30 March 2022

दिल्ली पर सैयद वंश का शासन

सैयद वंश दिल्ली सल्तनत का चतुर्थ वंश था जिसका कार्यकाल 1414 से 1451ईस्वी तक रहा. तुग़लक़ वंश के बाद दिल्ली पर इस वंश की स्थापना हुई. 
यह परिवार सैयद अथवा मुहम्मद के वंशज माने जाता है. तैमूर के लगातार आक्रमणों के कारण दिल्ली सल्तनत का कन्द्रीय नेतृत्व पूरी तरह से हतास हो चुका था और उसे 1398 तक लूट लिया गया था. इसके बाद उथल-पुथल भरे समय में, जब कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं थी, सैयदों ने दिल्ली में अपनी शक्ति का विस्तार किया. इस वंश के विभिन्न चार शासकों ने 37 वर्षों तक दिल्ली सल्तनत का नेतृत्व किया. इस वंश की स्थापना ख़िज्र खाँ ने की जिन्हें तैमूर ने मुल्तान (पंजाब क्षेत्र) का राज्यपाल नियुक्त किया था1 खिज़्र खान ने 28 मई 1414 को दिल्ली की सत्ता दौलत खान लोदी से छीनकर सैयद वंश की स्थापना की. लेकिन वो सुल्तान की पदवी प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो पाये और पहले तैम्मूर के तथा उनकी मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी शाहरुख मीर्ज़ा (तैमूर के नाती) के अधीन तैमूरी राजवंश के रयत-ई-अला (जागीरदार) ही रहे. ख़िज्र खान की मृत्यु के बाद 20 मई 1421 को उनके पुत्र मुबारक खान ने सत्ता अपने हाथ में ली और अपने आप को अपने सिक्कों में मुइज़्ज़ुद्दीन मुबारक शाह के रूप में लिखवाया. सैय्यद खिज्र खाँ ने मृत्यु से पूर्व अपने पुत्र मुबारक शाह को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था. मुबारक शाह ने शाह की उपाधि धारण करके अमीरों व सरदारों की सर्व-सम्मति से सुल्तान का पद ग्रहण किया.

अपने शासन काल में उसने भटिण्डा व दोआब क्षेत्र के विद्रोहों का दमन किया मगर वह नमक की पहाड़ियों के खोखर लोगों को दण्ड नहीं दे सका. उल्लेखनीय है कि वह पहला सुल्तान था जिसके काल में दिल्ली के दरबार में दो हिन्दू अमीरों का उल्लेख मिलता है. अपने तेरह वर्ष के शासन काल में उसने मेवात, कटेहर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सैनिक कार्यवाहियां की लेकिन यह किसी ठोस और वास्तविक उपलब्धि को पाने में असफल रहा. उसके आश्रय में प्रसिद्ध इतिहासकार याहिया-बिन-अहमद सरहिन्दी ने ‘तारीखे-मुबारकशाही‘ में लिखा है कि- “मुबारक शाह का काल अशान्ति एवं विद्रोह का काल था, इसलिए उसका पूर्ण समय विद्रोहों को दबाने में ही व्यतीत हो गया.” उसमें धर्मान्धता का नाम भी नहीं था. उसने दिल्ली के क्षत्रियों को उदारता पूर्ण संरक्षण दिया और ग्वालियर के हिन्दुओं को अत्याचार से बचाया. यमुना के तट पर उसने ‘मुबारक बाद‘ नामक एक नगर बसाया, जिसकी जामा-मस्जिद बहुत सुन्दर थी. 19 फरवरी, 1434 ई. को उसके एक सरदार सरवर-उल-मुल्क ने एक षड्यन्त्र द्वारा मुबारक शाह की हत्या करवा दी.

मुबारक शाह की मृत्यु के बाद मुहम्मद शाह ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया. उनका शासनकाल 1434 से 1445 ईस्वी तक रहा. मुहम्मदशाह के काल में दिल्ली सल्तनत में अराजकता व कुव्यवस्था व्याप्त रही. जौनपुर के शासक ने सल्तनत के कई जिले अपने अधीन कर लिए. मालवा के शासक महमूद खिलजी ने तो दिल्ली पर ही आक्रमण करने का साहस कर लिया. लाहौर और मुल्तान के शासक बहलोल खाँ लोदी ने सुल्तान की सहायता की. सुल्तान ने उसे ‘खान-ए-खाना’ की उपाधि दी और. साथ ही उसे अपना पुत्र कह कर भी पुकारा. सुल्तान की स्थिति बहुत दुर्बल हो गई. यहां तक कि दिल्ली से बीस ‘करोह’ की परिधि में अमीर उसके विरोधी हो गए. 1444 ई. में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र अलाउद्दीन ‘आलमशाह‘ के नाम से गद्दी पर बैठा .

आलम शाह अपने देश का सबसे अयोग्य शासक साबित हुआ. आलम शाह के काल में दिल्ली सल्तनत, दिल्ली शहर और कुछ. आस-पास के गाँवों तक रह सीमित हो गई. बहलोल लोदी (लाहौर का गवर्नर) के भय के कारण आलम शाह अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर बदायूँ ले गया और यहाँ वह भोग-विलास में डूब गया. उसके मन्त्री हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को आमन्त्रित किया, जिसने कि दिल्ली पर अधिकार कर लिया. कुछ समय तक बहलोल खाँ लोदी ने आलम शाह के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया. 1451 ई. में आलमशाह ने बहलोल लोदी को दिल्ली का राज्य पूर्णतः सौंप दिया और स्वयं बदायूं की जागीर में रहने लगा. वहीं पर 1476 ई में उसकी मृत्यु हुई. इस प्रकार 37 वर्ष के अकुशल शासन के बाद सैय्यद वंश का अन्त हुआ और लोदी वंश की नींव पड़ी.

No comments:

Post a Comment