25 February 2022

देखिए क्या है नाटो जिसके कारन रूस और यूक्रेन में जंग छिड़ चूका है

रूस और यूक्रेन के बीच जंग के बाद हालात तीसरे विश्वयुद्ध की ओर जा रहा है लेकिन इसके साथ ही एक शब्द फ़िज़ा में गूंज रहा है, नाटो. यूक्रेन को लेकर रूस की तल्ख़ी भी इसी नाटो की वजह से है. रूस हर हाल में यूक्रेन को नाटो दूर रखना चाहता है, जबकि अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाए. बस यही खींचतान हालात को जंग के मैदान तक ले आई. सवाल यही उठता है कि आखिर ये नाटो (NATO) है क्या आखिर अमेरिका यूक्रेन को नाटो में क्यों शामिल करना चाहता है और रूस इसका क्यों विरोध करता है?

दरअसल नाटो एक सैन्य संगठन है, जिसके तहत 30 देशों की सेना मिलकर एक साथ एक दूसरे की मदद करती है. ये नाटो 4 अप्रैल 1949 को संगठन के तौर पर पहली बार वजूद में आया था. नाटो असल में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (NORTH ATLANTIC TREATY ORGANISATION) है जिसे हिन्दी में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन भी कहा जाता है, जिसे छोटा करके नाटो पुकारा जाता है. असल में 1945 में दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद यूरोप क़रीब क़रीब कंगाल हो गया था. जिसकी वजह से वहां आम लोगों की हालत बेहद ख़राब हो गई थी. लोग बेहद ग़रीबी में ज़िंदगी बसर करने को मजबूर थे. लेकिन सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की दो सबसे ताक़तवर सैन्य शक्ति यानी महाशक्ति बनकर उभरे थे. हर लिहाज से संपन्न सोवियत संघ इस मौके का फायदा उठाना चाहता था. सोवियत संघ ने तुर्की और ग्रीस पर कब्ज़ा करके पूरी दुनिया के कारोबार पर अपना नियंत्रण बना लेना चाहता था. सोवियत संघ अगर तुर्की पर कब्जा कर लेता तो काला सागर पर उसका एक छत्र राज होता. उसका एक दूसरा फायदा ये होता कि काला सागर से लगे दूसरे देशों पर भी वो अपने साम्यवाद का प्रभाव फैला सकता था. इसके अलावा सोवियत संघ का ग्रीस पर कब्ज़ा होने की सूरत में भूमध्य सागर से होने वाले सारे कारोबार पर उसका दबदबा हो जाता. 

ऐसे में यूरोप के कई दूसरे देशों को सोवियत संघ से ख़तरा महसूस होने लगा था तो उस वक़्त फ्रांस, ब्रिटेन, नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्ज़मबर्ग देशों ने मिलकर एक समझौता किया और एक संधि की. ये समझौता बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में हुई थी. NATO का मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में बनाया गया क्योंकि यहीं इस संगठन की स्थापना हुई थी. इस समझौते में तय पाया गया था कि किसी भी देश पर अगर हमला होता है तो इस संगठन से जुड़े सभी देश एक दूसरे की सामूहिक रूप से सैनिक सहायता करेंगे. इस समझौते में ये भी तय हो गया था कि ये सहायता सिर्फ सैनिक स्तर पर ही नहीं होगी बल्कि सामाजिक और आर्थिक तौर पर भी ये मदद जारी रहेगी.

एक तरह USSR की ताक़त बढ़ रही थी, और उससे डरने वाले देशों की संख्या भी बढ़ने लगी थी. मगर दूसरी तरफ अमेरिका भी अपनी ताक़त बढ़ाने में लगा हुआ था ताकि वो सोवियत संघ की हैसियत को चुनौती दे सके. लिहाजा अमेरिका ने सोवियत संघ की घेराबंदी करने की गरज से संयुक्त राष्ट्र संघ यानी UNO के चार्टर के अनुच्छेद 15 के तहत नाटो के सामने एक प्रस्ताव रखा. अमेरिका के साथ ये संधि 1949 को हुई जिसमें 12 देश शामिल हुए. ये देश थे अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, बेल्जियम, आइसलैंड, लक्ज़मबर्ग, फ्रांस, कनाडा, इटली और डेनमार्क. बाद में इस ट्रीटी यानी नाटो का विस्तार हुआ तो इसमें स्पेन, पश्चिम जर्मनी, तुर्की, ग्रीस भी इसके सदस्य बन गए. ये सब कुछ हुआ शीत यूद्ध से पहले. बाद में शीत युद्ध के बाद हंगरी, पोलैंड और चेकगणराज्य भी इसका हिस्सा हो गए. इसके बाद साल 2004 में सात और देशों ने भी नाटो की सदस्यता हासिल कर ली जिससे इस संगठन में सदस्य देशों की संख्या बढ़कर 30 पहुँच गई.

रूस नहीं चाहता नाटो में शामिल हो यूक्रेन:
यूक्रेन के नाटो में शामिल होने को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है. हालांकि, यूक्रेन ने नाटो में शामिल होने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं किया है. यदि यूक्रेन नाटो में शामिल होता है तो मौजूदा स्थिति के अनुसार नाटो की सेनाएं यूक्रेन की सीमाओं पर स्थायी मौजूदगी हो जाएगी. वहीं, रूस नहीं चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो. एस्टोनिया और लातविया नाटो के सदस्य हैं. ये दोनों देश पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे. यूक्रेन के नाटो का हिस्सा बनने की सूरत में रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर सकता है. ऐसे में रूस नहीं चाहता है कि नाटो का विस्तार हो. रूस चाहता है कि 1997 के बाद जो भी देश नाटो में शामिल हुए हैं, वहां से सैन्य संगठन अपनी सेनाओं और सैन्य उपकरणों को हटा ले. यदि ऐसा हुआ तो इसके दायरे में नाटो के करीब आधे देश आ जाएंगे.

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