11 December 2021

भारत पर सेन राजवंश की स्थापना


सेन राजवंश भारत का एक राजवंश का नाम था, जिसने 12वीं शताब्दी के मध्य में बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. सेन राजवंश ने बंगाल पर 160 वर्राषो तक राज किया. अपने चरमोत्कर्ष के समय भारतीय महाद्वीप का पूर्वोत्तर क्षेत्र इस साम्राज्य के अन्तर्गत आता था. इस वंश का मूलस्थान कर्णाटक था. पालवंश के राजा
 देवपाल के समय से पाल सम्राटों ने कर्णाटक के कुछ साहसी वीरों को अधिकारी पदों पर नियुक्त किया. कालांतर में ये अधिकारी, जो दक्षिण से आए थे, शासक बन गए और स्वयं को राजपुत्र कहने लगे.

राजपुत्रों के इस परिवार में बंगाल के सेन राजवंश का प्रथम शासक सामन्त सेन उत्पन्न हुआ था. सामन्तसेन ने दक्षिण के एक शासक, संभवतः द्रविड़ देश के राजेन्द्र चोल, को परास्त कर अपनी प्रतिष्ठा में वृद्धि की. सामन्तसेन का पौत्र विजयसेन ही अपने परिवार की प्रतिष्ठा को स्थापित करने वाला था. उसने वंग के वर्मन शासन का अन्त किया, विक्रमपुर में अपनी राजधानी स्थापित की, पालवंश के मदनपाल को अपदस्थ किया और गौड़ पर अधिकार कर लिया, नान्यदेव को हराकर मिथिला पर अधिकार किया, गहड़वालों के विरुद्ध गंगा के मार्ग से जलसेना द्वारा आक्रमण किया, आसाम पर आक्रमण किया, उड़ीसा पर धावा बोला और कलिंग के शासक अनंत वर्मन चोड़गंग के पुत्र राघव को परास्त किया. उसने वारेंद्री में एक प्रद्युम्नेश्वर शिव का मंदिर बनवाया. 

विजयसेन का पुत्र एवं उत्तराधिकारी वल्लाल सेन विद्वान तथा समाज सुधारक था. बल्लालसेन के बेटे और उत्तराधिकारी लक्ष्मण सेन ने काशी के गहड़वाल और आसाम पर सफल आक्रमण किए, किंतु सन् 1202 के आस-पास इसे पश्चिम और उत्तर बंगाल मुहम्मद खलजी को समर्पित करने पड़े. कुछ वर्ष तक यह वंग में राज्य करता रहा. सेन राजवंश का अंतिम राजा केशव सेन था जिन्होंने 225 से 1230 ई. तक राज किया. 

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