वीराज चौहान जैसे प्रतापी राजा से सीधे टकराने की हिम्मत वो नहीं कर पा रहा था. लिहाजा उसने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी. इसी दौरान पृथ्वी राज से खार खाए बैठे जयचंद ने गोरी को दिल्ली पर हमले के लिए उकसाया और हर तरह से मदद का भरोसा दिया. शह पाकर गोरी ने 1 लाख 20 हजार की विशाल सेना के साथ 1191 में दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया. परमवीर पृथ्वीराज को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने गोरी को रोकने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ कूच कर दिया. हरियाणा के तराइन में दोनों विशाल सेनाओं के बीच महासंग्राम हुआ. गोरी की सेना में घुड़सवार थे तो पृथ्वीराज की सेना में हजारों हाथी थे. गोरी की ज्यादातर सेना मारी गई. बचे खुचे सैनिक युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे. जख्मी गोरी को पृथ्वीराज की सेना ने अपने कब्जे में ले लिया. माफ़ी माँगी तो छोड़ दिया गोरी को

पृथ्वीराज के हत्थे चढ़ा मोहम्मद गोरी काफी शातिर था. उसे पता था कि भारत के शूरवीर दया और करुणा के भाव से भी भरे होते हैं. लिहाजा उसने माफी की मांग के साथ कई तरह की कसमें खाईं दिल्ली पर आइंदा नजर उठाकर भी नहीं देखने का स्वांग किया और यहीं हो गई पृथ्वीराज से भूल. हालांकि उनके दरबारियों ने मोहम्मद गोरी को रिहा नहीं करने के लिए उन्हें बहुत समझाया लेकिन दया की भीख मांगने वाले को दंड देना उन्हें अनुचित लगा और उन्होंने उसे रिहा कर दिया.

तराइन के दूसरे युद्ध ने बदल दिया हिन्दुस्तान का इतिहास हमेशा के लिए. पर युद्ध की चर्चा से पहले पृथ्वी राज चौहान के अनोखे प्रेम प्रसंग की चर्चा जरूरी है. कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता बला की खूबसूरत थीं. कहते हैं उनके महल में एक बार एक चित्रकार आया जिसके पास दूसरी तस्वीरों के अलावा पृथ्वीराज चौहान की भी तस्वीर थी. पृथ्वी राज की तस्वीर को देखते ही संयोगिता का दिल उनपर आ गया. मन ही मन संयोगिता ने पृथ्वी राज को पति के रूप में स्वीकार भी कर लिया. उसी चित्रकार ने संयोगिता का भी बेहतरीन चित्र बनाया और उसे ले जाकर पृथ्वीराज चौहान को दे दिया. दिलकश संयोगिता की तस्वीर देखकर पृथ्वीराज चौहान अपनी सुध-बुध खो बैठे. उन्होंने हर हाल में संयोगिता को अपना बनाने का संकल्प लिया.

इसी दौरान जयचंद ने संयोगिता के स्वयंवर का ऐलान किया और दूर देश के राजाओं को भी निमंत्रण भेजा. पर पृथ्वीराज को जानबूझ कर नहीं बुलाया. अलबत्ता उसने महल के बाहर एक दरबान के रूप में पृथ्वी राज का बुत बनाकर खड़ा कर दिया. ताकि उनकी बेइज्जती हो. पृथ्वीराज को सारी कहानी पता चल गई थी. इसलिए वो बगैर किसी को बताए स्वयंवर में पहुंच गए थे. तय कार्यक्रम के मुताबिक संयोगिता वरमाला लेकर आगे बढ़ी लेकिन किसी राजा के गले में न डालकर पृथ्वीराज के बुत के गले में डालने की कोशिश की. पृथ्वीराज अपने ही बुत के पीछे खड़े थे इस तरह वरमाला उनके गले में पड़ गई. ये देख जयचंद आग बबूला हो उठा लेकिन इससे पहले कि वो कुछ करता पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर वहां से निकल लिए.

जयचंद पृथ्वीराज से पहले से ही नफरत करता था. स्वयंवर की घटना के बाद उसने पृथ्वीराज को नेस्तनाबूद करने की मुहिम में जुट गया. उधर तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज से बुरी तरह शिकस्त खा चुका मोहम्मद गोरी अपनी हार और रुसवाई का बदला लेने को मचल रहा था. 1192 में पहले से भी बड़ी सेना लेकर उसने दोबारा कूच किया. उसी तराइन की युद्ध भूमि में एक बार फिर भीषण कोहराम मचा. इस बार भी प्रतापी पृथ्वीराज और उनकी बहादुर सेना गोरी के सैनिकों पर भारी पड़ने लगी.

कहते हैं कि इसी बीच जयचंद ने मोहम्मद गोरी को एक तरकीब सुझाई. उसने कहा कि हिन्दुस्तान की ये सदियों पुरानी परंपरा रही है कि सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले यहां के सैनिक दुश्मनों पर हथियार नहीं उठाते. लिहाजा गोरी की सेना पृथ्वीराज पर तब आक्रमण करे जब उनके सैनिक सो रहे हों. मोहम्मद गोरी को जयचंद की ये अमानवीय सलाह पसंद आ गई और उसने ऐसा ही किया. सोए सैनिकों पर अचानक हमला बोल दिया गया. जबतक पृथ्वीराज और उनके सैनिक हथियार उठाते तबतक बहुत रक्त बह चुका था. आखिरकार छल और अमानवीय करतूत के बूते गोरी युद्ध जीतने में कामयाब रहा. उसने पृथ्वीराज को बंदी बना लिया.

बंदी बनाने के बाद मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज को अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और वहां उन्हें काफी यातनाएं दी और गर्म सलाखों से उनकी दोनों आंखें फोड़ दी. चंद बरदाई पृथ्वीराज के बाल सखा थे और वे उनसे मिलने अफगानिस्तान गए. वहां पहुंचकर बरदाई ने मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के शब्दभेदी वाण चलाने की कला के बारे में बताया. जब गोरी को यकीन नहीं हुआ तो चंद बरदाई ने अपनी योजना के मुताबिक पृथ्वीराज को तीर-कमान देकर अपनी आंखों से ये कला देखने की बात कही. मूर्ख मोहम्मद गोरी बरदाई की बात मान गया और उसने ऐसा ही किया. लक्ष्य तय कर दिया गया. लेकिन इसी बीच बरदाई पृथ्वीराज के पास गए और उनके कान में एक कविता पढ़ी

चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण
ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान !!

ये सुनकर पृथ्वीराज समझ गए कि अब उन्हें क्या करना है. उन्होंने इस कविता के आधार पर प्रत्यंचा चढ़ाया और चला दिया तीर. वो तीर सीधे मोहम्मद गोरी के सीने में लगी और वो वहीं ढेर हो गया. इसके बाद चंद बरदाई को पता था कि क्या होने वाला है लिहाजा उन्होंने कटार घोंपकर पृथ्वी राज की वीरगति दे दी और उसी कटार से अपनी भी आहूति दे दी.

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