15 March 2022

भारत पर खिलजी वंश का शासन

खिलजी वंश मध्यकालीन भारत का एक राजवंश था. इसने दिल्ली की सत्ता पर 1290-1320 इस्वी तक राज किया. दिल्ली की मुस्लिम सल्तनत में दूसरा शासक परिवार था, हालांकि ख़िलजी क़बीला लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में बसा हुआ था, लेकिन अपने पूर्ववर्ती गुलाम वंश की तरह यह राजवंश भी मूलत: तुर्किस्तान का था. ख़लजी वंश के पहले सुल्तान जलालुद्दीन फ़िरोज़ ख़लजी, गुलाम वंश के अंतिम कमज़ोर बादशाह क्यूमर्श के पतन के बाद एक कुलीन गुट के सहयोग से गद्दी पर बैठे. जलालुद्दीन ख़िलजी ने ख़िलजी वंश की स्थापना की थी. ख़िलजी वंश ने 1290 से 1320 ई. तक राज्य किया.

जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी (1290-1296 ई.) 'ख़िलजी वंश' का संस्थापक था. इसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में शुरू किया था. अपनी योग्यता के बल पर इसने 'सर-ए-जहाँदार/शाही अंगरक्षक' का पद प्राप्त किया तथा बाद में समाना का सूबेदार बना. कैकुबाद ने इसे 'आरिज-ए-मुमालिक' का पद दिया और 'शाइस्ता ख़ाँ' की उपाधि के साथ सिंहासन पर बिठाया. इसने दिल्ली के बजाय किलोखरी के मध्य में राज्याभिषेक करवाया. जलालुद्दीन ने अपने राज्याभिषेक के एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया। उसने अपने पुत्रों को ख़ानख़ाना, अर्कली ख़ाँ, एवं क़द्र ख़ाँ की उपाधि प्रदान की. जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने अपने अल्प शासन काल में कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं. इन उपलब्धियों में उसने अगस्त, 1290 में कड़ामानिकपुर के सूबेदार मलिक छज्जू, जिसने ‘सुल्तान मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण कर अपने नाम के सिक्के चलवाये एवं खुतबा पढ़ा, के विद्रोह को दबाया. इस अवसर पर कड़ामानिकपुर की सूबेदारी उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी को दी. 

उसका 1291 ई. में रणथंभौर का अभियान असफल रहा. 1292 ई. में मंडौर एवं झाईन के क़िलों को जीतने में जलालुद्दीन को सफलता मिली. दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में उसने ठगों का दमन किया. 1292 ई. में ही मंगोल आक्रमणकारी हलाकू का पौत्र अब्दुल्ला लगभग डेढ़ लाख सिपाहियों के साथ पंजाब पर आक्रमण कर सुनाम पतक पहुँच गया, परन्तु अलाउद्दीन ने मंगोलों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की और अन्त में दोनों के बीच सन्धि हुई. मंगोल वापस जाने के लिए तेयार हो गये. परन्तु चंगेज़ ख़ाँ के नाती उलगू ने अपने लगभग 400 मंगोल समर्थकों के साथ इस्लाम धर्म ग्रहण कर भारत में रहने का निर्णय लिया. कालान्तर में जलालुद्दीन ने उलगू के साथ ही अपनी पुत्री का विवाह किया और साथ ही रहने के लिए दिल्ली के समीप 'मुगरलपुर' नाम की बस्ती बसाई गई. बाद में उन्हें ही ‘नवीन मुसलमान’ के नाम से जाना गया.

जलालुद्दीन ने ईरान के धार्मिक पाकीर सीदी मौला को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था. जलालुद्दीन के शासन काल में ही उसकी भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासक बनने से पूर्व ही 1292 ई. में अपने चाचा की स्वीकृति के बाद भिलसा एवं देवगिरि में लूट-मार का काम किया. उस समय देवगिरि को लूटना मुस्लिमों का दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण था. इन दोनों स्थानों पर लूट-मार से अलाउद्दीन को अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई. जलालुद्दीन ख़िलजी की हत्या इसके भतिजे एवं दामाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने भाई अलमास वेग की सहायता से 1296 ई० को कड़ामानिकपुर(इलाहाबाद) में की, जिसे बाद में 'उलूग ख़ाँ' की उपाधि से विभूषित किया गया. इस प्रकार अलाउद्दीन ख़िलजी ने चाचा की हत्या कर दिल्ली के तख्त पर 22 अक्टूबर 1296 को बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक करवाया. जलालुद्दीन ख़िलजी का शासन उदार निरंकुशता पर आधारित था. अपनी उदार नीति के कारण जलालुद्दीन ने कहा था, “मै एक वृद्ध मुसलमान हूँ और मुसलमान का रक्त बहाना मेरी आदत नहीं है.” अमीर खुसरो और इमामी दोनों ने जलालुद्दीन ख़िलजी को भाग्यवादी व्यक्ति” कहा है.

स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी ने वृत्ताकार 'अलाई दरवाजा' अथवा 'कुश्क-ए-शिकार' का निर्माण करवाया. उसके द्वारा बनाया गया 'अलाई दरवाजा' प्रारम्भिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है. इसने सीरी के किले, हजार खम्भा महल का निर्माण किया. राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाईयों का सफलता पूर्वक सामना करते हुए अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारम्भ किया. अपनी प्रारम्भिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने 'सिकन्दर द्वितीय' (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया. उसने विश्व-विजय एवं एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार को अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल 'अलाउल मुल्क' के समझाने पर त्याग दिया. यद्यपि अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए ‘यामिन-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी. उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया. उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना. अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी.

अपने चाचा को मारकर दिल्ली की गद्दी में बैठने के बावजूद, उसे 2 सालों तक कुछ विद्रोहीयों का सामना करना पड़ा. इस समस्या का सामना खिलजी ने पूरी ताकत के साथ किया. 1296 से 1308 के बीच मंगोल लगातार दिल्ली पर अपना कब्ज़ा करने के लिए, बार बार अलग अलग शासकों द्वारा हमला करते रहे. अलाउद्दीन ने जालंधर (1296), किली (1299), अमरोहा (1305) एवं रवि (1306) की लड़ाई में मंगोलियों के खिलाफ सफलता प्राप्त की. बहुत सारे मंगोल दिल्ली के आस पास ही बस गए और इस्लाम धर्म को अपना लिया. इन्हें नए मुस्लमान कहा गया. खिलजी को उन पर विश्वास नहीं था, वो इसे मंगोलियों की एक साजिश का हिस्सा मानता था. अपने साम्राज्य को बचाने के लिए खिलजी ने 1298 में एक दिन उन सभी मंगोलियों जो लगभग 30 हजार के तादाद में थे, मार डाला. जिसके बाद उन सभी के पत्नी और बच्चों को अपना गुलाम बना लिया.

1299 में खिलजी को पहली बड़ी जीत गुजरात में मिली. यहाँ के राजा ने अपने 2 बड़े जनरल उलुघ खान एवं नुसरत खान को अलाउद्दीन के समस्त प्रकट किया. यहाँ मलिक कुफुर खिलजी के मुख्य वफादार जनरल बन गए. खिलजी ने 1303 में रंथाम्बोर के राजपुताना किले में पहली बार हमला किया, जिसमे वो असफल रहा. खिलजी ने यहाँ दूसरी बार हमला किया, जिसमें उनका सामना पृथ्वीराज चौहान के वंशज के राजा राना हमीर देव से हुआ. राना हमीर बहादुरी से लड़ते हुए युद्ध में मारे गए, जिसके बाद रंथाम्बोर में खिलजी का राज्य हो गया. 

1303 में वारंगल में खिलजी ने अपनी सेना भेजी, लेकिन काकतीय शासक से उनकी सेना हार गई. 1303 में खिलजी ने चित्तोर में हमला किया था. वहां रावल रतन सिंह का राज्य था, जिनकी पत्नी पद्मावती थी. पद्मावती को पाने की चाह में खिलजी ने वहां हमला किया था, जिसमें उन्हें विजय तो मिली लेकिन रानी पद्मावती ने जौहर कर लिया था.  1306 में खिलजी ने बड़े राज्य बंग्लाना में हमला किया. जहाँ राय करण का शासन था. यहाँ खिलजी को सफलता मिली और राय कारण की बेटी को दिल्ली लाकर उसका विवाह खिलजी ने अपने बड़े बेटे से किया. 1308 में खिलजी के जनरल मलिक कमालुद्दीन ने मेवाड़ के सिवाना किले में हमला किया. लेकिन खिलजी की सेना मेवाड़ की सेना से हार गई. खिलजी की सेना को दूसरी बार में सफलता मिली.

1307 में खिलजी ने अपने वफादार काफूर को देवगिरी में राजा से कर लेने के लिए भेजा. 1308 में खिलजी ने मंगोल ने राज्य अफगानिस्तान में अपने मुख्य घाजी मलिक के साथ अन्य आदमी कंधार, घजनी और काबुल को भेजा. घाज़ी ने मंगोलों को ऐसा कुचला की वे फिर भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. 1310 में खिलजी ने होयसल सामराज्य, को कृष्णा नदी के दक्षिण में स्थित था, में बड़ी आसानी से सफलता प्राप्त कर ली. वहां के शासक वीरा बल्लाला ने बिना युद्ध के आत्मसमर्पण कर दिया और वार्षिक कर देने को राजी हो गए.

1311 में मेबार इलाके में मलिक काफूर के कहने पर अलाउद्दीन की सेना ने छापा मारा, लेकिन वहां के तमिल शासक विक्रम पंड्या के सामने उन्हें हार का सामना करना पड़ा. हालांकि काफूर भारी धन और सल्तनत लूटने में कामयाब रहे. उत्तर भारतीय राज्य प्रत्यक्ष सुल्तान शाही के नियम के तहत नियंत्रित किये गए, वहीं दक्षिण भारत में सभी प्रदेश प्रतिवर्ष भारी करों का भुगतान किया करते थे, जिससे खिलजी के पास अपार पैसा हो गया था. खिलजी ने कृषि उपज पर 50% कर माफ़ कर दिया, जिससे किसानों पर बोझ कम हो गया और वे कर के रूप में अपनी जमीन किसी को देने के लिए बाध्य नहीं रहे. काफूर ने जब दक्षिण भारत के हिस्सों में विजय प्राप्त की, तब वहां उसने मस्जिद बनवाई. ये अलाउद्दीन के बढे हुए सामराज्य को बतलाता था, जो उत्तर भारत के हिमालय से दक्षिण के आदम पुल तक फैला हुआ था.

खिलजी ने मूल्य नियंत्रण नीति लागु की, जिसके तहत अनाज, कपड़े, दवाई, पशु, घोड़े, आदि निर्धारित मूल्य पर ही बेचे जा सकते थे. मूल रूप से सभी वस्तुओं का मूल्य कम ही था, जो दिल्ली के बाजारों में बेचीं जाती थी. इसका सबसे अधिक फायदा नागरिकों और सैनिकों को होता था. जनवरी 1316 में 66 साल की उम्र में खिलजी की मृत्यु हो गई थी. वैसे यह माना जाता है कि उनके लेफ्टिनेंट मलिक नायब ने उनकी हत्या की थी. उनकी कब्र और मदरसे दिल्ली के महरौली में क़ुतुब काम्प्लेक्स के पीछे है.

अलाउद्दीन ख़िलजी ने मलिक काफ़ूर के कहने पर अपने पुत्र 'ख़िज़्र ख़ाँ' को उत्तराधिकारी न बना कर अपने 5-6 वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया. अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद मलिक काफ़ूर ने शिहाबद्दीन को सुल्तान बना कर सारा अधिकार अपने हाथों में सुरक्षित कर लिया. लगभग 35 दिन के सत्ता उपभोग के बाद काफ़ूर की हत्या अलाउद्दीन के तीसरे पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने करवा दी. काफ़ूर की हत्या के बाद वह स्वयं सुल्तान का संरक्षक बन गया और कालान्तर में उसने शिहाबुद्दीन को अंधा करवा कर क़ैद करवा दिया.

कुतुबुद्दीन मुुुबारक खिलजी ने सन 1316 ई० से 1320 ई० तक दिल्ली में शासन किया. इसके एक विश्वास-पात्र वजीर खुुुसरो खां ने इसकी हत्या 15अप्रैल,1320ई०को करके सिन्हासन पर कब्जा किया. गद्दी पर बैठने के बाद ही उसने देवगिरि के राजा हरपाल देव पर चढ़ाई की और युद्ध में विजई हुआ. बाद में इस क्रूूर शासक ने हरपाल देव को बंदी बनाकर उनकी खाल उधड़वा दी. अपने शासन काल में उसने गुजरात के विद्रोह का भी दमन किया था. अपनी इन विजयों के कारण ही उसका दिमाग फिर गया. वह अपना समय सुरा तथा सुन्दरियों में बिताने लगा. वह हिन्दू धर्म का परिवर्तित मुसलमान था एवं कहा कि इस्लाम खतरे में है. उसकी इन विजयों के अतिरिक्त अन्य किसी भी विजय का वर्णन नहीं मिलता है. क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी ने अपने सैनिकों को छः माह का अग्रिम वेतन दिया था. विद्धानों एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छीनी गयी जागीरें उन्हें वापस कर दीं. अलाउद्दीन ख़िलजी की कठोर दण्ड व्यवस्था एवं बाज़ार नियंत्रण आदि व्यवस्था को उसने समाप्त कर दिया था. क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी को नग्न स्त्री-पुरुषों की संगत पसन्द थी. अपनी इसी संगत के कारण कभी-कभी वह राज्य दरबार में स्त्री का वस्त्र पहन कर आ जाता था. वह कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था. उसने ‘अल इमाम’, ‘उल इमाम’ एवं ‘ख़िलाफ़़त-उल्लाह’ की उपाधियाँ धारण की थीं. उसने ख़िलाफ़़त के प्रति भक्ति को हटाकर अपने को ‘इस्लाम धर्म का सर्वोच्च प्रधान’ और ‘स्वर्ण तथा पृथ्वी के अधिपति का 'ख़लीफ़ा घोषित किया था. साथ ही उसने ‘अलवसिक विल्लाह’ की धर्म की प्रधान उपाधि भी धारण की थी. मुबारक के वज़ीर खुसरो खां ने 15 अप्रैल 1320 को उसकी हत्या कर दी.

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