26 March 2022

दिल्ली पर तुगलक वंश का शासन

तुग़लक़ वंश  दिल्ली सल्तनत का एक राजवंश था जिसने सन् 1320 से लेकर सन् 1414 तक दिल्ली की सत्ता पर राज किया. तुग़लक़ वंश की स्थापना  गयासुद्दीन तुगलक के द्वारा किया गया था, जिसने 1412 तक राज किया. इस वंश में तीन योग्य शासक हुए. ग़यासुद्दीन (1320-25), उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-51) और उसका उत्तराधिकारी फ़िरोज शाह तुग़लक़ (1351-87). इनमें से पहले दो शासकों का अधिकार क़रीब-क़रीब पूरे देश पर था. फ़िरोज का साम्राज्य उनसे छोटा अवश्य था, पर फिर भी अलाउद्दीन ख़िलजी के साम्राज्य से छोटा नहीं था. फ़िरोज की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत का विघटन हो गया और उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया. यद्यपि तुग़लक़ 1412 तक शासन करत रहे.

गयासुद्दीन तुगलक: गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक राजवंश की स्थापना की और 1320 से 1325 तक दिल्ली की सल्तनत पर शासन किया. मंगोलो के विरुद्ध गयासुद्दीन की नीति कठोर थी. उसने मंगोल कैदियों को कठोर रूप से दंडित किया. उसने अमरोहा की लड़ाई (1305ई) में मंगोलों को पराजित किया. जब गयासुद्दीन् मुल्तान से दिल्ली चला गया, तो सूमरो कबीले के लोगो ने विद्रोह कर दिया और थट्टा पर कब्ज़ा कर लिया. तुगलक ने ताजुद्दीन मलिक को मुल्तान का, ख्वाज़ा खातिर को भक्कर का गवर्नर नियुक्त किया. उसने सेहावाँ का कार्यभार मलिक अली शेर के हाथो मे सौप दिया. 1323 में, गयासुद्दीन ने अपने बेटे ज़ौना खान (बाद में मुहम्मद बिन तुगलक) को काकतीय राजधानी वारंगल के अभियान पर भेजा. वारंगल के आने वाले घेराबंदी के परिणामस्वरूप वारंगल, और काकतीय वंश का अंत हुआ. उसने तुगलकाबाद किले का निर्माण भी शुरू किया.

खिलजी वंश के शासनकाल में ग़यासुद्दीन को दिपालपुर का गवर्नर नियुक्त किया गया था. अलाउद्दीन खिलजी के काल में उसने मुल्तान,उच्छ तथा सिन्ध को चगतई ख़ान के आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान की. 1321 ई. में ग़यासुद्दीन ने वारंगल पर आक्रमण किया, किन्तु वहाँ के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव को पराजित करने में वह असफल रहा. 1323 ई. में द्वितीय अभियान के अन्तर्गत ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने शाहज़ादे 'जौना ख़ाँ' (मुहम्मद बिन तुग़लक़) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुन:स्थापना के लिए भेजा. जौना ख़ाँ ने वारंगल के काकतीय एवं मदुरा के पाण्ड्य राज्यों को विजित कर दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया. इस प्रकार सर्वप्रथम ग़यासुद्दीन के समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया. इन राज्यों में सर्वप्रथम वारंगल था. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ पूर्णतः साम्राज्यवादी था. इसने अलाउद्दीन ख़िलजी की दक्षिण नीति त्यागकर दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया.

ग़यासुद्दीन जब बंगाल में था, तभी सूचना मिली कि, ज़ौना ख़ाँ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) निज़ामुद्दीन औलिया का शिष्य बन गया है और वह उसे राजा होने की भविष्यवाणी कर रहा है. निज़ामुद्दीन औलिया को ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने धमकी दी तो, औलिया ने उत्तर दिया कि, "हुनूज दिल्ली दूर अस्त, अर्थात दिल्ली अभी बहुत दूर है. हिन्दू जनता के प्रति ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की नीति कठोर थी. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ संगीत का घोर विरोधी था. बरनी के अनुसार अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन स्थापित करने के लिये जहाँ रक्तपात व अत्याचार की नीति अपनाई, वहीं ग़यासुद्दीन ने चार वर्षों में ही उसे बिना किसी कठोरता के संभव बनाया. जनता की सुविधा के लिए अपने शासन काल में ग़यासुद्दीन ने क़िलों, पुलों और नहरों का निर्माण कराया. सल्तनत काल में डाक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का श्रेय ग़यासुद्दीन तुग़लक़ को ही जाता है. शारीरिक यातना द्वारा राजकीय ऋण वसूली को उसने प्रतिबंधित किया.

ग़यासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था. बाकी मुस्लिम शासकों जैसा ये भी शैतान था जिसने बेकसूर हिंदूओ और बौद्धो का कत्ल-ए-आम किया था. इस्लाम धर्म में उसकी गहरी आस्था और उसके सिद्धान्तों का वह सावधानीपूर्वक पालन करता था. उसने मुसलमान जनता पर इस्लाम के नियमों का पालन करने के लिए दबाव डाला. वह अपने साम्राज्य के बहुसंख्यकों के धर्म के प्रति शत्रुभाव तो नहीं रखता था किंतु उनके प्रति दयावान् भी नहीं था. जब ग़यासुद्दीन तुग़लक़ बंगाल अभियान से लौट रहा था, तब लौटते समय तुग़लक़ाबाद से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अफ़ग़ानपुर में एक महल (जिसे उसके लड़के जूना ख़ाँ के निर्देश पर अहमद अयाज ने लकड़ियों से निर्मित करवाया था) में सुल्तान ग़यासुद्दीन के प्रवेश करते ही वह महल गिर गया, जिसमें दबकर मार्च, 1325 ई. को उसकी मुत्यृ हो गयी. इब्न बतूता के अनुसार गयासुद्दीन की हत्या उसके पुत्र ज़ौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) द्वारा रचे गए षड्यंत्र के माध्यम से की गई. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ का मक़बरा तुग़लक़ाबाद में स्थित है.

मुहम्मद बिन तुग़लक़: मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र 'जूना ख़ाँ', मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ई.) के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा. इसका मूल नाम 'उलूग ख़ाँ' था. राजामुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुग़लक़ (जौना या जूना ख़ाँ) को दुनिया का ख़ान कहा गया है. सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था. अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे 'स्वप्नशील', 'पागल' एवं 'रक्त-पिपासु' कहा गया है. बरनी, सरहिन्दी, निज़ामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है. मोहम्मद बिन तुगलक ने ही बटियागढ़ में प्राणियों के लिए गो - मठ, बावड़ी और बगीचा बनवाया था.

मुहम्मद बिन तुग़लक़ कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था. वह अरबी भाषा एवं फ़ारसी भाषा का विद्धान तथा खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था. अलाउद्दीन ख़िलजी की भाँति अपने शासन काल के प्रारम्भ में उसने, न तो ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया, यद्यपि बाद में ऐसा करना पड़ा. उसने न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग का एकाधिपत्य समाप्त किया. क़ाज़ी के जिस फैसले से वह संतुष्ट नहीं होता था, उसे बदल देता था. सर्वप्रथम मुहम्मद तुग़लक़ ने ही बिना किसी भेदभाव के योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया. नस्ल और वर्ग-विभेद को समाप्त करके योग्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्त करने की नीति अपनायी. वस्तुत: यह उस शासक का दुर्भाग्य था कि, उसकी योजनाएं सफलतापूर्वक क्रियान्वित नहीं हुई. जिसके कारण यह इतिहासकारों की आलोचना का पात्र बना.

मुहम्मद तुग़लक़ के सिंहासन पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत कुल 23 प्रांतों में बँटा थी, जिनमें मुख्य थे - दिल्ली, देवगिरि, लाहौर, मुल्तान, सरमुती, गुजरात, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, मालवा, जाजनगर (उड़ीसा), द्वारसमुद्र आदि. कश्मीर एवं बलूचिस्तान भी दिल्ली सल्तनत में शामिल थे. दिल्ली सल्तनत की सीमा का सर्वाधिक विस्तार इसी के शासनकाल में हुआ था. परन्तु इसकी क्रूर नीति के कारण राज्य में विद्रोह आरम्भ हो गया. जिसके फलस्वरूप दक्षिण में नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई और ये क्षेत्र दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए. बंगाल भी स्वतंत्र हो गया. राज्यारोहण के बाद मुहम्मद तुग़लक़ ने कुछ नवीन योजनाओं का निर्माण कर उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया.

मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल में सबसे अधिक (34) विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह अकेले दक्षिण भारत में ही हुए. सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल में हुए कुछ महत्त्वपूर्ण विद्रोहों का सारांश निम्नलिखित हैं- प्रथम विद्रोह 1327 ई. में तुग़लक़ के चचेरे भाई सुल्तान गुरशास्प ने किया, जो गुलबर्ग के निकट सागर का सूबेदार था. वह सुल्तान द्वारा बुरी तरह से पराजित किया गया. मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध सिंध तथा मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू ख़ाँ ने 1327-1328 ई. में विद्रोह किया. सैयद जलालुद्दीन हसनशाह का मालाबार विद्रोह 1334-1335 ई. में किया गया. बंगाल का विद्रोह (1330-1331 ई.) प्रमुख हैं. बंगाल के विद्रोह को यद्यपि प्रारंभ में दबा लिया गया था, किन्तु 1340-1341 ई. के लगभग शम्सुद्दीन के नेतृत्व में बंगाल दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया. 1337-1338 ई. में कड़ा के सूबेदार निज़ाम भाई का विद्रोह, 1338-1339 ई. में बीदर के सूबेदार, नुसरत ख़ाँ का विद्रोह, 1339-1340 ई. में गुलबर्ग के अलीशाह का विद्रोह आदि भी मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध किये गये विद्रोहों में प्रमुख हैं. इस तरह के विद्रोहों का सुल्तान ने सफलतापूर्वक दमन किया. मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में ही दक्षिण में 1336 ई. में 'हरिहर' एवं 'बुक्का' नामक दो भाईयों ने स्वतंत्र ‘विजयनगर’ की स्थापना की. अफ़्रीकी यात्री इब्न बतूता को 1333 ई. में मुहम्मद ने अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा. इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में मुहम्मद तुग़लक़ के समय की घटनाओं का वर्णन किया है. 

मुहम्मद तुग़लक़ धार्मिक रूप में सहिष्णु था. जैन विद्वान एवं संत 'जिनप्रभु सूरी' को दरबार में बुलाकर सम्मान प्रदान किया. मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने हिन्दू त्योहरों (होली, दीपावली) में भाग लिया. दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ 'शिहाबुद्दीन' को 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नियुक्त किया तथा शेख़ 'मुईजुद्दीन' को गुजरात का गर्वनर तथा 'सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी' को सेना में नियुक्त किया. शेख़ 'निज़ामुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली' सुल्तान के विरोधियों में एक थे. अपने शासन काल के अन्तिम समय में जब सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ गुजरात में विद्रोह को कुचल कर तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो मार्ग में थट्टा के निकट गोंडाल पहुँचकर वह गंभीर रूप से बीमार हो गया. यहाँ पर सुल्तान की 20 मार्च 1351 को मृत्यु हो गई.

फ़िरोज़ शाह तुग़लक़: फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था. फ़िरोजशाह तुग़लक़ का जन्म 1309 ईस्वी को हुआ था. उसका शासन 1351 से 1388 तक रहा. उसने अपने शासनकाल में ही चांदी के सिक्के चलाये. वह मुहम्मद तुग़लक़ का चचेरा भाई एवं सिपहसलार 'रजब' का पुत्र था. उसकी माँ नैला, दीपालपुर के भाटी राजपूत शासक (राणा मल) की पुत्री थी. फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने गुजरी प्रेम महल की स्थापना अपनी सबसे प्रिय गुजरी प्रेमिका के लिए किया था. मुहम्मद तुग़लक़ की मुत्यु के बाद 23 मार्च 1351 को फ़िरोज़ तुग़लक़ का राज्याभिषक थट्टा के निकट हुआ. पुनः फ़िरोज़ का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ. सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सभी क़र्ज़े माफ कर दिए, जिसमें 'सोंधर ऋण' भी शामिल था, जो मुहम्मद तुग़लक़ के समय किसानों को दिया गया था. फ़िरोज शाह कट्टर सुन्नी धर्मान्ध मुस्लिम था.

सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़ तुग़लक़ ने दिल्ली सल्तनत से अलग हुए अपने प्रदेशों को जीतने के अभियान के अन्तर्गत बंगाल एवं सिंध पर आक्रमण किया. बंगाल को जीतने के लिए सुल्तान ने 1353 ई. में आक्रमण किया. उस समय शम्सुद्दीन इलियास शाह वहाँ का शासक था. उसने इकदला के क़िले में शरण ले रखी थी, सुल्तान फ़िरोज़ अन्ततः क़िले पर अधिकार करने में असफल होकर 1355 ई. में वापस दिल्ली आ गया. पुनः बंगाल पर अधिकार करने के प्रयास के अन्तर्गत 1359 ई. में फ़िरोज़ तुग़लक़ ने वहाँ के तत्कालीन शासक शम्सुद्दीन के पुत्र सिकन्दर शाह पर आक्रमण किया, किन्तु असफल होकर एक बार फिर वापस आ गया. 1360 ई में सुल्तान फ़िरोज़ ने जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण करके वहाँ के शासक भानुदेव तृतीय को परास्त कर पुरी के जगन्नाथपुरी मंदिर को ध्वस्त किया. 1361 ई. में फ़िरोज़ ने नगरकोट पर आक्रमण किया. यहाँ के जामबाबनियों से लड़ती हुई सुल्तान की सेना लगभग 6 महीने तक रन के रेगिस्तान में फँसी रही, कालान्तर में जामबाबनियों ने सुल्तान की अधीनता को स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देने के लिए सहमत हो गये.

इन साधारण विजयों के अतिरिक्त फ़िरोज़ के नाम कोई बड़ी सफलता नहीं जुड़ी है. उसने दक्षिण में स्वतंत्र हुए राज्य विजयनगर, बहमनी एवं मदुरा को पुनः जीतने का कोई प्रयास नहीं किया. इस प्रकार कहा जा सकता है कि, सुल्तान फ़िरोज़ तुग़लक़ ने अपने शासन काल में कोई भी सैनिक अभियान साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं किया और जो भी अभियान उसने किया, वह मात्र साम्राज्य को बचाये रखने के लिए किया. राजस्व व्यवस्था के अन्तर्गत फ़िरोज़ ने अपने शासन काल में 24 कष्टदायक करों को समाप्त कर दिया और केवल 4 कर ‘ख़राज’ (लगान), ‘खुम्स’ (युद्ध में लूट का माल), ‘जज़िया’, एवं 'ज़कात' (इस्लाम धर्म के अनुसार अढ़ाई प्रतिशत का दान, जो उन लोगों को देना पड़्ता है, जो मालदार हों और उन लोगों को दिया जाता है, जो अपाहिज या असहाय और साधनहीन हों) को वसूल करने का आदेश दिया. उलेमाओं के आदेश पर सुल्तान ने एक नया सिंचाई (हक ए शर्ब) कर भी लगाया, जो उपज का 1/10 भाग वसूला जाता था. सम्भवतः फ़िरोज़ तुग़लक़ के शासन काल में लगान उपज का 1/5 से 1/3 भाग होता था. सुल्तान ने सिंचाई की सुविधा के लिए 5 बड़ी नहरें यमुना नदी से हिसार तक 150 मील लम्बी सतलुज नदी से घग्घर नदी तक 96 मील लम्बी सिरमौर की पहाड़ी से लेकर हांसी तक, घग्घर से फ़िरोज़ाबाद तक एवं यमुना से फ़िरोज़ाबाद तक का निर्माण करवाया. उसने फलो के लगभग 1200 बाग़ लगवाये. आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने के लिए अनेक करों को समाप्त कर दिया. फिरोज के अंतिम दिन दुख भरे बीते. 1374 में उसके उत्तराधिकारी पुत्र फतेखा की मौत हो गई उसके कुछ वर्ष अंतराल के बाद 1387 में दूसरा पुत्र खन जहा भी मर गया जिसका सुल्तान को गहरा आघात पहुंचा. आयु बढने के साथ ही 80 वर्ष की आयु में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की मृत्यु सितम्बर1388 ई में हुई थी. हौज़खास परिसर,दिल्ली में उसे दफ़न कर दिया गया.

फिरोज साह तुगलक की मृत्यु के बाद 1388 ईस्वी में मोहमद खान ने कुछ दिनों के लिए दिल्ली में शासन किया और कुछ दिनों के भीतर ही उसकी हत्या कर डी गई. मोहमद खान के हत्या के बाद दिल्ली सलतनत में फिरोज शाह तुगलक का पोता गयासुद्दीन तुगलक शाह II अगला शासक बना लेकिन 5 महींने के अल्प शासन के बाद फरवरी 1389 में जफ़र खान के पुत्र अबू बक्र ने उसकी हत्या करके स्वंय सुल्तान बन गया. इसके शासनकाल में फिरोज के नायक के रूप में कार्य कर चुके शहजादा मुहम्मद ने सल्तनत की सत्ता प्राप्त करने की कोशिश की. 24 अप्रैल 1389 ईस्वी में उन्होंने स्वंय को सुल्तान घोषित कर दिया इसके बाद मुहम्मद और अबु बक्र के बीच सत्ता का संघर्ष हुआ.इस संघर्ष के बाद 1390 ईस्वी में अबू बक्र को सिंहासन छोड़ना पड़ा. इसके बाद मुहम्मद शाह ने 1390 ईस्वी से 1394 ईस्वी तक शासन किया. इसके बाद उसका पुत्र हुमायू ने लगभग तीन महीने तक शासन किया और उसकी मृत्यु हो गयी. मार्च 1394 में दिल्ली सल्तनत का शासक महमूद शाह बना. 17 दिसंबर 1398 को दिल्ली पर तैमुर का आक्रमण हुआ और सुल्तान खुद गुजरात भाग गया. पुन: वजीर मल्लू खान ने सुल्तान को दिल्ली बुलाकर गद्दी पर बैठाया. सन 1412 ईस्वी में महमूद शाह की मृत्यु हो गयी और तुगलक वंश का अंत हो गया.

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